रक्षाबंधन : कच्चे धागे से बंधा पक्का रिश्ता

आधुनिकता और दिखावे की चमक में कहीं खो न जाए भाई-बहन के स्नेह की सादगी
 
dfghsd

(डॉ. सुधाकर आशावादी — विभूति फीचर्स)

श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन भारतीय पर्व-परंपराओं में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। यह केवल भाई की कलाई पर राखी बांधने और बदले में उपहार पाने का पर्व नहीं, बल्कि भाई-बहन के निश्छल प्रेम, विश्वास, समर्पण और पारिवारिक दायित्वों की याद दिलाने वाला अवसर है।

आदिकाल से चली आ रही इस परंपरा में जहां बहन के स्नेह का भाव दिखाई देता है, वहीं भाई की ओर से बहन की सुरक्षा, सम्मान और हर परिस्थिति में साथ खड़े रहने का संकल्प भी निहित है। सनातन भारतीय परंपरा में परिवार को सामाजिक जीवन की सबसे मजबूत इकाई माना गया है। परिवार के बड़े अपने अनुभव से छोटों का मार्गदर्शन करते रहे हैं और छोटे भी बड़ों के प्रति सम्मान एवं अपनत्व का भाव रखते आए हैं। यही पारिवारिक संस्कार रिश्तों को मजबूत बनाते हैं।

dfyudrty

पर्व से जुड़ा था परिवार का मिलन

रक्षाबंधन के पुराने स्वरूप पर नजर डालें तो यह पर्व परिवार के सामूहिक मिलन का महत्वपूर्ण अवसर रहा है। दूर रहने वाले भाई-बहन इस दिन एक-दूसरे से मिलने का प्रयास करते थे। घर में चहल-पहल होती थी और परिवार के सदस्य साथ बैठकर खुशियां साझा करते थे।

मौसम के अनुरूप विभिन्न घरेलू व्यंजन भी धीरे-धीरे इस पर्व का हिस्सा बन गए। कुशल गृहणियों ने घर में तैयार की गई सेवई, मिठाइयों और दूसरे पकवानों से पर्व की खुशियों में मिठास घोल दी। उस दौर में बाजार से खरीदी वस्तुओं के बजाय घर में बने पकवानों और आत्मीयता को अधिक महत्व दिया जाता था।

असल में रक्षाबंधन की खूबसूरती उसकी सादगी में ही थी। एक साधारण-सा कच्चा धागा भाई की कलाई पर बंधकर रिश्ते को मजबूत कर देता था। उस धागे की कीमत बाजार तय नहीं करता था, बल्कि उसमें जुड़ा प्रेम और विश्वास उसे अनमोल बनाता था।

आधुनिकता की दौड़ में बदलता स्वरूप

आज रक्षाबंधन को वर्तमान संदर्भ में देखें तो पर्व का स्वरूप काफी बदलता नजर आता है। आधुनिकता और बाजारवाद की दौड़ में कहीं न कहीं हम इसके मूल भाव से दूर होते जा रहे हैं।

पहले जहां बहन अपने हाथों से साधारण राखी तैयार कर भाई की कलाई पर बांधती थी, वहीं अब सोने, चांदी और हीरे जड़ी राखियां कई जगह प्रतिष्ठा और आर्थिक हैसियत का प्रतीक बनने लगी हैं। मिठास के लिए घर में बनी सेवई और मिठाइयों की जगह महंगी और आकर्षक बाजारू मिठाइयों ने ले ली है।

पर्व मनाने में कोई भव्यता या खर्च गलत नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि क्या बढ़ता हुआ दिखावा रिश्ते की आत्मीयता से बड़ा हो जाना चाहिए?

रक्षाबंधन का मूल उद्देश्य भाई-बहन के बीच प्रेम और विश्वास को मजबूत करना है, न कि आर्थिक प्रदर्शन करना। यदि महंगी राखी और महंगे उपहार ही पर्व की पहचान बन जाएं तो उस कच्चे धागे की भावनात्मक शक्ति कहीं पीछे छूट जाती है।

सोशल मीडिया ने भी बदली तस्वीर

सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पर्वों को लोगों तक पहुंचाने का नया माध्यम दिया है। इनके जरिए हमारी संस्कृति और परंपराओं की जानकारी देश-दुनिया तक पहुंचाई जा सकती है। लेकिन दुर्भाग्य से कई बार पर्वों के सकारात्मक और गौरवपूर्ण पक्ष के बजाय ऐसे कंटेंट को ज्यादा महत्व मिलता है, जिनमें आर्थिक हैसियत, उपहारों की कीमत या रिश्तों में स्वार्थ को केंद्र में रखा जाता है।

भाई-बहन के रिश्ते को केवल महंगे उपहार और आर्थिक अपेक्षाओं से जोड़ना इस पवित्र संबंध की व्यापकता को सीमित करना है। रक्षाबंधन किसी की आर्थिक स्थिति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपनत्व और जिम्मेदारी का उत्सव है।

जरूरत है मूल भावना को बचाने की

रक्षाबंधन भारतीय पर्व परंपरा के उन प्रमुख अवसरों में है, जिनका उद्देश्य रिश्तों को मजबूत करना और परिवार में प्रेम, सम्मान तथा सहयोग की भावना बढ़ाना है। इसलिए इस पर्व को आधुनिकता के रंग में रंगते समय उसकी मौलिक आत्मा को भूलना उचित नहीं होगा।

राखी चाहे साधारण सूती धागे की हो या आकर्षक डिजाइन वाली, उसका महत्व तभी है जब उसके साथ भावनाएं जुड़ी हों। भाई बहन को महंगा उपहार दे या केवल स्नेह से उसका हाथ थाम ले—पर्व की सार्थकता प्रेम में है, कीमत में नहीं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम रक्षाबंधन को दिखावे और प्रतिस्पर्धा से निकालकर आत्मीयता, संस्कार और पारिवारिक मिलन का पर्व बनाए रखें। घर के बच्चे यह समझें कि राखी केवल एक धागा नहीं, बल्कि विश्वास और जिम्मेदारी का प्रतीक है।

आखिर रिश्तों की मजबूती सोने-चांदी से नहीं, भावनाओं से होती है। इसी कारण रक्षाबंधन का सबसे सुंदर संदेश आज भी वही है—

कच्चे धागे से बंधा रिश्ता ही सबसे पक्का रिश्ता होता है।

(विभूति फीचर्स)

Tags