PDA पर रामबाबू द्विवेदी का निशाना, बोले- सामाजिक न्याय के दावे में हिस्सेदारी कितनी?

Rambabu Dwivedi targets PDA; asks what the actual share is within the claims of social justice.
 
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बाराबंकी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी के PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष रामबाबू द्विवेदी ने सपा की PDA रणनीति पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जिन सामाजिक वर्गों की राजनीतिक भागीदारी की बात की जाती है, उन्हें संगठन और नेतृत्व में वास्तविक हिस्सेदारी कितनी मिल रही है।

रामबाबू द्विवेदी ने राजनीतिक तंज कसते हुए कहा, “खोदा पहाड़, निकली चुहिया—PDA की हवा अब निकलती दिखाई दे रही है।” उन्होंने सवाल उठाया कि PDA के नाम पर सामाजिक न्याय और व्यापक प्रतिनिधित्व का दावा किया जाता है, लेकिन इसकी वास्तविक राजनीतिक तस्वीर को भी परखा जाना चाहिए।

2023 में सामने आया था PDA फॉर्मूला

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 2023 में PDA को प्रमुख राजनीतिक रणनीति के तौर पर पेश किया था। उन्होंने PDA का अर्थ पिछड़ा वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक बताया था। बाद में 2024 के लोकसभा चुनाव में यह सपा के प्रमुख राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना।

2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने अपने टिकट वितरण में भी इस सामाजिक समीकरण को महत्व दिया। उपलब्ध चुनावी विश्लेषण के अनुसार, पार्टी ने विभिन्न पिछड़े वर्गों के साथ दलित, मुस्लिम और सवर्ण वर्गों के उम्मीदवारों को भी टिकट दिया था।

“PDA में वास्तविक हिस्सेदारी कितनी?”

रामबाबू द्विवेदी ने सवाल उठाया कि यदि PDA पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के राजनीतिक सशक्तीकरण का मॉडल है, तो इन वर्गों की संगठन, नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का आकलन भी होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों के सामाजिक न्याय के दावों को केवल चुनावी नारों के आधार पर नहीं, बल्कि उम्मीदवारों के चयन, संगठनात्मक जिम्मेदारियों और राजनीतिक निर्णयों में प्रतिनिधित्व के आधार पर भी देखा जाना चाहिए।

द्विवेदी ने आरोप लगाते हुए पूछा कि “PDA का अधिकार वास्तव में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों का है या फिर यह केवल चुनावी राजनीति में सामाजिक समूहों को एकजुट करने का फॉर्मूला बनकर रह गया है?”

परिवारवाद को लेकर भी उठाए सवाल

भाजपा नेता ने PDA की चर्चा को समाजवादी पार्टी के नेतृत्व और परिवारवाद के मुद्दे से भी जोड़ा। उनका कहना है कि सामाजिक न्याय की राजनीति में व्यापक भागीदारी के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि महत्वपूर्ण राजनीतिक अवसर किन लोगों को मिल रहे हैं।

हालांकि, यह रामबाबू द्विवेदी का राजनीतिक आरोप है। समाजवादी पार्टी PDA को पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों की व्यापक राजनीतिक भागीदारी से जोड़ती रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के प्रदर्शन के बाद PDA रणनीति और उसके सामाजिक प्रभाव पर राजनीतिक विश्लेषण भी हुआ था।

PDA की सियासी भूमिका पर जारी बहस

उत्तर प्रदेश की राजनीति में PDA अब भी प्रमुख राजनीतिक विमर्शों में शामिल है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 37 सीटों पर जीत दर्ज की थी और पार्टी के टिकट वितरण तथा विजयी उम्मीदवारों के सामाजिक प्रतिनिधित्व को PDA रणनीति के संदर्भ में विश्लेषित किया गया था।

वहीं, भाजपा और अन्य राजनीतिक दल समय-समय पर सपा की PDA रणनीति की व्याख्या और उसके राजनीतिक दावों पर सवाल उठाते रहे हैं।

ऐसे में रामबाबू द्विवेदी के बयान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और परिवारवाद को लेकर चल रही बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। अब PDA की राजनीति को लेकर अलग-अलग दलों के दावों और उनके वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की तुलना आने वाले समय में अहम मुद्दा बन सकती है।

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