गैंडा: अस्तित्व की लड़ाई लड़ता विशाल प्राणी
(प्रमोद दीक्षित मलय—विभूति फीचर्स)
बचपन में हाथी के बाद जिस वन्यजीव ने मुझे सबसे अधिक आकर्षित किया, वह गैंडा था। किताबों के पन्नों पर घास चरते या तेज दौड़ते गैंडे के चित्र मुझे रोमांचित करते थे। उसके नाक के ऊपर उगा सींग हमेशा कौतूहल पैदा करता था—सींग तो सिर पर होते हैं, फिर गैंडे की नाक पर क्यों? इतना भारी-भरकम शरीर होने के बावजूद वह इतनी तेज कैसे दौड़ लेता है? उसकी त्वचा इतनी मोटी और कठोर क्यों होती है? बचपन में इन सवालों के जो जवाब मिले, उनसे मन पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाया।
छात्र जीवन में एक बार चिड़ियाघर में गैंडे को उसके बच्चे के साथ खुले मैदान में घास चरते देखा तो मैं देर तक उन्हें अपलक निहारता रहा। मां और बच्चा कभी साथ-साथ घास चरते, कभी खेलते और अचानक दौड़ पड़ते। मैं कंटीली बाड़ के पास खड़ा उनकी हर गतिविधि देखता रहा। कई बार वे इतने करीब आ जाते कि लगता, हाथ बढ़ाऊं तो छू लूं, लेकिन यह संभव नहीं था। ऐसा लगा मानो मेरी आंखें ही मेरे हाथ बन गई हों और मैं अपनी निगाहों से उनके अस्तित्व को महसूस कर रहा हूं।
हम करीब पांच सहपाठी वहां खड़े थे और गैंडे के जीवन को लेकर आपस में चर्चा कर रहे थे। हालांकि उस समय मेरी जानकारी बहुत सीमित थी। बातचीत से अधिक मेरा ध्यान गैंडे को देखने में था। खासकर उसकी नाक के ऊपर उठे नुकीले सींग पर मेरी निगाह बार-बार टिक जाती थी।
तभी अचानक बचपन की एक पुरानी स्मृति मेरे मन में उभर आई। गर्मियों के दिनों में हमारे गांवों में कुछ घुमंतू परिवार आया करते थे, जो जड़ी-बूटियां और पारंपरिक औषधियां बेचते थे। उनकी झोली में तमाम जड़ी-बूटियों के साथ बारहसिंगा, हिरण और गैंडे के सींग भी दिखाई देते थे। हिरण की नाभि से प्राप्त कस्तूरी और हाथी दांत के टुकड़े भी उनके पास होते थे।
मैंने महिलाओं को बारहसिंगा के सींग के छोटे टुकड़े खरीदते देखा था। नवजात शिशुओं की पसली चलने जैसी समस्या होने पर सींग को घिसकर उसका लेप लगाने की मान्यता थी। पुरुष गैंडे के सींग के साथ केसर और शिलाजीत जैसी चीजें खरीदते थे। उस समय हम बच्चों को इन औषधियों की कोई जानकारी नहीं थी। हम तो केवल कौतूहलवश उन परिवारों के पीछे-पीछे घूमते रहते थे।
इसी अतीत की स्मृतियों में मैं खोया हुआ था कि तभी एक बुजुर्ग की आवाज ने मेरा ध्यान खींचा। संभवतः वह चिड़ियाघर में गैंडे के बाड़े की देखरेख करने वाले कर्मचारी थे। वे हमारे साथियों को गैंडे के बारे में जानकारी दे रहे थे।
उन्होंने बताया कि गैंडे का सींग केराटिन नामक प्रोटीन से बना होता है और यह जीवनभर बढ़ता रहता है। गैंडा शाकाहारी जीव है तथा घास, पत्तियां, फल और जलीय वनस्पतियां खाता है। सामान्य परिस्थितियों में यह शांत रहता है, लेकिन खतरा महसूस होने या आक्रामक होने पर बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। अपने भारी शरीर के बावजूद गैंडा लगभग 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकता है।

बुजुर्ग कर्मचारी के अनुसार गैंडे की त्वचा करीब 5 से 6 सेंटीमीटर तक मोटी और कठोर हो सकती है। यह विशाल स्थलीय स्तनधारी सामान्यतः करीब 2,500 किलोग्राम तक वजन का हो सकता है और इसकी औसत आयु 40 से 50 वर्ष तक मानी जाती है।
उन्होंने आगे बताया कि दुनिया में गैंडे की पांच प्रमुख प्रजातियां हैं। इनमें काला और सफेद गैंडा अफ्रीका में पाए जाते हैं, जबकि जावन, सुमात्रन और एक सींग वाला गैंडा एशिया में पाए जाते हैं। भारत में मुख्य रूप से एक सींग वाला गैंडा पाया जाता है और इसकी बड़ी आबादी असम के काजीरंगा तथा ओरंग राष्ट्रीय उद्यानों में निवास करती है।
गैंडे की संख्या को लेकर उन्होंने चिंता भी जताई। उनके अनुसार, कभी बड़ी संख्या में धरती पर विचरण करने वाला यह राजसी जीव आज दुनिया के अनेक हिस्सों में अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। भारत में भी गैंडों की संख्या सीमित है। मादा गैंडे का गर्भकाल लगभग 15 से 16 महीने का होता है और सामान्यतः वह एक बच्चे को जन्म देती है। दो प्रसवों के बीच कई वर्षों का अंतर हो सकता है।
इसी बीच वहां मौजूद अन्य पर्यटकों ने भी उस बुजुर्ग को घेर लिया। किसी ने सवाल किया कि आखिर गैंडों का शिकार क्यों किया जाता है?
बुजुर्ग ने कुछ क्षण नीले आसमान की ओर देखा, लंबी सांस ली और कहा—मानव का बढ़ता लोभ और अविवेक इसके पीछे बड़ी वजह हैं। उन्होंने बताया कि कुछ देशों में गैंडे के सींग को लेकर ऐसी पारंपरिक मान्यताएं रही हैं, जिनके कारण इसकी मांग बनी रही। सींग को औषधीय या यौन क्षमता बढ़ाने वाला मानने जैसी धारणाओं का भी उल्लेख मिलता है। इसके अलावा कुछ लोग इसे घर में सजाकर सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ते हैं। गैंडे की खाल का इस्तेमाल भी विभिन्न वस्तुओं के निर्माण में किया जाता रहा है।
फिर उन्होंने भावुक होकर कहा कि मनुष्य को यह नहीं भूलना चाहिए कि पृथ्वी केवल उसकी नहीं है। पशु-पक्षियों और वन्यजीवों का भी इस धरती पर उतना ही अधिकार है। इन्हीं जीवों से तो प्रकृति सुंदर और जीवंत बनती है।
इतना कहकर वह बुजुर्ग चुप हो गए और पेड़ के तने का सहारा लेकर बैठ गए। उनकी आंखों में आंसू छलछला आए थे। कुछ देर के लिए वहां सन्नाटा छा गया। इसके बाद धीरे-धीरे पर्यटक दूसरे बाड़ों की ओर बढ़ गए, लेकिन उनकी कही बातें मेरे मन में गूंजती रहीं।
विश्व गैंडा दिवस और संरक्षण की मुहिम
गैंडे के अस्तित्व पर मंडराते खतरे को समझने के लिए विश्व गैंडा दिवस के इतिहास पर नजर डालना भी जरूरी है। अवैध शिकार, प्राकृतिक आवास में कमी, अंधविश्वास और जागरूकता के अभाव ने लंबे समय तक गैंडों के संरक्षण को चुनौती दी है।
गैंडों के संरक्षण और अवैध शिकार के खिलाफ जनजागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से 22 सितंबर को विश्व गैंडा दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2011 से इसे वैश्विक स्तर पर सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों, चिड़ियाघरों और विद्यालयों सहित विभिन्न संस्थाओं द्वारा मनाया जाने लगा।
पिछले वर्षों में गैंडा संरक्षण की दिशा में कई महत्वपूर्ण प्रयास हुए हैं। संरक्षण कानूनों को मजबूत करने, संरक्षित क्षेत्रों के विकास, वैज्ञानिक अनुसंधान, निगरानी और जनजागरूकता के माध्यम से गैंडों के प्राकृतिक आवास और आबादी को बचाने की कोशिशें जारी हैं।
एशियाई गैंडे के संरक्षण को लेकर भारत सहित कई देशों ने क्षेत्रीय सहयोग की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं। वर्ष 2019 में भारत, इंडोनेशिया, भूटान, नेपाल और मलेशिया ने एशियाई गैंडा संरक्षण के लिए नई दिल्ली घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इसका उद्देश्य संरक्षण के लिए आवश्यक उपायों और संसाधनों को बढ़ावा देना था।
विश्व गैंडा दिवस के आयोजनों के माध्यम से हर वर्ष लोगों को इन विशाल जीवों के संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाता है। वर्ष 2026 की थीम “पांचों प्रजातियों को जीवित रखें” रखी गई है, जो गैंडे की सभी पांच प्रजातियों के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
गैंडा केवल जंगल का एक विशाल और आकर्षक जीव नहीं है, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन और जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। प्रकृति के साथ मनुष्य के रिश्ते को समझने के लिए ऐसे जीवों का सुरक्षित रहना जरूरी है।
भारत में गैंडे के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना का एक प्रतीक डाक टिकट भी रहा है। भारत सरकार ने 1 अक्टूबर 1962 को गैंडे पर 15 नए पैसे का डाक टिकट जारी किया था।
गैंडों की संख्या में धीरे-धीरे हो रही वृद्धि संरक्षण प्रयासों के लिए उम्मीद जगाती है। जरूरत इस बात की है कि अवैध शिकार, वन्यजीव तस्करी और प्राकृतिक आवास के नुकसान के खिलाफ प्रयास लगातार जारी रहें, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी जंगलों में इस बलशाली और खूबसूरत जीव को स्वतंत्र रूप से विचरण करते देख सकें।
