जलवायु परिवर्तन का बढ़ता खतरा: बढ़ती गर्मी, युद्ध और बदलते मौसम का भारत पर असर
(विश्लेषणात्मक लेख)
प्रो. (डॉ.) भरत राज सिंह
पर्यावरणविद एवं महानिदेशक, School of Management Sciences
India में अप्रैल का महीना कभी हल्की गर्माहट और वसंत के एहसास के लिए जाना जाता था, लेकिन अब यही महीना रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और हीटवेव का प्रतीक बनता जा रहा है। उत्तर भारत के कई हिस्सों — खासकर Lucknow, Delhi, राजस्थान और मध्य गंगा क्षेत्र — में तापमान 40 से 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचना अब सामान्य स्थिति बनती जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव केवल मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, समुद्री तापमान में वृद्धि, शहरीकरण और वैश्विक संघर्षों का संयुक्त प्रभाव है।
लगातार बढ़ रहा तापमान
भारतीय मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में अप्रैल के अधिकतम तापमान में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। कुछ वर्षों में मामूली गिरावट जरूर देखी गई, लेकिन दीर्घकालिक रुझान लगातार बढ़ती गर्मी की ओर संकेत करता है।
कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान वर्ष 2020 में तापमान में कुछ कमी देखने को मिली थी। विशेषज्ञ इसका कारण औद्योगिक गतिविधियों में कमी, वाहनों की आवाजाही रुकना और प्रदूषण स्तर में गिरावट मानते हैं। हालांकि यह राहत अस्थायी साबित हुई और सामान्य गतिविधियां शुरू होते ही तापमान फिर तेजी से बढ़ने लगा।
युद्ध और पर्यावरण के बीच गहराता संबंध
जलवायु विशेषज्ञ अब युद्ध और पर्यावरणीय संकट के बीच गहरे संबंध की ओर भी ध्यान दिला रहे हैं। बड़े सैन्य अभियानों, भारी ईंधन खपत, बमबारी और ऊर्जा ढांचे के विनाश से कार्बन उत्सर्जन में तेजी आती है।
Russia-Ukraine War और मध्य-पूर्व में जारी संघर्षों के दौरान वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी ने इस चिंता को और गंभीर बना दिया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि युद्ध केवल मानवीय संकट नहीं पैदा करते, बल्कि पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन को भी प्रभावित करते हैं।
बदल रहा है पश्चिमी विक्षोभ का स्वरूप
भारत में आने वाले पश्चिमी विक्षोभ अब पहले की तुलना में अधिक अनियमित और तीव्र हो गए हैं। इसके कारण अचानक बारिश, ओलावृष्टि और फिर तुरंत ही भीषण गर्मी जैसी स्थितियां पैदा हो रही हैं।
तापमान में तेजी से होने वाले उतार-चढ़ाव का असर खेती और स्वास्थ्य दोनों पर पड़ रहा है। विशेष रूप से गेहूं जैसी रबी फसलों को नुकसान पहुंच रहा है, जिससे किसानों की आय प्रभावित हो रही है।
शहर बन रहे हैं ‘हीट आइलैंड’
Lucknow, Delhi और अन्य बड़े शहरों में तेजी से बढ़ता कंक्रीट निर्माण और हरियाली की कमी “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव को बढ़ा रही है।
इसके चलते शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक रहता है। रात में भी गर्मी कम नहीं होती, जिससे लोगों को राहत नहीं मिल पाती और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ती जा रही हैं।
आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है चुनौती
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि मौजूदा स्थिति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में भारत को लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव, जल संकट, भूजल स्तर में गिरावट और ऊर्जा मांग में भारी वृद्धि जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
कई रिपोर्टों में यह आशंका जताई गई है कि 2030 के बाद कुछ क्षेत्रों में तापमान 48 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। इसका असर अर्थव्यवस्था, कृषि, स्वास्थ्य और श्रम उत्पादकता पर भी दिखाई देगा।
समाधान की दिशा में क्या जरूरी है?
विशेषज्ञों के अनुसार इस संकट से निपटने के लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर काम करना होगा।
- बड़े स्तर पर वृक्षारोपण और वन संरक्षण
- सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा
- वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण
- हरित शहरी योजना और कम कंक्रीट निर्माण
- पर्यावरण संरक्षण को जन आंदोलन बनाना
अब कार्रवाई का समय
जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता बन चुका है। यदि प्रदूषण, अनियंत्रित विकास और पर्यावरणीय उपेक्षा जारी रही, तो आने वाले वर्षों में बढ़ती गर्मी मानव जीवन के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल चर्चा नहीं, बल्कि ठोस और सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और संतुलित पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सके।


