आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में दिनदहाड़े डकैती

Daylight robbery in the modern healthcare system.
 
आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में दिनदहाड़े डकैती

(डॉ. दीपक गोस्वामी-विभूति फीचर्स)

जिस देश में मंदिर की घंटियों से लेकर संसद की बहस तक मानवता की दुहाई दी जाती है, उसी देश में यदि किसी जीवनरक्षक दवा के मूल्य में दस गुना तक का अंतर सामने आए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति के सामने आखिर चिकित्सा व्यवस्था खड़ी है या बाजार की मजबूरी।

22 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष कैंसर की एक दवा की कीमत का उदाहरण सामने आया। लेख में दिए गए विवरण के अनुसार, करीब 2,700 रुपये में उपलब्ध दवा पर 27,000 रुपये का अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) अंकित था। इस असाधारण अंतर पर न्यायालय की ओर से तीखी टिप्पणी की गई और इसे मरीजों के साथ “दिनदहाड़े डकैती” जैसा बताया गया।

यह केवल अदालत की टिप्पणी नहीं है। यह उस परिवार की पीड़ा की अभिव्यक्ति भी है जो अस्पताल के बाहर खड़ा होकर अपनी जेब टटोलता है और भीतर भर्ती अपने परिजन की जिंदगी बचाने के लिए हर संभव कीमत चुकाने को मजबूर होता है।

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बीमारी के सामने मरीज की सौदेबाजी की ताकत खत्म

अस्पताल में भर्ती मरीज सामान्य ग्राहक नहीं होता। वह अपनी इच्छा से बाजार में नहीं आया है। वह बीमारी और जीवन की चिंता से घिरा हुआ होता है। वह दुकान-दुकान घूमकर दवा की कीमतों की तुलना नहीं कर सकता और न ही हर बार यह कह सकता है कि दवा महंगी है तो किसी दूसरे स्रोत से खरीद लूंगा।

बीमारी ऐसी स्थिति पैदा करती है, जहां मोलभाव की शक्ति बाजार के पास और विवशता मरीज के पास होती है। यही कारण है कि चिकित्सा क्षेत्र में कीमत और मुनाफे के बीच संतुलन का सवाल सामान्य बाजार से कहीं अधिक संवेदनशील हो जाता है।

निस्संदेह दवा के निर्माण में अनुसंधान, उत्पादन, गुणवत्ता नियंत्रण, परिवहन, भंडारण और वितरण जैसी वास्तविक लागतें होती हैं। उद्योग को उचित लाभ मिलना भी स्वाभाविक है। लेकिन जब किसी दवा के वास्तविक क्रय मूल्य और मरीज से वसूले जाने वाले मूल्य के बीच असाधारण अंतर दिखाई दे, तो उस अंतर पर सवाल उठाना जनहित का विषय बन जाता है।क्योंकि बीमारी ऐसा बाजार है, जहां ग्राहक अपनी इच्छा से नहीं आता। वह भय, उम्मीद और मजबूरी के बीच आता है।

इलाज का खर्च कई बार परिवार की अर्थव्यवस्था को तोड़ देता है

जब कोई गरीब परिवार अस्पताल पहुंचता है तो उसके साथ केवल बीमारी नहीं आती, बल्कि उसकी पूरी गृहस्थी इलाज की मेज पर आ जाती है। कहीं मां के कानों की बालियां बिकती हैं, कहीं पत्नी की वर्षों की बचत खर्च होती है, कहीं पिता की जमीन गिरवी रखी जाती है और कहीं बच्चों की पढ़ाई का पैसा उपचार में चला जाता है।

एक ओर चिकित्सकीय पर्चा होता है और दूसरी ओर परिवार का भविष्य। इनके बीच खड़ा होता है अस्पताल का बिल।

कई बार बीमारी से लड़ते-लड़ते परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर हो जाती है कि उपचार पूरा करना ही सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। ऐसे में दवाओं और चिकित्सा सेवाओं की कीमतों में पारदर्शिता केवल आर्थिक विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न भी बन जाती है।

दवा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था को और प्रभावी बनाने की जरूरत

भारत में औषधियों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) जैसी व्यवस्था मौजूद है। आवश्यक दवाओं की कीमतों के नियमन का उद्देश्य मरीजों को अत्यधिक मूल्य वृद्धि से राहत देना है।

लेख में उद्धृत संसदीय समिति की चिंताओं के अनुसार, गैर-अनुसूचित दवाओं के बड़े हिस्से के व्यापार मार्जिन और शुरुआती मूल्य निर्धारण की निगरानी को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता बनी हुई है। आम मरीज के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसे अक्सर यह जानकारी नहीं होती कि दवा की वास्तविक खरीद कीमत क्या है और अंतिम बिल में उससे कितनी राशि वसूली जा रही है।

2019 में 42 कैंसर रोधी दवाओं पर व्यापार मार्जिन सीमा लागू किए जाने के बाद 526 ब्रांडों के अधिकतम खुदरा मूल्य में औसतन करीब 50 प्रतिशत की कमी दर्ज होने और अनुमानित वार्षिक बचत करीब 984 करोड़ रुपये होने का उल्लेख भी इस बहस में महत्वपूर्ण है। इससे यह सवाल उठता है कि जहां नियमन से मरीजों का आर्थिक बोझ कम किया जा सकता है, वहां पारदर्शी और प्रभावी निगरानी को और व्यापक क्यों न बनाया जाए?मशीनें मरीज की जिंदगी बचाएं, बिल परिवार को न डुबोए

आधुनिक चिकित्सा ने गंभीर बीमारियों के उपचार की संभावनाओं को काफी बढ़ाया है। अत्याधुनिक मशीनें, नई दवाएं और विशेषज्ञ चिकित्सकीय सेवाएं आज उन मरीजों को भी उपचार का अवसर देती हैं, जिनके लिए कुछ दशक पहले विकल्प बेहद सीमित थे।

लेकिन क्या चिकित्सा की सफलता का अर्थ केवल यह है कि मशीन मरीज की धड़कन बचा ले और उपचार का बिल उसके परिवार को आर्थिक संकट में डाल दे?यदि इलाज जीवन बचाता है लेकिन उसका खर्च परिवार को तोड़ देता है, तो स्वास्थ्य नीति की सफलता अधूरी मानी जाएगी। सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के माध्यम से गरीबों और जरूरतमंदों को उपचार उपलब्ध कराया जाता है, तो सार्वजनिक धन के उपयोग में भी पारदर्शिता उतनी ही जरूरी है।

क्रय मूल्य, आपूर्ति मूल्य, मरीज के बिल और सरकारी योजना से मिलने वाली प्रतिपूर्ति के बीच डिजिटल रिकॉर्ड क्यों न बनाया जाए? असामान्य मूल्य-अंतर दिखाई देने पर स्वतः जांच की व्यवस्था क्यों न विकसित की जाए?

तकनीक से संभव है दवा की पूरी कीमत का डिजिटल ट्रैक

आज के डिजिटल दौर में ऐसी व्यवस्था बनाना तकनीकी रूप से असंभव नहीं है। दवा की पहचान संख्या, निर्माता, क्रय मूल्य, अस्पताल तक पहुंचने की कीमत, मरीज को बेची गई कीमत और बिल की जानकारी को एक डिजिटल प्रणाली से जोड़ा जा सकता है।

ऐसी व्यवस्था से न केवल मरीज को पारदर्शिता मिलेगी, बल्कि नियामक संस्थाओं को भी असामान्य मूल्य-अंतर की पहचान करने में मदद मिल सकती है। जहां मूल्य निर्धारण सामान्य सीमा से बाहर दिखाई दे, वहां स्वतः जांच या ऑडिट की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

हालांकि हर महंगी दवा को स्वतः अनुचित कीमत वाली दवा मानना और प्रत्येक चिकित्सक या अस्पताल को कमीशनखोरी से जोड़ना भी उचित नहीं होगा। चिकित्सा क्षेत्र में अनुसंधान, विशेषज्ञता, जटिल उपचार, अस्पताल का बुनियादी ढांचा और अन्य वास्तविक खर्च होते हैं। सवाल वहां उठना चाहिए जहां असामान्य मूल्य-अंतर, अपारदर्शी बिलिंग, अनुचित बंधन या सार्वजनिक धन के संभावित दुरुपयोग के संकेत मौजूद हों।

मरीज व्यवस्था का सबसे कमजोर पक्ष

चिकित्सा व्यवस्था में मरीज सबसे कमजोर पक्ष होता है। सभ्य समाज की पहचान इसी बात से होती है कि वह सबसे कमजोर व्यक्ति की रक्षा किस हद तक करता है।दवा उद्योग को लाभ चाहिए, अस्पताल को राजस्व चाहिए और सरकार को प्रभावी स्वास्थ्य व्यवस्था चाहिए—लेकिन इन सबके बीच मरीज और उसका परिवार आर्थिक रूप से कुचल जाए, तो स्वास्थ्य व्यवस्था के सेवा पक्ष पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

अब आवश्यकता केवल नई मशीनें लगाने की नहीं, बल्कि चिकित्सा व्यवस्था में नई नैतिकता और अधिक पारदर्शिता स्थापित करने की भी है। दवा की कीमत स्पष्ट हो, अस्पताल की खरीद प्रक्रिया पारदर्शी हो, मरीज की बिलिंग समझने योग्य हो और सरकारी भुगतान का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध हो।

चिकित्सकीय पर्चे में जहां संभव और कानूनसम्मत हो, सक्रिय औषधीय घटक का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाना चाहिए। मरीज को वैध वैकल्पिक स्रोत से दवा खरीदने की स्वतंत्रता मिले और असामान्य मूल्य-अंतर की पहचान के लिए प्रभावी निगरानी तंत्र विकसित किया जाए।

न्यायालय के सवाल के बाद व्यवस्था को जवाब देना होगा

जब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दवाओं की कीमत में इस तरह के अंतर का मुद्दा उठता है, तो यह केवल किसी एक दवा या अस्पताल का मामला नहीं रह जाता। यह पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था में मूल्य पारदर्शिता, मरीज के अधिकार और चिकित्सा खर्च की जवाबदेही पर व्यापक चर्चा का अवसर बनता है।

इसका समाधान केवल भाषणों से नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था से निकलेगा जिसमें दवा और उपचार की कीमत मरीज की मजबूरी के आधार पर नहीं, बल्कि स्पष्ट, न्यायसंगत और पारदर्शी मानकों के आधार पर तय हो।गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार अस्पताल में अपना जीवन बचाने के लिए पहुंचते हैं, अपनी पूरी जिंदगी बेचने के लिए नहीं।अस्पताल तभी वास्तव में जीवन का मंदिर बन सकता है, जब वहां मरीज की सांस सबसे मूल्यवान चीज हो—उसकी मजबूरी नहीं।

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