रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट से मरीजों को मिली नई ज़िंदगी
Robotic joint replacement gives patients a new lease on life
Fri, 30 Jan 2026
लखनऊ, 30 जनवरी 2026: कोई उम्र के आख़िरी पड़ाव की पीड़ा लेकर आया था, तो कोई सड़क हादसे की चोट से जूझ रहा था। किसी का घुटना खेल के दौरान मुड़ गया, तो किसी की पुरानी चोट असहनीय दर्द का कारण बन गई। ऐसे कई मरीजों के जीवन में मेदांता हॉस्पिटल ने नई उम्मीद और खुशियां भरी हैं।
शुक्रवार को मेदांता हॉस्पिटल में डायरेक्टर ऑर्थोपेडिक्स एवं रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ. सौरव शुक्ला के नेतृत्व में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में विभिन्न मरीजों ने अपने अनुभव साझा किए। इसमें घुटना, कूल्हा और कंधे की जटिल सर्जरी शामिल थीं। जो मरीज पहले सामान्य रूप से चल भी नहीं पाते थे, वे अब मॉर्निंग वॉक करने, सीढ़ियां चढ़ने और रोज़मर्रा के काम सहजता से कर रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब घुटनों की कार्टिलेज घिसने लगती है तो दर्द, चरमराहट और चलने में कठिनाई शुरू हो जाती है। यह समस्या आमतौर पर 40 वर्ष की उम्र के बाद शुरू होती है और समय के साथ गंभीर होती जाती है। शुरुआती अवस्था में फिजियोथेरेपी, दवाइयों और जीवनशैली में बदलाव से राहत मिल सकती है, लेकिन जब जोड़ अत्यधिक खराब हो जाते हैं तो जॉइंट रिप्लेसमेंट ही प्रभावी उपचार बनता है।
ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों का कहना है कि हड्डियों से जुड़ी सर्जरी में नी रिप्लेसमेंट सबसे सफल सर्जरी मानी जाती है। सर्जरी के बाद मरीज सीढ़ियां चढ़ने, बाज़ार जाने, घर के काम करने और रसोई में लंबे समय तक खड़े रहकर भोजन बनाने जैसे कार्य सामान्य रूप से कर पाते हैं।
अब रोबोटिक नी रिप्लेसमेंट तकनीक से घुटनों का अलाइनमेंट बेहद सटीक हो गया है, चीरा छोटा लगता है, अस्पताल में कम समय रुकना पड़ता है और अधिकांश मरीज सर्जरी वाले दिन ही चलना शुरू कर देते हैं। उचित सावधानियों के साथ यह सर्जरी 20 वर्षों तक आरामदायक परिणाम देती है।
डॉ. सौरव शुक्ला ने कहा, “40 वर्ष की उम्र के बाद घुटनों की कार्टिलेज घिसने लगती है, जिससे दर्द और चलने में परेशानी होती है। शुरुआत में दवाइयों, फिजियोथेरेपी और जीवनशैली में बदलाव से राहत मिलती है, लेकिन जब जोड़ अधिक खराब हो जाएं तो जॉइंट रिप्लेसमेंट ही सही विकल्प होता है। यह समस्या महिलाओं में अधिक देखी जाती है। पहले लोगों को लगता था कि नी रिप्लेसमेंट के बाद प्राकृतिक घुटनों जैसा अनुभव नहीं होता, लेकिन रोबोटिक तकनीक ने यह धारणा बदल दी है। अब मरीज कम दर्द के साथ जल्दी चलने लगते हैं और सामान्य जीवन जी पाते हैं।”
मरीजों के अनुभव:
71 वर्षीय राजेश कुमार, जिनके दोनों घुटनों का टोटल नी रिप्लेसमेंट किया गया, पहले चल भी नहीं पाते थे और अब पूरी तरह सक्रिय जीवन जी रहे हैं।
67 वर्षीय वैज्ञानिक डॉ. अंजू पुरी लेफ्ट नी रिप्लेसमेंट के बाद पूरी तरह फिट हैं।
77 वर्षीय प्रसिद्ध शिक्षक राजेंद्र कुमार श्रीवास्तव के दोनों घुटनों का टोटल नी रिप्लेसमेंट हुआ और वे अब बिना सहारे चल रहे हैं।
26 वर्षीय अली नवाज़ खान, जिन्हें पहले हुए ट्रॉमा के बाद संक्रमण और इम्प्लांट फेल्योर की समस्या हो गई थी, पहले संक्रमण का सफल इलाज किया गया और बाद में टोटल हिप रिप्लेसमेंट किया गया। अब वे पूरी तरह स्वस्थ हैं।
69 वर्षीय मिथिलेश कुमारी, जिनके पहले दोनों घुटनों का रिप्लेसमेंट हो चुका था, बाद में दाहिने कंधे की रिवर्स शोल्डर आर्थ्रोप्लास्टी की गई, जिसके परिणाम अत्यंत संतोषजनक रहे।
वहीं अभिषेक सिंह तोमर का एसीएल रिकंस्ट्रक्शन और मल्टी ट्रॉमा सर्जरी सफल रही, जबकि गंभीर सड़क दुर्घटना में घायल निश्चय कुमार भी अब सामान्य जीवन जी रहे हैं।
आधुनिक रोबोटिक तकनीक और अनुभवी चिकित्सकों की टीम के चलते जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी के परिणाम लगातार बेहतर हो रहे हैं। समय पर जांच, सही परामर्श और उन्नत तकनीक से अब घुटना, कूल्हा और कंधे की जटिल समस्याओं से जूझ रहे मरीज भी दर्दमुक्त, सक्रिय और आत्मनिर्भर जीवन जी पा रहे हैं।
