रोबोटिक नी रिप्लेसमेंट: दर्द और डर से मुक्ति, चलने की नई उम्मीद
लखनऊ।
भारत में घुटने का दर्द, विशेषकर ऑस्टियोआर्थराइटिस (OA) के कारण होने वाला दर्द, एक गंभीर और आम समस्या है। यह अक्सर 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में देखा जाता है, जिसमें महिलाओं में इसकी संभावना पुरुषों की तुलना में अधिक होती है। मोटापा, आनुवंशिक इतिहास या जोड़ों की पिछली चोटें इस रोग के जोखिम को बढ़ा देती हैं। यह दर्द धीरे-धीरे बढ़ता है, जिससे जकड़न होती है और चलने-फिरने में गंभीर कठिनाई आती है, जो अंततः बुजुर्गों में विकलांगता का एक प्रमुख कारण बन जाती है।
इलाज की आवश्यकता
यद्यपि ऑस्टियोआर्थराइटिस का कोई स्थायी इलाज नहीं है, शुरुआती चरण में वजन नियंत्रण, हल्की कसरत, फिजियोथेरेपी और दवाओं से लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन जब पारंपरिक उपाय काम नहीं करते हैं और दर्द असहनीय हो जाता है, तब नी रिप्लेसमेंट (घुटना प्रत्यारोपण) सर्जरी की आवश्यकता पड़ती है।
रोबोटिक सर्जरी: सटीकता और सुरक्षा का नया दौर
मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत में ऑर्थोपेडिक्स, जॉइंट्स एवं रोबोटिक सर्जरी विभाग के ग्रुप चेयरमैन और चीफ सर्जन डॉ. एस.के.एस. मार्या ने इस नई तकनीक के बारे में जानकारी दी:अक्सर लोग 'रोबोट' शब्द सुनकर यह समझते हैं कि मशीन अपने आप सर्जरी करती है, जबकि सच्चाई यह है कि सर्जन ही हर प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। रोबोट एक हाई-टेक असिस्टेंट की तरह काम करता है, जो सर्जरी को अत्यंत सटीकता और सुरक्षा के साथ पूरा करने में मदद करता है।"
डॉ. मार्या ने समझाया, "इसे ऐसे समझें जैसे सर्जरी के लिए जीपीएस (GPS) — दिशा डॉक्टर तय करता है, पर रोबोट सटीक मार्ग दिखाता है।"
पारंपरिक बनाम रोबोटिक सर्जरी
| पहलू | पारंपरिक सर्जरी | रोबोटिक-एसिस्टेड नी रिप्लेसमेंट |
| प्रक्रिया | सर्जन हाथ से हड्डी हटाकर इम्प्लांट लगाते थे, जिसमें मानवीय त्रुटि की संभावना थी। | सर्जन कंप्यूटर-गाइडेड सिस्टम से मिलीमीटर की सटीकता के साथ हड्डी काटते हैं और इम्प्लांट लगाते हैं। |
| परिणाम | इम्प्लांट की पोज़िशनिंग में थोड़ी चूक की संभावना। | जोड़ अधिक नैचुरल और लंबे समय तक टिकाऊ बनता है। |
नई तकनीक के लाभ
रोबोटिक-एसिस्टेड नी रिप्लेसमेंट तकनीक मरीजों को कई अतिरिक्त लाभ प्रदान करती है:
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कम नुकसान: आसपास के टिश्यू को कम नुकसान पहुँचता है।
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तेज़ रिकवरी: सर्जरी मिनिमली इनवेसिव होती है (कम चीरा, कम खून बहना, कम दर्द) जिससे जल्दी रिकवरी होती है।
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रेडिएशन से राहत: इस नई तकनीक में CT स्कैन की आवश्यकता नहीं पड़ती है, जिससे मरीज़ रेडिएशन के संपर्क से बचते हैं।
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टिकाऊ इम्प्लांट: क्लीनिकल स्टडीज़ दर्शाती हैं कि इम्प्लांट की पोज़िशनिंग अधिक सटीक होने के कारण, इम्प्लांट ज्यादा समय तक टिकता है।
डॉ. मार्या ने जोर देकर कहा कि "यह जानना ज़रूरी है कि सर्जरी में हर निर्णय सर्जन का होता है, रोबोट केवल सहायता करता है।"
