आरटीई का सच: गरीबों का हक मार रहे 'फर्जी' अमीर; विभाग की अनदेखी से अपात्रों को मिल रही फ्री शिक्षा

The Truth About RTE: 'Fake' Rich Families Usurp the Rights of the Poor; Departmental Negligence Grants Free Education to Ineligible Candidates.
 
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लखनऊ: भारत सरकार द्वारा 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) 2009' इस उद्देश्य से लागू किया गया था कि आर्थिक रूप से कमजोर और अलाभित समूह के बच्चों को भी निजी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित कई जनपदों में इस योजना की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। आज यह योजना वास्तविक गरीबों के बजाय उन 'अमीरों' के लिए वरदान साबित हो रही है, जो फर्जी दस्तावेजों के सहारे सिस्टम में सेंध लगा रहे हैं।

फर्जी आय प्रमाण पत्र: गरीबों के हक पर डाका

आरटीई के नियमानुसार, केवल वही अभिभावक आवेदन कर सकते हैं जिनकी वार्षिक आय एक लाख रुपये से कम है। लेकिन हकीकत यह है कि 5 से 10 लाख रुपये प्रति वर्ष कमाने वाले लोग भी मात्र 80 हजार रुपये का फर्जी आय प्रमाण पत्र बनवाकर अपने बच्चों का प्रवेश महंगे स्कूलों में करा रहे हैं।

  • पुराना रिकॉर्ड छिपाना: कई अपात्र अभिभावक अपने बच्चों का नाम पहले से चल रहे निजी स्कूलों से कटवाकर, आरटीई के माध्यम से और भी बड़े स्कूलों में प्रवेश दिलाने का खेल खेल रहे हैं।

  • आयु का हेरफेर: निर्धारित आयु सीमा में फिट बैठने के लिए फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनवाना अब एक आम बात हो गई है।

बेसिक शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल

पहले आरटीई की प्रक्रिया ऑफलाइन थी, जिसमें जांच की गुंजाइश रहती थी। अब ऑनलाइन प्रक्रिया होने के बाद सत्यापन का कार्य पूरी तरह ठप नजर आ रहा है।

  1. भौतिक सत्यापन का अभाव: विभाग द्वारा निवास प्रमाण पत्र और आय प्रमाण पत्र का मौके पर जाकर सत्यापन नहीं किया जा रहा है।

  2. लक्ष्य पूरा करने की होड़: अधिकारियों पर प्रवेश का लक्ष्य पूरा करने का दबाव होता है, जिसके चलते वे नियमों को ताक पर रखकर किसी भी आवेदन को हरी झंडी दे देते हैं।

  3. दबाव की राजनीति: लॉटरी में नाम आने के बाद जब स्कूल अपात्रता के आधार पर विरोध करते हैं, तो विभाग के ही अधिकारी स्कूलों पर फोन कर प्रवेश लेने का अनैतिक दबाव बनाते हैं।

नियमों का मजाक और 'पलीता' लगाता भ्रष्टाचार

नियमों के अनुसार, आवेदन के साथ बीपीएल राशनकार्ड या अंत्योदय कार्ड की जांच अनिवार्य होनी चाहिए, लेकिन विभाग केवल ऑनलाइन प्रिंटआउट के आधार पर आवंटन कर रहा है। यदि विभाग ईमानदारी से भौतिक सत्यापन करे, तो आरटीई के तीन-चौथाई से अधिक लाभार्थी अपात्र घोषित होकर बाहर हो जाएंगे।

अपात्रों की इस घुसपैठ के कारण वह वास्तविक गरीब बच्चा शिक्षा से वंचित रह जाता है, जिसके लिए यह कानून बनाया गया था। सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना को खुद विभाग के लापरवाह अधिकारी और भ्रष्ट सिस्टम पलीता लगा रहे हैं। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो 'समान शिक्षा' का सपना केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।

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