RTE Admission Scam: नियमों को ताक पर रखकर अपात्रों के एडमिशन भेज रहा बेसिक शिक्षा विभाग; फरवरी से बंद है आधिकारिक वेबसाइट
विशेष ब्यूरो, लखनऊ (16 जून 2026):
उत्तर प्रदेश में 'शिक्षा का अधिकार' (RTE) अधिनियम के तहत गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा दिलाने का दावा प्रशासनिक लापरवाही और विभागीय भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। राजधानी लखनऊ सहित पूरे प्रदेश से ऐसे गंभीर मामले सामने आ रहे हैं, जहां शिक्षा विभाग अपने तय लक्ष्यों को कागजों पर पूरा करने के लिए न सिर्फ नियमों को दरकिनार कर रहा है, बल्कि निजी स्कूलों पर अवैध रूप से दाखिले (Admission) का दबाव भी बना रहा है।
इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी का सबसे बड़ा कारण यह है कि आरटीई (RTE) की आधिकारिक वेबसाइट इस साल फरवरी महीने से लेकर आज तक नहीं खुल पा रही है।
वेबसाइट ठप: NIC पर पल्ला झाड़ रहा बेसिक शिक्षा विभाग
नियमों के अनुसार, आरटीई के तहत चयनित किसी भी बच्चे के दाखिले से पहले स्कूलों और जनता के लिए 'आरटीई लिस्ट' तथा 'स्टूडेंट स्टेटस' का ऑनलाइन दिखना अनिवार्य है। इसी डिजिटल डेटा से चयनित बच्चे की पात्रता और सत्यता की जांच की जा सकती है।
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तकनीकी विफलता: जब से इस सत्र की आरटीई प्रवेश प्रक्रिया आरंभ हुई है, तब से वेबसाइट पूरी तरह ठप पड़ी है।
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जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा: हैरानी की बात यह है कि बेसिक शिक्षा विभाग इस दिशा में कोई सार्थक कदम उठाने के बजाय अपनी जिम्मेदारी नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) पर मढ़ रहा है। अधिकारियों का तर्क है कि वेबसाइट का रखरखाव और उसे ठीक करना केवल एनआईसी का काम है।
पहले से पढ़ रहे बच्चों को ही दोबारा भेज रहे आरटीई में, स्कूलों पर दबाव
विभागीय अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए निजी स्कूल संचालकों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। आरटीई के स्पष्ट नियमों के मुताबिक, यदि कोई बच्चा पहले से ही किसी मान्यता प्राप्त निजी विद्यालय में पढ़ रहा है, तो वह उसी या किसी अन्य स्कूल में नए सिरे से आरटीई (निःशुल्क सीट) के तहत प्रवेश पाने का पात्र नहीं हो सकता।
परंतु, विभागीय साठगांठ और लापरवाही के चलते अधिकारी उन्हीं बच्चों के नाम आरटीई सूची में अलॉट कर रहे हैं जो पहले से संबंधित स्कूलों में पढ़ रहे हैं। इतना ही नहीं, विभाग के अधिकारी निजी स्कूलों के प्रबंधकों को फोन करके इन अपात्र बच्चों का जबरन दाखिला लेने का मानसिक दबाव बना रहे हैं। इस विभागीय विसंगति के कारण अपात्र बच्चों के अभिभावक हर दिन स्कूलों में आकर विवाद और झगड़ा कर रहे हैं।
फर्जी आय प्रमाण पत्रों का खेल: नहीं होती कोई जमीनी जांच
आरटीई अधिनियम के तहत केवल 'अलाभित समूह' (Unprivileged Group) और 'दुर्बल आय वर्ग' (EWS) के बच्चों को ही निःशुल्क शिक्षा का अधिकार है। इसके लिए नियमानुसार अभिभावक के पास बीपीएल (BPL) राशन कार्ड या प्रामाणिक आय दस्तावेज होने चाहिए।
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फर्जीवाड़ा: जमीनी हकीकत यह है कि समाज में अच्छी आर्थिक हैसियत रखने वाले और अच्छी नौकरियों में कार्यरत लोग भी कथित तौर पर 60,000 से 80,000 रुपये वार्षिक आय का फर्जी प्रमाण पत्र बनवाकर आवेदन कर देते हैं।
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जांच का अभाव: बेसिक शिक्षा विभाग इन आवेदनों में लगे आय या निवास प्रमाण पत्रों की कोई भौतिक या प्रशासनिक जांच (Verification) नहीं करता। विभाग केवल लॉटरी सिस्टम के जरिए नाम निकालकर सीधे निजी स्कूलों को सूची भेज देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आज के समय में एक ई-रिक्शा चालक भी औसतन एक हजार रुपये प्रतिदिन के हिसाब से सालाना 3 लाख रुपये से अधिक कमा लेता है। ऐसे में संपन्न परिवारों द्वारा फर्जी कागजात के सहारे दुर्बल आय वर्ग का लाभ उठाना पूरी तरह से उन वास्तविक और पात्र बच्चों के अधिकारों पर डाका डालने जैसा है, जो इस मुफ्त शिक्षा के असली हकदार हैं।

