संस्कार और संवाद: नासमझी और उत्सुकता के भंवर में फंसती आज की किशोरियां
शारीरिक बदलाव और उत्सुकता का जोखिम
किशोरावस्था में कदम रखते ही शरीर में कई तरह के प्राकृतिक और हार्मोनल बदलाव होते हैं। इन नए बदलावों के साथ किशोरियों के मन में अपने शरीर और बाहरी दुनिया को लेकर उत्सुकता (Curiosity) बहुत तीव्र हो जाती है। कई बार यह उत्सुकता प्रयोग (Experiments) करने की प्रबल इच्छा में बदल जाती है।
विडंबना यह है कि आज के डिजिटल दौर में कुछ किशोरियां बाहरी दुनिया और सोशल मीडिया के तड़क-भड़क वाले रंग को ही असली जिंदगी मान बैठती हैं। वे दुनियादारी को समय से पहले समझने का भ्रम पाल लेती हैं और इसी नासमझी में अपने बहुमूल्य जीवन को संकट में डाल देती हैं। परिणाम यह होता है कि वे असामाजिक तत्वों और शोहदों के बिछाए जाल में फंस जाती हैं। शुरुआत मीठी बातों और दोस्ती से होती है, जो धीरे-धीरे शारीरिक और मानसिक शोषण की कगार पर पहुंच जाती है। जब तक उन्हें वास्तविकता का होश आता है, तब तक वे भावनात्मक और सामाजिक रूप से काफी टूट चुकी होती हैं।
ब्रेनवॉश और झांसे का मायाजाल
इस उम्र में किशोरियों का मन बेहद कोमल और प्रभावित होने वाला होता है। इसी का फायदा उठाकर कई बार चालाक और शातिर लोग उन्हें बड़े-बड़े झांसे, लालच और मीठे सपने दिखाकर अपने वश में कर लेते हैं। यह एक तरह का मानसिक सम्मोहन या 'ब्रेनवॉश' (Brainwashing) होता है, जिसमें फंसने के बाद किशोरियां अपने माता-पिता, भाई-बहन या परिवार के अन्य शुभचिंतकों की बातों को पूरी तरह नजरअंदाज करने लगती हैं। वे किसी की सलाह नहीं मानतीं और अपनी ही धुन में आगे बढ़ते हुए अनजाने में खुद को तबाही की ओर ले जाती हैं।
सुरक्षा की ढाल: घर और संस्कारों का माहौल
किशोरियों को इस भंवर से निकालने और तबाही से बचाने का सबसे अचूक उपाय किसी बाहरी संस्था से नहीं, बल्कि खुद के घर से ही निकलता है। इस दिशा में माता-पिता की भूमिका सबसे अहम है:
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आदर्श आचरण: बच्चों को सही राह दिखाने के लिए माता-पिता को खुद अपने आचरण को संस्कारी और अनुशासित बनाना होगा। घर में एक पवित्र और नैतिक माहौल का होना बेहद जरूरी है।
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सभ्यता और व्यवहार का पाठ: किशोरियों को अपनी जड़ों, सभ्यता और पारिवारिक संस्कारों से जोड़कर रखना होगा। उन्हें यह सिखाना आवश्यक है कि घर और समाज के बड़े-बुजुर्गों तथा परिजनों के साथ कैसा आदरपूर्ण व्यवहार किया जाए।
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संगत पर पैनी नजर: माता-पिता और परिजनों को हमेशा इस बात के प्रति जागरूक रहना चाहिए कि उनकी बेटी की संगत (Friend Circle) कैसी है और वह स्कूल या कॉलेज में किसके साथ समय बिताती है। यदि शिक्षण संस्थानों में कोई असामान्यता या गड़बड़ी दिखे, तो तुरंत प्रबंधन से शिकायत करनी चाहिए।
डिजिटल युग में सामग्री (Content) का चयन
चूंकि किशोरियों के मानस पर परिजनों की आदतों का गहरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए परिवार के बड़ों को भी अपनी इच्छाओं पर थोड़ा नियंत्रण रखना होगा।
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क्या न देखें: किशोरियों की मौजूदगी में घर के भीतर हिंसा, अश्लीलता या भटकाने वाली फिल्में और सोशल मीडिया रील्स देखने से पूरी तरह बचना चाहिए।
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क्या देखें: इसके स्थान पर उन्हें स्वच्छ, प्रेरणादायक और वैचारिक रूप से मजबूत बनाने वाले रचनात्मक कार्यक्रम दिखाने चाहिए।
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कला और संस्कृति से जुड़ाव: किशोरियों के मन में रामायण, महाभारत और रामचरितमानस जैसे महान ग्रंथों के आदर्शों को स्थापित करना चाहिए। इसके साथ ही, उन्हें भारतीय श्रृंगार, शास्त्रीय नृत्य, संगीत और कला के प्रति जागरूक बनाना पूरी तरह से परिवार के वश की ही बात है।
परिपक्वता और एक उज्ज्वल भविष्य
जब यही किशोरियां सही मार्गदर्शन और संस्कारों की छत्रछाया में 20-21 वर्ष की आयु के आसपास पहुंचती हैं, तो वे मानसिक रूप से काफी सुलझ चुकी होती हैं। इस उम्र तक आते-आते उनमें इतनी समझ आ जाती है कि वे किसी भी तरह के झांसे या ब्रेनवॉश से खुद को बचा सकें।
संस्कारित बेटियां अपने जीवन के हर अच्छे-बुरे अनुभव को अपनी मां या बड़ी दीदी के साथ खुलकर साझा करती हैं, जिससे वे किसी भी गलत रास्ते पर जाने से पहले ही सकारात्मक समाधान तक पहुंच जाती हैं। वे समाज में सिर उठाकर जीती हैं और अपनी अगली पीढ़ी को भी वही श्रेष्ठ संस्कार हस्तांतरित करती हैं। ऐसी बेटियां भविष्य में अपने बच्चों को कभी भी भौतिक लालच में नहीं पड़ने देतीं और ईश्वर द्वारा दी गई सीमाओं में खुश रहने व संतोष का वास्तविक पाठ पढ़ाती हैं।

