संत रविदास: प्रेम, एकता और समानता के संदेशवाहक

Sant Ravidas: A messenger of love, unity, and equality.
 
संत रविदास: प्रेम, एकता और समानता के संदेशवाहक

(इंजी. अतिवीर जैन ‘पराग’)  पंद्रहवीं शताब्दी में जब समाज जाति-पात, ऊँच-नीच और धार्मिक भेदभाव से ग्रस्त था, ऐसे समय में संत रविदास का जन्म माघ पूर्णिमा, सन् 1377 में वाराणसी जनपद के अंतर्गत सीरगोवर्धन गाँव में हुआ। आज भी प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा पर संत रविदास जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। इस अवसर पर प्रभात फेरियाँ निकलती हैं और देशभर में धार्मिक-सामाजिक आयोजन होते हैं।
संत रविदास के जन्म और मृत्यु वर्ष को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं, पर उनका सामाजिक कार्यकाल लगभग 1450 से 1520 के मध्य माना जाता है। उनकी आयु 120 से 150 वर्ष के बीच बताई जाती है।

संत रविदास की माता का नाम कलसा देवी तथा पिता का नाम संतोषदास रघु था। उनके पिता चर्मकार थे और जूते-चप्पल बनाने का कार्य करते थे। उनका विवाह लोनादेवी से हुआ, जिनसे उन्हें एक पुत्र विजयदास और एक पुत्री रविदासिनी हुई। कहा जाता है कि उनका जन्म रविवार को हुआ था, इसी कारण उनका नाम ‘रविदास’ पड़ा।

बाल्यावस्था में रविदास जी अपने गुरु पंडित शारदानंद जी की पाठशाला में शिक्षा ग्रहण करते थे। समाज के कुछ लोगों ने इसका विरोध भी किया, परंतु गुरुजी ने उनकी प्रतिभा, आचरण और मेधा को देखकर उन्हें पढ़ाना जारी रखा। गुरु शारदानंद जी यह भली-भाँति समझ चुके थे कि रविदास कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि भविष्य के महान समाज सुधारक हैं।

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संत रविदास काशी के स्वामी रामानंदाचार्य के शिष्य थे। संत कबीर उनके समकालीन और गुरु-भाई थे। कबीर ने ही उन्हें ‘संत रविदास’ कहकर संबोधित किया और वे ‘संत शिरोमणि’ व ‘सतगुरु’ की उपाधियों से विभूषित हुए।

तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था पर प्रहार करते हुए संत रविदास ने कहा—

“जाति-जाति में जाति है, जो केतन के पात।
रैदास मनुष न जुड़ सके, जब तक जाति न जात॥”

अर्थात जिस प्रकार केले के तने को परत-दर-परत छीला जाए तो अंत में कुछ नहीं बचता, उसी प्रकार जाति-भेद मानवता को नष्ट कर देता है।

उन्होंने स्पष्ट कहा—

“जनम जात मत पूछिए, का जात अरु पात।
रैदास पूत सब प्रभु के, कोए नहिं जात कुजात॥”

मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, कर्म से होती है—

“रविदास जन्म के कारने, होत न कोई नीच।
नर कूं नीच करि डारि है, ओछे कर्म की कीच॥”

संत रविदास सभी प्रकार के भेदभाव को निरर्थक मानते थे। उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव—सब एक ही परमेश्वर के नाम हैं। वे कहते हैं—

“कृष्ण, करीम, राम, हरी, राघव जब लग एक न पेखा।
वेद, कतेब, कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा॥”

उनका मानना था कि भक्ति में ही शक्ति है—

“रैदास कहे जाके हृदय, रहे रैन दिन राम।
सो भगता भगवान सम, क्रोध न व्यापे काम॥”

विनम्रता का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि जैसे विशाल हाथी शक्कर के दाने नहीं चुन सकता, जबकि छोटी चींटी चुन लेती है—

“कह रैदास तेरी भक्ति दूरि है, भाग बड़े सो पावे।
तजि अभिमान मेटी आपा पर, पीपीलक ह्वै चुनी खावे॥”

‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ की कथा उनके कर्मयोग और आंतरिक शुद्धता के दर्शन को स्पष्ट करती है।

संत रविदास के शिष्यों में मीराबाई, राणा सांगा की पत्नी झाला रानी, राजा पीपा, राजा नागरमल, सिकंदर लोदी सहित अनेक शासक और भक्त थे। चित्तौड़गढ़ दुर्ग में उनकी छतरी तथा वाराणसी में गुरु रविदास स्मारक, पार्क और घाट आज भी उनके प्रभाव की साक्षी हैं। कहा जाता है कि काशी नरेश ने उनकी दैवीय शक्तियों से प्रभावित होकर दलितों को पूजा का अधिकार दिया।

संत रविदास के चालीस पद सिख धर्म के पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित किए। उनकी भाषा में अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली, उर्दू और फ़ारसी का सुंदर समन्वय मिलता है।

आज जब लोकतंत्र में भी जाति और धर्म के नाम पर समाज को बाँटने के प्रयास हो रहे हैं, तब संत रविदास के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। उनकी जयंती पर यह संकल्प लेना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम जाति-पात और भेदभाव से ऊपर उठकर समानता, सम्मान और मानवता के मार्ग पर चलेंगे।

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