कटाक्ष: बेरोकटोक आज़ादी की बेलगाम चाह और सुविधावादी आंदोलनों का सच

Satire: The unbridled desire for unfettered freedom and the reality of opportunistic movements.
 
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सुधाकर आशावादी — विभूति फीचर्स

जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र में अपनी बात कहने, असहमति जताने और सरकार का विरोध करने के लिए आंदोलन का अपना महत्व है। गांधी जी ने भी अहिंसा और सत्याग्रह को संघर्ष का माध्यम बनाया था। लेकिन समय के साथ आंदोलन के तौर-तरीके और उनके उद्देश्यों पर सवाल भी उठते रहे हैं।

लोकतंत्र में अक्सर सिद्धांत और व्यवहार के बीच एक बड़ा अंतर दिखाई देता है। जब सुविधा हो तो आदर्शों की बातें की जाती हैं और जब निजी स्वार्थ सामने आता है तो वही आदर्श कहीं पीछे छूट जाते हैं। कभी राम नाम का सहारा लिया जाता है और काम निकल जाने के बाद उसी आस्था से दूरी बना ली जाती है।

आंदोलनों का भी अपना अलग संसार है। जंतर-मंतर पर हर प्रदर्शन में शामिल होने वाला व्यक्ति जरूरी नहीं कि किसी विचारधारा से प्रेरित हो। कुछ लोग किसी संगठन या समूह के आह्वान पर पहुंचते हैं, तो कुछ केवल भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं। कहीं भोजन-पानी की व्यवस्था हो, कहीं दूसरी सुविधाएं मिल रही हों, तो कई लोगों के लिए आंदोलन विचार से ज्यादा अवसर बन जाता है।

ऐसे माहौल में नारों का महत्व भी बढ़ जाता है। नारे लगाने के लिए किसी गहरी वैचारिक प्रतिबद्धता की जरूरत नहीं होती। जिस मंच से जो नारा मिल जाए, वही आवाज भीड़ में शामिल हो जाती है। सवाल यह है कि आखिर इन नारों के पीछे वास्तविक उद्देश्य क्या है?

“हमें चाहिए आजादी”—यह नारा सुनने में आकर्षक है, लेकिन सवाल यह है कि आजादी किससे और कैसी?

क्या आजादी का अर्थ कानून और व्यवस्था की सीमाओं से बाहर निकल जाना है? क्या इसका मतलब अपनी जिम्मेदारियों से मुक्ति है? क्या भ्रष्टाचार करने, व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने, हिंसा को सही ठहराने या मनमानी करने की आजादी भी लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा हो सकती है?

नारे अनेक हो सकते हैं—वंशवाद से आजादी, महंगाई से आजादी, बेरोजगारी से आजादी, भेदभाव से आजादी, भ्रष्टाचार से आजादी। इन मांगों पर लोकतांत्रिक बहस हो सकती है और होनी भी चाहिए। लेकिन जब आजादी का अर्थ कानून के शासन को नकारना, हिंसा को वैध ठहराना या राष्ट्र और समाज के प्रति जिम्मेदारियों से मुक्त होना समझ लिया जाए, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसी आजादी किसके लिए और किस उद्देश्य से मांगी जा रही है?

आंदोलन का अधिकार लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन आंदोलन के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, मगर असहमति का अर्थ अराजकता नहीं हो सकता। विरोध का अधिकार है, लेकिन हिंसा का अधिकार नहीं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन उसके साथ कानून और सामाजिक जिम्मेदारी की सीमाएं भी हैं।

आजादी केवल अधिकारों का नाम नहीं है। वह जिम्मेदारियों का भी नाम है। जिस समाज में हर व्यक्ति केवल अपने अधिकारों की बात करे और अपने कर्तव्यों से बचना चाहे, वहां आजादी धीरे-धीरे अव्यवस्था में बदल सकती है।

सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि समाज किसी एक व्यक्ति से नहीं बनता। परिवार, समुदाय, संस्थाएं और राष्ट्र—सभी एक-दूसरे के सहयोग से अस्तित्व में रहते हैं। कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वतंत्र होकर समाज से अलग नहीं रह सकता। इसलिए आजादी का अर्थ दूसरों के अधिकारों को समाप्त करना नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना है।

व्यक्ति किसी विशेष व्यवस्था या व्यक्ति से आजादी हासिल कर सकता है, लेकिन आजाद रहने के लिए जिम्मेदारी, अनुशासन और आत्मसंयम की जरूरत होती है। केवल नारे किसी को क्रांतिकारी नहीं बनाते और भीड़ का हिस्सा बन जाना किसी विचारधारा का प्रमाण नहीं है।

इसलिए ‘आजादी’ के हर नारे के साथ एक सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए—आजादी किससे, किसलिए और किस सीमा तक?

क्योंकि बेरोकटोक आजादी की मांग जितनी आकर्षक सुनाई देती है, उतनी ही खतरनाक तब हो सकती है जब उसमें जिम्मेदारी और कानून के लिए कोई स्थान न बचे।

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