25वीं बार रक्तदान कर सर्वेश सिंह ने पेश की मानव सेवा की मिसाल
2004 में शुरू हुआ सेवा का सिलसिला
सर्वेश सिंह ने वर्ष 2004 में पहली बार रक्तदान किया था। इसके बाद उन्होंने समय-समय पर जरूरत के अनुसार रक्तदान करना जारी रखा। उनके लिए रक्तदान किसी विशेष दिवस या अभियान तक सीमित गतिविधि नहीं रहा, बल्कि यह लंबे समय से निभाई जा रही मानव सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा बन चुका है। 25वीं बार रक्तदान के अवसर पर उन्होंने कहा कि यदि स्वस्थ और पात्र व्यक्ति नियमित रूप से रक्तदान के लिए आगे आएं तो जरूरतमंद मरीजों की मदद की जा सकती है।
सेना से सेवानिवृत्ति के बाद भी जनसेवा से जुड़े
सर्वेश सिंह भारतीय सेना में अपनी सेवाएं देने के बाद सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्होंने लखनऊ में उद्यमिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। इसके साथ ही सामाजिक सरोकारों और जनसेवा से जुड़े कार्यों में भी उनकी सक्रियता बनी रही।ग्रामीण परिवेश से निकलकर सेना और उद्यमिता जैसे विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने के बावजूद सर्वेश सिंह का अपने क्षेत्र, समाज और जरूरतमंद लोगों से जुड़ाव कायम रहा है।
युवाओं को दिया सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश
सर्वेश सिंह का 25वां रक्तदान इस बात का उदाहरण है कि समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए हमेशा बड़े आयोजनों की आवश्यकता नहीं होती। व्यक्ति के छोटे लेकिन निरंतर प्रयास भी किसी जरूरतमंद के जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते हैं।
रक्त की उपलब्धता कई बार मरीज के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में नियमित रक्तदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना और स्वस्थ एवं पात्र लोगों को आगे आने के लिए प्रेरित करना सामाजिक जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सर्वेश सिंह की 25 बार रक्तदान करने की यात्रा युवाओं को मानव सेवा और सामाजिक सहभागिता के लिए प्रेरित करती है। उनका मानना है कि रक्तदान के माध्यम से किसी अनजान व्यक्ति के जीवन को बचाने में योगदान देने का अवसर मिलता है।
“रक्तदान महादान है”
सर्वेश सिंह ने लोगों से रक्तदान के लिए आगे आने की अपील करते हुए कहा कि “रक्तदान महादान है। किसी के जीवन को बचाने से बड़ा मानव सेवा का अवसर कोई नहीं।”
उनकी यह निरंतर सेवा-यात्रा समाज में रक्तदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने और अधिक से अधिक स्वस्थ एवं पात्र लोगों को इस मानवीय कार्य से जोड़ने का संदेश देती है।
