शनिवार विशेष: रामचरितमानस में कृतघ्न व्यक्ति का स्वभाव
आज सप्ताहांत और जुलाई के अंतिम सप्ताह का अंतिम दिन शनिवार है, जो न्याय और कर्मफल के देवता शनिदेव को समर्पित माना जाता है।
जीवन, समाज और मानव स्वभाव से जुड़ी अनेक गूढ़ बातें ऐसी हैं, जो श्रीरामचरितमानस में अत्यंत सरल और प्रभावशाली ढंग से मिलती हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने ग्रंथ की शुरुआत ही इस भाव से की है कि इसकी शिक्षाएं वेद, पुराण और शास्त्रों के सार पर आधारित हैं।
उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि–गरुड़ संवाद के दौरान तुलसीदास जी कृतघ्न (अहसान भूलने वाले) और दुष्ट व्यक्ति के स्वभाव का वर्णन करते हुए कहते हैं—
काम क्रोध मद लोभ परायन।
निर्दय कपटी कुटिल मलायन॥
बैर अकारन सब काहू सों।
जो कर हित अनहित ताहू सों॥
जेहि ते नीच बड़ाई पावा।
सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा॥
धूम अनल संभव सुनु भाई।
तेहि सुभाव घन पदवी पाई॥
इन चौपाइयों में तुलसीदास जी बताते हैं कि दुष्ट व्यक्ति काम, क्रोध, अहंकार और लोभ से प्रेरित होता है। वह बिना कारण दूसरों से वैर रखता है और जो उसका भला करता है, उसी का अहित करने से भी नहीं चूकता।
अंतिम चौपाई विशेष रूप से गहन अर्थ लिए हुए है। तुलसीदास जी धुएँ और अग्नि का उदाहरण देते हैं। धुआँ अग्नि से उत्पन्न होता है और उसी के कारण आगे चलकर बादल बनने की प्रक्रिया का हिस्सा बनता है। किंतु जब बादल बन जाते हैं, तो वर्षा करके उसी अग्नि को बुझाने का कार्य करते हैं। इस उपमा के माध्यम से वे संकेत करते हैं कि कृतघ्न व्यक्ति भी अक्सर उसी का सबसे पहले विरोध करता है, जिसके सहयोग से उसे सम्मान, शक्ति या प्रतिष्ठा मिली होती है।
यह उदाहरण मानव स्वभाव के एक ऐसे पक्ष को उजागर करता है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था। साथ ही, यह हमें कृतज्ञता, सदाचार और उपकार का सम्मान करने की प्रेरणा भी देता है।
श्रीहरि।
ॐ नमः शिवाय।
ध्यान रहे कि इस चौपाई की अंतिम उपमा एक काव्यात्मक और नैतिक रूपक है। इसके कई पारंपरिक टीकाकार अलग-अलग अर्थ भी बताते हैं, इसलिए इसे एकमात्र या अंतिम व्याख्या के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रमुख भावार्थ के रूप में समझा जाता है।
