लोकतंत्र बचाओ अभियान: लोकतंत्र खतरे में है या सियासी जमीन?

'Save Democracy' Campaign: Is democracy in danger, or is it the political landscape?
 
लोकतंत्र बचाओ अभियान: लोकतंत्र खतरे में है या सियासी जमीन?

सुधाकर आशावादी | विनायक फीचर्स  :  अभियान लोकतंत्र बचाने का है या अपने पैरों के नीचे खिसकती जमीन बचाने का? इसका समुचित उत्तर किसी के पास नहीं है। फिर भी दोनों पक्ष आमने-सामने हैं। एक पक्ष कह रहा है कि लोकतंत्र खतरे में है और देश तानाशाही की दिशा में आगे बढ़ रहा है। दूसरा पक्ष कह रहा है कि लोकतंत्र को खतरा उन लोगों से है, जो बिना सोचे-समझे अराजकता फैलाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करना चाहते हैं।

दोनों पक्ष लोकतंत्र को खतरे में बता रहे हैं। इसका अर्थ यही निकलता है कि लोकतंत्र वास्तव में चर्चा के केंद्र में है और उसके भविष्य को लेकर राजनीतिक टकराव लगातार बढ़ रहा है।\ सवाल यह है कि लोकतंत्र खतरे की जद में कैसे और कब आया? क्या वास्तव में लोकतंत्र खतरे में है? यदि है, तो उसे इस खतरे से मुक्त करने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं?

लोकतंत्र को खतरे में बताकर विरोध का झंडा बुलंद करने वाले एक मित्र से मैंने पूछा- महोदय, जब तक लोकतंत्र आपकी हवेलियों से संचालित होता था, क्या तब तक वह पूरी तरह सुरक्षित था? क्या उस समय उसे कोई खतरा नहीं था? जब लोकतंत्र आपकी हवेली की कैद से मुक्त हुआ, क्या तभी से वह खतरे में आ गया?

लोकतंत्र बचाओ अभियान: लोकतंत्र खतरे में है या सियासी जमीन?

वह बोले- आप बिल्कुल सच कहते हैं। तब लोकतंत्र सुरक्षित था। मेरे परिजनों ने उसे अपनी तिजोरी में बड़े जतन से सहेजकर रखा था, ताकि उस पर किसी दूसरे की नजर न पड़े। अब जिसे देखो, वही लोकतंत्र की दुहाई दे रहा है। खुलेआम लोकतंत्र का अपहरण किया जा रहा है।

मैंने पूछा- तो लोकतंत्र को इस खतरे से निकालने के लिए क्या प्रयास किए जाने चाहिए? क्या लोकतंत्र को अपहरण से बचाने के लिए सुरक्षा बलों का पहरा कड़ा कर देना चाहिए? वह बोले- नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए। बस, जो लोग लोकतंत्र की चोरी के दोषी हैं, उन्हें जेल में डाल दिया जाना चाहिए। लोकतंत्र को फिर से हमारी हवेली में आकर रहना चाहिए। हम ऐसा अवश्य करेंगे। हम खुली चुनौती देते हैं कि लोकतंत्र के चोर हमारे सामने आत्मसमर्पण करें और अपनी बेगुनाही के सबूत दें। इसके बाद हम तय करेंगे कि लोकतंत्र को किस तरह बचाना है।

मैंने कहा- जिन्हें आप लोकतंत्र का चोर बता रहे हैं, वे भी लोकतंत्र बचाओ अभियान चला रहे हैं। जैसे आप सड़क पर हैं, वैसे ही वे भी सड़क पर उतर रहे हैं। मित्र महोदय खिलखिलाकर हंसे और बोले- अब समझे न! हम भी यही चाहते थे कि लोकतंत्र को बचाने का ठेका जिनके पास है, वे भी स्वीकार कर लें कि लोकतंत्र खतरे में है। उन्होंने भी हमारी बात मान ली। यह हमारी जीत की शुरुआत है।

मैंने कहा- मित्र महोदय, आप किस दुनिया में जी रहे हैं? उनका कहना है कि कुछ अराजक तत्व लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बाधित करके देश में अव्यवस्था फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं पर बेबुनियाद आरोप लगाकर जनता को भ्रमित किया जा रहा है। इसलिए वे संवैधानिक मर्यादाओं, सुशासन और शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखने के लिए जनजागरण अभियान चला रहे हैं। उनका नारा है- 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ।

मित्र महोदय के चेहरे पर कोई विशेष भाव नहीं था। कुछ देर चुप रहने के बाद बोले- मुझे बार-बार यही फीलिंग आ रही है कि लोकतंत्र चोरी हो गया है। जब तक लोकतंत्र मेरी हवेली में आकर मेरी तिजोरी में नहीं रहेगा, तब तक मैं सड़क पर उतरकर लोकतंत्र बचाओ आंदोलन करता ही रहूंगा।

लोकतंत्र बचाने की इस लड़ाई में सबसे बड़ा सवाल यही है कि लोकतंत्र जनता के पास रहेगा या उसे अपनी-अपनी हवेली में कैद करने की कोशिश होती रहेगी?

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