खेत बचाओ अभियान: क्या कंक्रीट के जंगलों के बीच सिर्फ संतुलित खाद से बच पाएगी देश की कृषि भूमि?

Save the Fields Campaign: Amidst the Concrete Jungles, Will the Nation's Agricultural Land Survive Solely on Balanced Fertilization?
 
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लेखक: पवन वर्मा (साभार: विनायक फीचर्स)

भूमिका: केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में कृषि मंत्रालय ने पूरे देश में "खेत बचाओ अभियान" की शुरुआत करने की घोषणा की है। सरकारी कागजों और फाइलों पर यह योजना बेहद आकर्षक और महत्वपूर्ण नजर आती है। इसमें मिट्टी की सेहत (Soil Health) सुधारने, संतुलित मात्रा में उर्वरकों (Fertilizers) के उपयोग को बढ़ावा देने, किसानों को समय पर वैज्ञानिक सलाह उपलब्ध कराने और योजनाओं को पंचायत स्तर तक ले जाने का एक बेहतरीन खाका तैयार किया गया है।

लेकिन, यहाँ एक सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यह खड़ा होता है कि क्या केवल रासायनिक खादों और उर्वरकों के सही प्रबंधन से 'खेत' सचमुच बच पाएंगे? आज जब देश भर में खेती की सबसे उपजाऊ जमीनों को रियल एस्टेट के कारोबारियों के सामने परोसा जा रहा है, तब यह अभियान इस गंभीर संकट की अनदेखी करता हुआ प्रतीत होता है।

रियल एस्टेट और अनियंत्रित शहरीकरण की गिद्ध नजर

आज देश के हर छोटे-बड़े शहर के बाहरी इलाकों (Periphery) में स्थित कृषि भूमि पर बिल्डरों की पैनी नजर है। वे भोले-भाले किसानों से ओने-पौने दामों में खेत खरीदकर, वहाँ फॉर्म हाउस, रिसॉर्ट और छोटे-छोटे आवासीय प्लॉट काटकर बेच रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस गंभीर विषय पर न तो राज्य सरकारों के पास कोई ठोस नीति है और न ही केंद्र सरकार के पास कोई स्पष्ट कार्ययोजना। साफ शब्दों में कहें तो, सरकारों की सोच अभी इस दिशा में जा ही नहीं रही है कि कंक्रीट के बढ़ते फैलाव से खेतों को कैसे सुरक्षित रखा जाए।

 कृषि मंत्री के गृह क्षेत्र 'विदिशा' का कड़वा सच

इस नए अभियान की सफलता या विफलता को परखने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्री के अपने संसदीय क्षेत्र विदिशा से बेहतर कोई दूसरा पैमाना नहीं हो सकता। विदिशा, सांची और भोजपुर जैसी ऐतिहासिक व विश्व-धरोहर (World Heritage) वाली इस पावन धरती का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है। स्वयं कृषि मंत्री के भी इस क्षेत्र में बड़े-बड़े खेत हैं, लेकिन आज यही इलाका एक डरावनी सच्चाई का सामना कर रहा है।

यहाँ पर्यटन और आधुनिक विकास के नाम पर उपजाऊ कृषि भूमि का क्षेत्रफल जिस रफ्तार से घट रहा है, वह बेहद विचलित करने वाला है। केंद्रीय मंत्री के अपने ही क्षेत्र में खेतों की छाती पर ईंट-पत्थरों के बड़े-बड़े बंगले, व्यावसायिक इमारतें और अवैध कॉलोनियां खड़ी हो चुकी हैं और कई नई कॉलोनियां धड़ल्ले से काटी जा रही हैं। जब सांची और विदिशा के आसपास की जमीनों को व्यावसायिक लाभ के लिए कंवर्ट (Land Conversion) किया जा रहा हो, तो ऐसे में 'खेत बचाओ अभियान' केवल खाद की उचित मात्रा बताने तक ही सिमट कर रह जाएगा। आखिर जब जमीन ही नहीं बचेगी, तो किसान संतुलित खाद का उपयोग कहाँ करेगा?

 'खेत' बच रहे हैं या केवल 'खेती की प्रक्रिया'?

इस सरकारी अभियान में यूरिया और अन्य रासायनिक खादों का अंधाधुंध उपयोग कम करने और मृदा परीक्षण (Soil Testing) की बातें तो प्रमुखता से शामिल हैं, लेकिन बिल्डरों के चंगुल से खेतों को आजाद कराने का कोई एजेंडा नजर नहीं आता। आखिर क्यों इस अभियान में उस 'कॉलोनी-कटिंग संस्कृति' को रोकने के लिए कोई कड़ा कानूनी प्रावधान नहीं किया गया, जो दिन-प्रतिदिन हमारी खाद्य सुरक्षा (Food Security) के आधार को निगल रही है?

एक बड़ा सवाल: यदि एक आम किसान को कड़ी मेहनत के बाद भी खेती से होने वाला मुनाफा, किसी बिल्डर द्वारा दिए गए मोटी रकम के चेक से कम मिलेगा, तो वह अपनी जमीन को खेती के लिए क्यों बचा कर रखेगा? यह अभियान किसान की इस कड़वी आर्थिक मजबूरी को समझने में पूरी तरह नाकाम रहा है।

इस 'खेत बचाओ अभियान' के नाम में तो बहुत वजन है, लेकिन इसमें 'भू-उपयोग' (Land Use) के कड़े नियंत्रण को लेकर एक शब्द भी नहीं कहा गया है। क्या यह अभियान सिर्फ खाद के कट्टे बांटने की एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाएगा, या यह बिल्डरों और प्रशासनिक तंत्र के उस गठजोड़ को चुनौती दे पाएगा जो उपजाऊ खेतों को रातों-रात रिहायशी प्लाटों में बदल देता है?

 पंचायतों की लाचारी और कागजी दावे

कृषि मंत्री ने इस अभियान में ग्रामीण पंचायतों को मजबूत करने और उनकी भागीदारी बढ़ाने की बात कही है। लेकिन असलियत यह है कि यदि देश की पंचायतें अपने गांवों की उपजाऊ जमीनों पर हो रही अवैध प्लॉटिंग को रोकने के लिए कानूनी रूप से सक्षम ही नहीं हैं, तो इस अभियान में उनकी हिस्सेदारी का भला क्या औचित्य रह जाता है?

वास्तविकता यह है कि आज के दौर में एक छोटे और सीमांत किसान के लिए उसका खेत 'मातृभूमि' या आजीविका का साधन कम और एक 'प्रॉपर्टी' ज्यादा बन गया है। बिल्डर्स और कॉलोनाइजर उन्हें यह हसीन सपना बेच रहे हैं कि "खेती का झंझट छोड़ो और रातों-रात समृद्ध बनो।" यदि इस अभियान को सचमुच एक जन-आंदोलन का रूप देना है, तो इसका रुख सबसे पहले इन कॉलोनाइजरों के खिलाफ करना होगा। जब तक उपजाऊ कृषि भूमि को आवासीय या व्यावसायिक प्लाट में बदलने पर पूर्ण कानूनी प्रतिबंध नहीं लगेगा और खेती को रियल एस्टेट से अधिक मुनाफे का सौदा नहीं बनाया जाएगा, तब तक ऐसी योजनाएं सिर्फ सरकारी फाइलों की शोभा बढ़ाएंगी।

कंक्रीट के जंगलों के आगे खड़ा होना होगा

शिवराज सिंह चौहान का यह अभियान तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तो बेहद उपयोगी है, लेकिन दीर्घकालिक दूरदर्शिता के मामले में अधूरा है। आज अकेले विदिशा ही नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्तान के खेतों का यही हाल है— दिन-प्रतिदिन खेती योग्य भूमि का रकबा सिकुड़ता जा रहा है।

सरकार और स्वयं केंद्रीय कृषि मंत्री को यह सच्चाई खुले दिल से स्वीकार करनी होगी कि देश के खेतों को खतरा केवल 'असंतुलित खाद' के उपयोग से नहीं है, बल्कि उस 'असंतुलित और अनियोजित शहरीकरण' से भी है जो आने वाले समय में हमारी थाली से अन्न छीनने की ताकत रखता है। यदि सरकार वाकई में खेतों को बचाना चाहती है, तो उसे कंक्रीट के बढ़ते इन जंगलों के आगे मजबूती से खड़ा होना होगा। अन्यथा, आने वाले समय में हमारे पास मिट्टी के बेहतरीन हेल्थ कार्ड की रिपोर्ट तो होगी, लेकिन उस पर बुवाई करने के लिए एक इंच जमीन भी मयस्सर नहीं होगी।

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