सावित्रीबाई फुले : सामाजिक एकता, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की अग्रदूत

Savitribai Phule: Pioneer of social unity, education and women's empowerment
 
Savitribai Phule: Pioneer of social unity, education and women's empowerment
(हेमंत खुटे – विभूति फीचर्स)   ज्ञान की ज्योति सावित्रीबाई फुले ने अपने अदम्य साहस, दूरदर्शिता और दृढ़ संकल्प से भारतीय समाज में शिक्षा, समानता और नारी जागरण की अलख जगाई। उनका सम्पूर्ण जीवन सामाजिक परिवर्तन और मानवता की सेवा की अनुपम मिसाल है। वे न केवल भारत की प्रथम महिला शिक्षिका थीं, बल्कि एक महान समाजसेविका, शिक्षाविद् और कवयित्री भी थीं, जिन्होंने नारी अस्मिता को सम्मान और पहचान दिलाई।

सावित्रीबाई फुले  ने अपने पति महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर वर्ष 1848 में पुणे में भारत का पहला बालिका विद्यालय स्थापित किया। उस दौर में महिलाओं की शिक्षा को पाप माना जाता था। समाज के तीव्र विरोध, अपमान और असहिष्णुता—यहाँ तक कि पत्थर, गोबर और कीचड़ फेंके जाने जैसी घटनाओं—के बावजूद उन्होंने अपने संकल्प से पीछे हटने से इनकार कर दिया। उन्होंने न केवल बालिकाओं को शिक्षित किया, बल्कि विधवाओं के अधिकारों, छुआछूत, बाल विवाह और सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध भी निर्भीक संघर्ष किया। वे भारतीय नारी शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की सच्ची प्रतीक थीं।

सावित्रीबाई फुले शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का सबसे प्रभावी हथियार मानती थीं। उनका विश्वास था कि शिक्षित व्यक्ति ही सामाजिक बेड़ियों को तोड़ सकता है। शिक्षा मनुष्य को सोचने-समझने की शक्ति देती है, जबकि अज्ञानता उसे अंधविश्वास, रूढ़ियों और अन्यायपूर्ण परंपराओं का गुलाम बना देती है। जब तक व्यक्ति शिक्षित नहीं होता, वह सही-गलत का भेद नहीं कर पाता और शोषण को ही अपना भाग्य मान लेता है। शिक्षा उसे प्रश्न करने, तर्क करने और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस प्रदान करती है।
सावित्रीबाई फुले सामाजिक एकता, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की अग्रदूत थीं। उन्होंने बालिकाओं, विधवाओं और उपेक्षित वर्गों की शिक्षा के लिए विद्यालय खोलकर ऐतिहासिक पहल की। छुआछूत, बाल विवाह और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष करते हुए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज सुधार को समर्पित कर दिया। उनके प्रयासों से नारी शिक्षा और आत्मसम्मान को नई दिशा मिली।
उनका प्रसिद्ध कथन—
“अज्ञानता को पकड़ो, उसे धर दबोचो, मजबूती से थामो और उसे अपने जीवन से भगा दो”—
आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके समय में था।
उन्नीसवीं शताब्दी में, जब स्त्रियों को शिक्षा, स्वतंत्रता और सम्मान से वंचित कर केवल घर-गृहस्थी तक सीमित कर दिया गया था, सावित्रीबाई फुले ने इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था को खुली चुनौती दी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि स्त्रियाँ केवल घर और खेत तक सीमित रहने के लिए नहीं बनी हैं, बल्कि वे पुरुषों के समान—और अनेक क्षेत्रों में उनसे बेहतर—कार्य करने में सक्षम हैं। यह विचार उस दौर की सामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध एक क्रांतिकारी घोषणा थी। उन्होंने बाल विवाह और सती प्रथा का पुरजोर विरोध किया तथा विधवा महिलाओं को आश्रय और सम्मान दिलाने के लिए ठोस प्रयास किए।
1 जनवरी 1848 भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम दिन है, जब सदियों से स्त्री जीवन पर छाया अंधकार छंटा और ज्ञान की रोशनी पहुँची। इसी दिन पुणे के भिड़ेवाड़ा में ज्योतिबा फुले ने लड़कियों के लिए पहला विद्यालय खोला, जहाँ सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम महिला अध्यापिका बनीं। फुले दंपति यहीं नहीं रुके—1848 से 1852 के बीच मात्र चार वर्षों में उन्होंने 18 विद्यालयों की स्थापना की।
विद्यालय जाते समय सावित्रीबाई फुले को असामाजिक तत्वों द्वारा निरंतर अपमान और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, किंतु वे डिगीं नहीं। उन्होंने हर बाधा के बावजूद बालिकाओं को पढ़ाया और उन्हें ज्ञान के पथ पर अग्रसर किया।
क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले ने ताउम्र नारी शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया। उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया और अपनी कविताओं के माध्यम से शिक्षा तथा जातिगत भेदभाव के विरुद्ध जनचेतना जगाई। काव्यफुले (1854) और बावनकशी सुबोध रत्नाकर (1892) उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं।
उनका मानना था कि सच्ची पूजा वही है, जो मानवता, करुणा और न्याय के मार्ग पर ले जाए। ज्ञान मनुष्य को अन्याय, भेदभाव और शोषण के विरुद्ध खड़े होने की शक्ति देता है। बिना ज्ञान के धर्म अंधविश्वास बन सकता है, जबकि ज्ञान से जुड़ा धर्म मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
सावित्रीबाई फुले कहा करती थीं कि आभूषण स्त्री के शरीर को सजा सकते हैं, किंतु शिक्षा उसके विचारों, आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता को सजाती है। आभूषण समय के साथ नष्ट हो सकते हैं, लेकिन शिक्षा रूपी गहना जीवन भर चमकता रहता है। इसलिए प्रत्येक समाज का दायित्व है कि वह हर बेटी को शिक्षा का यह अमूल्य गहना अवश्य पहनाए।
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वर्ष 1897 में पुणे में फैली भीषण प्लेग महामारी के दौरान, जब लोग मरीजों के पास जाने से भयभीत थे, सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवन की परवाह किए बिना पीड़ितों की सेवा की। इसी सेवा भाव के कारण वे स्वयं संक्रमण की चपेट में आ गईं और अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनका यह बलिदान मृत्यु नहीं, बल्कि मानवता को समर्पित एक अमर जीवनगाथा है।
(लेखक डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी स्मृति पुरस्कार से सम्मानित हैं)
(विभूति फीचर्स)
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