Selfie Obsession: ब्लैक एंड व्हाइट कैमरे के दौर से डिजिटल सेल्फी पॉइंट तक; खुशी हो या गम, अब हर पल 'सेल्फी' है हरदम
Changing Era of Photography and Selfie Culture: एक दौर था जब घर में किसी सदस्य का फोटो खिंचवाना किसी बड़े अनुष्ठान या त्योहार से कम नहीं होता था। अमूमन पासपोर्ट साइज फोटो की जरूरत पड़ने पर फोटो स्टूडियो जाने की योजना कई दिन पहले से बनती थी। बकायदा नहा-धोकर, सबसे अच्छे कपड़े पहनकर और बालों में कंघी करके ही कैमरे के सामने बैठने की कवायद होती थी।
उस जमाने में आज की तरह 'इंस्टेंट' फोटो का चलन नहीं था। अगर कहीं तुरंत फोटो चाहिए भी होती थी, तो काले कपड़े से ढके लकड़ी के बड़े खांचे वाले पारंपरिक कैमरे की शरण लेनी पड़ती थी। अन्यथा, आम दिनों में फोटोग्राफर रील पूरी होने का इंतजार करता था और फोटो तैयार करके देने की तारीख एक कागज की रसीद पर लिखकर थमा देता था।
📱 हर हाथ में एंड्रॉइड और सेलिब्रिटी बनने की चाह
कहते हैं कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। बदलते वक्त के साथ फोटोग्राफी की तकनीक में ऐसा क्रांतिकारी बदलाव आया कि भारी-भरकम कैमरों की जगह अब स्लिम स्मार्टफोन ने ले ली है। आज भले ही हर हाथ को रोजगार न मिला हो, लेकिन देश के अधिकांश हाथों में एंड्रॉइड या आईफोन जैसे स्मार्टफोन जरूर पहुंच गए हैं।
अब मोबाइल सिर्फ बात करने का जरिया नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसा 'ऑल-इन-वन' टूल बन चुका है जो फोटो खींचने, वीडियो (रील) बनाने और उसे तुरंत सोशल मीडिया पर अपलोड करने का काम पलक झपकते ही कर देता है। इस डिजिटल क्रांति ने हर आम इंसान के भीतर 'सेलिब्रिटी' बनने की चाहत जगा दी है।
🗺️ प्राकृतिक नजारों से लेकर शादियों के 'सेल्फी पॉइंट' तक
चर्चित रहने और सोशल मीडिया पर 'लाइक्स-कमेंट्स' बटोरने की होड़ का ही नतीजा है कि आज हर व्यक्ति हर जगह अपने लिए एक परफेक्ट 'सेल्फी पॉइंट' तलाशता नजर आता है।
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दिखावे की संस्कृति: किसी बड़े सेलिब्रिटी या राजनेता को देखते ही लोग उनके साथ फ्रेम में आने के लिए उतावले हो जाते हैं।
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गैलरी से सोशल मीडिया तक: पारिवारिक उत्सवों, पार्टियों और यात्राओं के दौरान सेल्फी ले-लेकर मोबाइल की गैलरी भर दी जाती है, ताकि सही समय पर उन्हें फेसबुक या इंस्टाग्राम पर 'चेपा' (अपलोड) जा सके।
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स्मार्टफोन के सहायक: दिलचस्प बात यह है कि जिन्हें खुद सही एंगल से सेल्फी लेनी नहीं आती, वे इस 'पुनीत कार्य' को अंजाम देने के लिए अपने साथ किसी न किसी मित्र या सहायक को बतौर फोटोग्राफर लेकर चलते हैं।
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शादियों का नया ट्रेंड: पहले सेल्फी सिर्फ पहाड़ों, झरनों या ऐतिहासिक इमारतों जैसे प्राकृतिक स्थलों तक सीमित थी। लेकिन अब शादियों और बड़े आयोजनों में बकायदा लाखों रुपये खर्च करके खूबसूरत 'सेल्फी पॉइंट्स' तैयार किए जाते हैं, जहां सज-धज कर आए मेहमानों का तांता लगा रहता है।
😔 हद पार करती संवेदनशीलता: शोक सभाओं में भी सेल्फी
इस सेल्फी संस्कृति का सबसे स्याह और हैरान करने वाला पहलू तब सामने आता है, जब इंसानी भावनाएं और संवेदनशीलता इस तकनीक के आगे दम तोड़ देती हैं। आज के इस दौर में हद तो तब हो जाती है, जब किसी व्यक्ति के निधन पर आयोजित शोक सभा या श्रद्धांजलि सभा में भी लोग सेल्फी लेने से बाज नहीं आते।
मृतक की तस्वीर पर फूल चढ़ाते हुए दुख की मुद्रा में सेल्फी खींचना और फिर उसे तुरंत सोशल मीडिया पर 'फीलिंग सैड' (Feeling Sad) के कैप्शन के साथ पोस्ट करना आज के इंसानी व्यवहार की हकीकत बन चुका है।
ऐसा प्रतीत होता है कि पुराने दौर के मुकाबले आज के लोग ज्यादा 'प्रैक्टिकल' या व्यावहारिक हो गए हैं। हालात चाहे बेहद खुशी के हों या फिर गहरे गम के, आज की पीढ़ी सोशल मीडिया के जरिए हर स्थिति में 'सेल्फी-सेल्फी' खेलकर खुद को व्यस्त और प्रसन्न रखने का संदेश देने में बिल्कुल भी देर नहीं लगाती।

