सरहदों की दीवारों में सिसकती संवेदनाएं
(विवेक रंजन श्रीवास्तव – विभूति फीचर्स)
मनुष्य का समूचा इतिहास उसकी निरंतर गति और अदम्य जिज्ञासा का इतिहास है। आदिम काल के उस मानव की कल्पना कीजिए, जिसकी आँखों में पूरा आकाश समाया था और जिसके पाँव किसी कृत्रिम सीमा को नहीं पहचानते थे। तब धरती ही घर थी और उसका असीम विस्तार ही पहचान। कबीले चलते थे, सभ्यताएँ प्रवास करती थीं और संस्कृतियाँ किसी अविरल नदी की तरह एक-दूसरे में घुलती-मिलती थीं। न देशों के बीच कँटीली बाड़ थी, न पासपोर्ट, न वीजा। मनुष्य की पहचान उसके कर्म और पदचिह्नों से थी, कागज़ के बेजान दस्तावेज़ों से नहीं।
समय बदला। मनुष्य ने समुद्र पार करना सीखा तो दूरियाँ सिमटने लगीं। अन्वेषण के उस युग में Vasco da Gama, Christopher Columbus और Ferdinand Magellan जैसे नाविकों ने केवल नए भूखंड ही नहीं खोजे, बल्कि विचारों और व्यापार के सेतु भी बनाए। जहाज़ मसाले और रेशम के साथ दर्शन, कला और संस्कृतियाँ भी ले जाते थे। पर इसी जुड़ाव की कोख से साम्राज्यवाद की महत्वाकांक्षा भी जन्मी और मानचित्रों पर खींची जाने लगीं अधिकार-रेखाएँ।

विज्ञान और तकनीक ने इस विस्तार को और तीव्र किया। जब Wright brothers ने उड़ान भरी, तो आकाश से देखी गई धरती की सीमाएँ अर्थहीन प्रतीत हुईं। इंटरनेट आया तो लगा मानो हम सचमुच एक ‘वैश्विक ग्राम’ बन गए हों। न्यूयॉर्क की हलचल मुंबई की स्क्रीन पर और बीजिंग का बाज़ार लंदन की गलियों में दिखाई देने लगा। ‘Vasudhaiva Kutumbakam’ का दर्शन तकनीक के माध्यम से साकार होता दिखा। वैश्वीकरण ने साझा भविष्य का स्वप्न दिखाया, जहाँ बाज़ार और मानवता एक साथ खड़े हों।
पर इसी प्रगति के समानांतर एक सूक्ष्म विडंबना भी आकार लेती रही। संचार की गति बढ़ी, पर मानसिक सीमाएँ भी गहरी होती गईं। जिस तकनीक ने हमें ‘ग्लोबल’ बनाया, उसी ने नियंत्रण की नई व्यवस्थाएँ भी खड़ी कीं। प्रथम विश्व युद्ध के बाद ‘पासपोर्ट’ और ‘वीज़ा’ सुरक्षा के प्रतीक बने, पर धीरे-धीरे वे स्वतंत्रता की बेड़ियाँ बन गए। आज मनुष्य पहले डेटा, बायोमेट्रिक्स और दस्तावेज़ों का बंडल है, बाद में धड़कता हुआ इंसान। हवाई अड्डों की कतारें और इमिग्रेशन काउंटरों की पूछताछ आधुनिक दासता की प्रतीक-सी लगती हैं, जहाँ गरिमा कभी-कभी राष्ट्रीयता के ‘रैंक’ पर निर्भर दिखती है।
आज हम एक विचित्र द्वंद्व में जी रहे हैं। एक ओर मंगल और चंद्रमा पर बसने की योजनाएँ हैं, दूसरी ओर अपनी ही धरती पर दीवारें ऊँची की जा रही हैं। वैश्विकता का स्वप्न क्षेत्रीय राजनीति और कट्टर विचारधाराओं के शोर में दबता प्रतीत होता है। ‘माय कंट्री फर्स्ट’ का नारा तब तक सार्थक है, जब तक वह साझा मानवता की कीमत पर न हो। संरक्षणवाद की आड़ में यदि हम अपनी खिड़कियाँ बंद कर देंगे, तो हवा भी बासी हो जाएगी और सभ्यताएँ भी जड़।
कट्टरपंथ दरअसल भीतर के असुरक्षा-बोध और ‘पराये’ के भय से जन्म लेता है। यह भय हमें सुरक्षित नहीं, बल्कि एकाकी और हिंसक बनाता है। भूगोल दिलों को बाँटने लगता है और राजनीति संवेदनाओं पर हावी हो जाती है। संकीर्ण राष्ट्रीयता हमें सिखाती है कि जो हमारे जैसा नहीं, वह शत्रु है — जबकि सभ्यता का विकास विविधता के सह-अस्तित्व से ही संभव हुआ है।
हमें यह समझना होगा कि धरती पर खींची गई रेखाएँ प्रशासन की सुविधा के लिए हो सकती हैं, आत्मा की जेल के लिए नहीं। राष्ट्रों की सुरक्षा आवश्यक है, पर मनुष्यता का गला घोंटकर नहीं। एक पक्षी जब बिना वीज़ा के सीमा पार करता है, तो वह हमारी व्यवस्थाओं पर मौन व्यंग्य करता प्रतीत होता है। हवाओं, खुशबू और संगीत का कोई पासपोर्ट नहीं होता — क्योंकि प्रकृति जानती है कि विस्तार जीवन है और संकुचन मृत्यु।
यह समय आत्ममंथन का है — उस मानवीय चेतना की ओर लौटने का, जहाँ करुणा का कोई भौगोलिक मानचित्र न हो। हमें अपनी राष्ट्रीय पहचान के साथ-साथ अपनी सार्वभौमिक मानवता को भी बचाना होगा। जिस दिन एक इंसान दूसरे के दुख को बिना उसकी राष्ट्रीयता या धर्म पूछे महसूस करेगा, उसी दिन दिलों की दूरियाँ मिटेंगी।सरहदें नक्शों पर सुशोभित हों तो ठीक, पर संवेदनाओं के बीच नहीं। मानचित्र मनुष्य की रचना है, पर मनुष्यता उस असीम चेतना की संरचना है — जिसका विभाजन संभव नहीं।
