प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को रोके जाने पर विवाद, अखिलेश यादव का समर्थन
आज हम बात करने जा रहे हैं एक ऐसे विवाद की, जिसने सनातन धर्म, साधु-संतों की मर्यादा और राजनीति—तीनों को आमने-सामने ला खड़ा किया है। मामला है प्रयागराज के माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को रोके जाने का, और इस पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव के खुले समर्थन का। सवाल ये है—क्या ये सिर्फ एक प्रशासनिक घटना थी, या इसके पीछे कोई गहरी राजनीति छुपी है?
दोस्तों, सबसे पहले जानते हैं कि हुआ क्या। प्रयागराज में हर साल लगने वाला माघ मेला, जिसे कुंभ का छोटा स्वरूप माना जाता है, इस बार 13 जनवरी से 26 फरवरी 2026 तक आयोजित हो रहा है। संगम स्नान के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। 18 जनवरी, मौनी अमावस्या के दिन, ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के प्रमुख शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने अनुयायियों के साथ पालकी में सवार होकर संगम स्नान के लिए निकले। लेकिन इसी दौरान पुलिस ने उन्हें यह कहते हुए रोक दिया कि भीड़ नियंत्रण के कारण उन्हें पैदल जाना होगा।
यहीं से विवाद शुरू हुआ। समर्थकों और पुलिस के बीच बहस हुई, धक्का-मुक्की की नौबत आ गई। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे अपने पद और सनातन परंपरा का अपमान बताया और वहीं धरने पर बैठ गए। उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर सम्मानजनक समाधान नहीं हुआ तो वे अनशन पर बैठेंगे। उनके मुताबिक, यह केवल उनकी नहीं, बल्कि पूरे सनातन धर्म की गरिमा पर चोट है।
मामला यहीं नहीं रुका। अगले दिन यानी 19 जनवरी को मेला प्रशासन की ओर से उन्हें एक नोटिस भेजा गया, जिसमें सवाल उठाया गया कि वे “शंकराचार्य” की उपाधि का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं, जबकि इस पद को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इस पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 21 जनवरी को आठ पन्नों का विस्तृत जवाब दिया। उन्होंने नोटिस को वापस लेने की मांग की और साफ कहा कि यह तय करना प्रशासन या सरकार का काम नहीं है कि कौन शंकराचार्य है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब अन्य पीठों से जुड़े संत मेला क्षेत्र में मौजूद हैं, तो उन्हें ही क्यों निशाना बनाया गया।
प्रशासन की तरफ से सफाई आई कि किसी का अपमान नहीं किया गया, यह सिर्फ सुरक्षा और व्यवस्था का मामला था। लेकिन दोस्तों, संत समाज और आम श्रद्धालुओं में इस सफाई से नाराज़गी कम नहीं हुई। यहीं से इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग लेना शुरू कर दिया।
अब आते हैं अखिलेश यादव पर। 21 जनवरी को अखिलेश यादव ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से फोन पर बात की और खुलकर उनका समर्थन किया। अखिलेश ने कहा कि शंकराचार्य और साधु-संत सनातन धर्म की आत्मा हैं, और माघ मेले जैसे आयोजन उनकी गरिमा के बिना अधूरे हैं। उन्होंने अधिकारियों पर तीखा हमला करते हुए कहा कि शंकराचार्य से सर्टिफिकेट मांगना सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति का अपमान है। अखिलेश ने यहां तक कहा कि आज अधिकारी सत्ता को खुश करने में लगे हैं, और जो सरकार के हिसाब से नहीं चलता, उसे नोटिस या एजेंसियों का डर दिखाया जाता है।
दोस्तों, यह पहली बार नहीं है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवादों में आए हों। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में उनकी गैर-मौजूदगी, राहुल गांधी को लेकर दिए गए बयान—ये सब पहले भी चर्चा में रह चुके हैं। लेकिन इस बार मामला सिर्फ एक संत का नहीं, बल्कि उस परंपरा का है जिसकी नींव आदि शंकराचार्य ने रखी थी। चार पीठों की परंपरा, शंकराचार्य की मर्यादा और उनका सम्मान—ये सब सवालों के घेरे में आ गए हैं।
अब सवाल आपसे है दोस्तों। क्या यह वाकई सिर्फ लॉ-एंड-ऑर्डर का मामला था, या फिर संतों की आवाज़ को दबाने की कोशिश? क्या राजनीति अब धर्म के मंच पर ज़्यादा हावी हो रही है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताइए। वीडियो पसंद आए तो लाइक करें, शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें।
