“फैन हूं, अंधभक्त नहीं” — नेहरू पर शशि थरूर का बैलेंस्ड स्टैंड और 1962 युद्ध पर बेबाक सच
क्या कोई नेता किसी को पसंद भी कर सकता है… और उससे असहमत भी?
आज की राजनीति में तो ऐसा सोचना भी मुश्किल लगता है, है ना? लेकिन कांग्रेस के सीनियर नेता शशि थरूर ने यही बात कहकर एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लेकर साफ कहा — “मैं नेहरू का फैन हूं, लेकिन अंधभक्त नहीं।”
यही नहीं, थरूर ने 1962 के भारत-चीन युद्ध में हार की वजहों पर भी खुलकर बात की और बीजेपी सरकार पर तंज कसना भी नहीं भूले।
सबसे पहले जानते हैं कि शशि थरूर हैं कौन
थरूर कोई साधारण नेता नहीं हैं। वो संयुक्त राष्ट्र में अंडर-सेक्रेटरी जनरल रह चुके हैं, बेहतरीन लेखक हैं और तीन बार से लोकसभा सांसद हैं। ‘The Great Indian Novel’ और ‘Why I Am a Hindu’ जैसी किताबें उनकी पहचान हैं। अंग्रेज़ी पर जबरदस्त पकड़ है, लेकिन हिंदी भी उतनी ही सहजता से बोलते हैं। केरल के तिरुवनंतपुरम से सांसद थरूर सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव रहते हैं और अपने बेबाक विचारों के लिए जाने जाते हैं।
ये बयान कहां और कब आया?
8 जनवरी 2026 को केरल विधानसभा इंटरनेशनल बुक फेस्टिवल में शशि थरूर बोल रहे थे। मंच किताबों का था, लेकिन चर्चा राजनीति की हो गई। वजह थी जवाहरलाल नेहरू — जो आज की राजनीति में सबसे ज़्यादा बहस का विषय बन चुके हैं। बीजेपी अक्सर नेहरू को कश्मीर, चीन युद्ध और आर्थिक नीतियों के लिए जिम्मेदार ठहराती है। ऐसे माहौल में थरूर का यह बयान काफी अहम माना जा रहा है।
नेहरू पर थरूर का साफ-साफ स्टैंड
थरूर ने कहा, “मैं जवाहरलाल नेहरू का फैन हूं। उनकी सोच, उनकी दृष्टि और उनके योगदान का मैं सम्मान करता हूं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं उनके हर फैसले से सहमत हूं।”
ये बात आज के दौर में काफी अलग लगती है, क्योंकि यहां या तो पूरी पूजा होती है या पूरी निंदा। थरूर ने बीच का रास्ता चुना — तारीफ भी और आलोचना भी।
नेहरू के योगदान को क्यों नहीं नकारा जा सकता?
थरूर का कहना है कि नेहरू ने आज़ादी के बाद भारत में लोकतंत्र की मजबूत नींव रखी। संविधान, सेकुलर सोच, समानता, अभिव्यक्ति की आज़ादी — ये सब यूं ही नहीं आए। अगर आज हम वोट डाल पाते हैं, सवाल पूछ पाते हैं और खुलकर बहस कर पाते हैं, तो उसकी बुनियाद नेहरू के दौर में रखी गई। लेकिन इसके बावजूद, थरूर मानते हैं कि नेहरू को हर समस्या का जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। उनके शब्दों में, “नेहरू अब बलि का बकरा बन चुके हैं।”
अब आते हैं सबसे संवेदनशील मुद्दे पर — 1962 का भारत-चीन युद्ध
थरूर ने इस बात को स्वीकार किया कि 1962 की हार में नेहरू के फैसलों की भूमिका थी। उस वक्त ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा दिया जा रहा था, लेकिन चीन ने भारत पर हमला कर दिया। भारत सरकार की ‘फॉरवर्ड पॉलिसी’ के तहत सेना को सीमा पर आगे बढ़ाया गया, लेकिन सच्चाई ये थी कि हमारी तैयारी अधूरी थी — हथियार कम थे, इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर था और हालात बेहद कठिन थे।
हार की कीमत और नेहरू की जिम्मेदारी
इस युद्ध में भारत को भारी नुकसान हुआ, हजारों सैनिक शहीद हुए और अक्साई चिन हाथ से निकल गया। नेहरू पर आरोप लगे कि उन्होंने खुफिया चेतावनियों को नजरअंदाज किया और रक्षा तैयारियों को गंभीरता से नहीं लिया। थरूर मानते हैं कि इस मामले में नेहरू की जवाबदेही बनती है, क्योंकि फैसले उन्हीं के थे। लेकिन साथ ही वे ये भी कहते हैं कि हर आज की समस्या को 1962 से जोड़ना तर्कसंगत नहीं है।
बीजेपी पर थरूर का तंज
थरूर ने कहा, “मैं यह नहीं कहूंगा कि बीजेपी सरकार लोकतंत्र विरोधी है, लेकिन वे नेहरू विरोधी जरूर हैं।”
आज की राजनीति में नेहरू को लगभग हर बहस में घसीट लिया जाता है — चाहे कश्मीर हो, चीन हो या विकास परियोजनाएं। लेकिन थरूर का मानना है कि नेहरू के योगदान को पूरी तरह नकारना इतिहास के साथ अन्याय होगा।
नेहरू की विरासत जिसे भुलाया नहीं जा सकता
IIT, IIM जैसे संस्थान, नॉन-अलाइनमेंट मूवमेंट और ‘Discovery of India’ जैसी किताब — ये सब नेहरू की दूरदृष्टि का हिस्सा थे। भारत को बिना किसी बड़े गुट में शामिल हुए दुनिया में अपनी पहचान दिलाना आसान काम नहीं था। थरूर कहते हैं कि नेहरू की गलतियों को स्वीकार करना जरूरी है, लेकिन उनकी उपलब्धियों को भूलना भी उतना ही गलत है।
2026 में ये बयान क्यों मायने रखता है?
आज भारत एक बड़ी आर्थिक ताकत है, लेकिन चीन के साथ सीमा विवाद अब भी जारी हैं। गलवान घाटी जैसी घटनाएं हमें इतिहास की याद दिलाती हैं। ऐसे समय में शशि थरूर जैसा संतुलित नजरिया देना राजनीति में कम ही देखने को मिलता है, जहां हर बात ब्लैक या व्हाइट में देखी जाती है।
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