बिखरते परिवार और खोते संस्कार: आधुनिकता की अंधी दौड़ में 'क्लिक' जैसी हुई रिश्तों की उम्र; दिखावे की शादियों पर एक गंभीर विमर्श

Fragmenting Families and Eroding Values: In the Blind Race of Modernity, Relationships Have Become Fleeting—A Serious Discourse on Ostentatious Weddings.
 
बिखरते परिवार और खोते संस्कार: आधुनिकता की अंधी दौड़ में 'क्लिक' जैसी हुई रिश्तों की उम्र; दिखावे की शादियों पर एक गंभीर विमर्श

विशेष आलेख (लेखक: संदीप सिंह गहरवार-विनायक फीचर्स)

“धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी। आपतकाल परखिए चारी॥”

महान संत गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' की यह कालजयी चौपाई आज के २१वीं सदी के दौर में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी सदियों पहले थी। इस चौपाई के माध्यम से जीवन के चार सबसे महत्वपूर्ण आधार स्तंभों— धैर्य, धर्म, मित्र और जीवनसाथी की बात कही गई है, जिनकी वास्तविक परीक्षा केवल संकट या विपरीत परिस्थितियों में ही होती है। लेकिन दुर्भाग्यवश, आज के चकाचौंध भरे आधुनिक समाज में यदि किसी एक गुण की सबसे भारी कमी दिखाई दे रही है, तो वह है 'धैर्य' (Patience)

सफल 'प्रोफेशनल' तो बना रहे हैं, लेकिन 'सफल इंसान' बनाना भूले

आज के दौर में माता-पिता अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य को लेकर बेहद सजग हैं। उन्हें देश-विदेश की श्रेष्ठ शिक्षा दिलाना, कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल बनाना, लेटेस्ट टेक्नोलॉजी में एक्सपर्ट करना और आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर (हाई-पैकेज वाली जॉब) बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। समाज में प्रतिष्ठा पाने की इस अंधी होड़ में अक्सर एक बड़ी चूक हो रही है:

  • संस्कारों से दूरी: हम बच्चों को करियर की सीढ़ियां चढ़ना तो सिखा रहे हैं, लेकिन जीवन का सबसे अमूल्य संस्कार— धैर्य, सहनशीलता, आपसी सामंजस्य और रिश्तों को निभाने की कला सिखाना भूल रहे हैं।

  • फैमिली कोर्ट के बढ़ते मामले: आज परिवार न्यायालयों (Family Courts) में आने वाले अधिकांश वैवाहिक विवादों और तलाक के मामलों में एक बात सामान्य रूप से देखने को मिलती है— वह है छोटी-छोटी बातों पर 'ईगो' (अहंकार) का आड़े आना और समझौते की कमी।

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'इंस्टेंट' दुनिया में रिश्तों की गहराई हुई कम

आज की नई पीढ़ी स्मार्टफोन की दुनिया में पली-बढ़ी है, जहाँ एक क्लिक पर खाना, गाड़ी और हर सुविधा तुरंत हाजिर हो जाती है। त्वरित परिणामों (Instant Results) के आदी हो चुके युवाओं के लिए असल जिंदगी में:

  • रिश्तों को पर्याप्त समय देना,

  • साथी की भावनाओं और कमियों को स्वीकार करना,

  • विपरीत परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाना,

बेहद कठिन होता जा रहा है। इसका खामियाजा यह हो रहा है कि विवाह जैसा पवित्र और सामाजिक बंधन अब मामूली वैचारिक मतभेदों की भेंट चढ़कर टूटने लगा है।

संस्कारों का उत्सव या सोशल मीडिया का दिखावा?

भारतीय सनातन संस्कृति में विवाह को कोई कानूनी अनुबंध (Contract) नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आध्यात्मिक संस्कार माना गया है, जहां दो परिवारों का मिलन होता है। इसका उद्देश्य जीवन के हर सुख-दुख में एक-दूसरे का संबल बनना है। लेकिन आधुनिकता के अतिरेक ने विवाह के इस मूल स्वरूप को बदल दिया है:

  • दिखावे की होड़: आज शादियां पारिवारिक आत्मीयता का उत्सव होने के बजाय डेस्टिनेशन वेडिंग, भव्य प्री-वेडिंग शूट, आलीशान सेट और सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम-फेसबुक) पर लाइक्स पाने का एक बड़ा जरिया मात्र बनकर रह गई हैं।

  • कम होती आत्मीयता: इस दिखावे के कारण जहां कभी विवाह समाज और दूर-दराज के रिश्तेदारों को आपस में जोड़ने का माध्यम हुआ करता था, वहीं अब यह कुछ दिनों का केवल एक व्यावसायिक मनोरंजन आयोजन बनकर सिमट गया है।

समस्या आधुनिकता नहीं, मूल्यों से दूरी है

लेखक का संतुलित नजरिया: यह कहना सर्वथा अनुचित होगा कि आधुनिक जीवनशैली या आधुनिक होना ही सभी समस्याओं की जड़ है। समय के साथ परंपराओं और पहनावे-खानपान में बदलाव आना प्रकृति का नियम है। असल समस्या आधुनिक होने में नहीं, बल्कि अपने मूल मानवीय मूल्यों (Values) से दूर हो जाने में है। जब बदलाव के साथ-साथ आपसी सम्मान, त्याग और पारिवारिक जिम्मेदारियों का भाव खत्म होने लगता है, तभी रिश्तों की बुनियाद हिलती है।

समय की मांग: घरों में फिर लौटे संवाद की संस्कृति

यदि हमें अपने समाज और देश को मजबूत रखना है, तो उसकी सबसे छोटी व मजबूत इकाई यानी 'परिवार' को बिखरने से बचाना होगा। इसके लिए आज निम्नलिखित प्रयास बेहद आवश्यक हैं:

  1. सफल जीवन की शिक्षा: बच्चों को केवल एक सफल डॉक्टर, इंजीनियर या बिजनेसमैन बनने की ट्रेनिंग न दें, बल्कि उन्हें एक सफल और संवेदनशील जीवन जीने की कला सिखाएं।

  2. संवाद को दें जगह: घरों में डाइनिंग टेबल या लिविंग रूम में मोबाइल स्क्रीन को दूर रखकर आपस में खुलकर बात करने (संवाद) की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा।

  3. विवाह का पुनर्मूल्यांकन: नई पीढ़ी को यह समझाना होगा कि विवाह कोई मनोरंजन का मंच नहीं, बल्कि अटूट विश्वास, संपूर्ण समर्पण और असीम धैर्य पर आधारित जीवनभर की एक खूबसूरत यात्रा है।

रामायण काल से लेकर आज तक का इतिहास गवाह है कि संकट के समय केवल 'धैर्य' ही वह दिव्य शक्ति है जो बिखरते हुए रिश्तों को बांधकर रखती है। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में यह एक संस्कार सौंपने में सफल रहे, तो न केवल हमारे परिवार बचेंगे, बल्कि भारतीय समाज की वह गरिमा भी अक्षुण्ण रहेगी जो पूरे विश्व में हमारी विशिष्ट पहचान है।

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