शिबू सोरेन: नेता नहीं, प्रतिरोध और पहचान के प्रतीक
(लेखक: ओंकारेश्वर पाण्डेय | स्त्रोत: विभूति फीचर्स)
दिशोम गुरु का अवसान: एक युग का अंत
झारखंड की आत्मा कहे जाने वाले दिशोम गुरु शिबू सोरेन अब हमारे बीच नहीं रहे। वे केवल दस बार के सांसद और तीन बार के मुख्यमंत्री भर नहीं थे — वे वह शक्ति थे जिसने आदिवासी समाज को हक़ और पहचान दिलाने के लिए व्यवस्था से टकराना सीखा।जहाँ कई लोग अलग झारखंड का सपना देख रहे थे, वहां इसे साकार करने वाला नाम सिर्फ एक था — शिबू सोरेन। उनके समर्थक उन्हें केवल नेता नहीं, बल्कि आंदोलन की चेतना, एक विचार और संघर्ष की प्रतिध्वनि मानते हैं।
नेमरा से उठी आवाज़ जिसने इतिहास बदला
1944 में झारखंड के नेमरा गाँव में जन्मे शिबू सोरेन ने बचपन से ही अत्याचार, शोषण और अन्याय का सामना किया। साहूकारों की क्रूरता, खनन कंपनियों की लालची नजरें और प्रशासनिक उदासीनता ने उन्हें एक विद्रोही बना दिया। 1969 का भयावह अकाल, जब सरकारी गोदामों में अनाज सड़ रहा था और लोग भूख से मर रहे थे — इसने उनके भीतर आग लगा दी। उसी समय उन्होंने प्रण लिया: "जल, जंगल और ज़मीन के लिए संघर्ष होगा, किसी भी कीमत पर।"
आदिवासी चेतना का आंदोलन
उनका प्रारंभिक आंदोलन 'धानकटनी' के नाम से जाना गया। महिलाओं ने खेतों से धान काटना शुरू किया, जबकि पुरुष तीर-कमान लेकर पहरा देते थे। यह सीधा विरोध था—साहूकारों, ज़मींदारों और शोषक व्यवस्था के खिलाफ।
धीरे-धीरे उन्होंने जंगलों से आवाज़ बुलंद की:
"बाहरी हटाओ, झारखंड बचाओ!"
यहीं से उन्हें 'दिशोम गुरु' की उपाधि मिली।
झारखंड मुक्ति मोर्चा: आंदोलन से संगठन तक
1973 में उन्होंने ए.के. रॉय और बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की। नारा था: हमारी ज़मीन हमारी है, कोई दीकु (बाहरी) नहीं छीन सकता!" राजनीतिक बाधाएँ, हिंसा, दमन और विरोध के बावजूद वे पीछे नहीं हटे। 1998 में लालू प्रसाद यादव ने कहा था, "झारखंड मेरी लाश पर बनेगा," लेकिन शिबू सोरेन ने दिल्ली तक राजनीतिक दांवों से रास्ता बनाया और 2000 में झारखंड राज्य बना।
राजनीति का चाणक्य: गठबंधनों की बिसात पर
शिबू सोरेन जानते थे कि केवल आंदोलन से राज्य नहीं बनेगा — सत्ता के गलियारों तक पहुँचना होगा। इसीलिए:
-
1989 में वी.पी. सिंह को समर्थन दिया
-
1993 में नरसिम्हा राव की सरकार बचाई
-
1999 में एनडीए के साथ समझौता किया
वे हर राजनीतिक क्षण को पहचानते थे और उसका लाभ झारखंड के लिए उठाते थे। उनकी रणनीति साफ थी लिखित वादों पर भरोसा, भाषणों पर नहीं।
पहचान की लड़ाई: कॉरपोरेट बनाम आदिवासी
शिबू सोरेन की राजनीति का मूल उद्देश्य था:"आदिवासी पहचान की रक्षा और प्राकृतिक संसाधनों पर हक़।"उन्होंने PESA कानून लागू करवाया जिससे ग्राम सभाओं को निर्णय लेने का अधिकार मिला। 2006 का वन अधिकार कानून भी उनकी पहल का परिणाम था।लेकिन बड़ी कंपनियों का दबाव बना रहा। झारखंड की मिट्टी से अरबों का खनिज निकला — फायदा गया दिल्ली को, गांवों में पहुँची गरीबी। झारखंड हर साल केंद्र को लगभग ₹45,000 करोड़ का खनिज राजस्व देता है, लेकिन राज्य की खुद की टैक्स आमदनी ₹34,000 करोड़ के आस-पास ही है। यही असमानता आज भी बनी हुई है।
विवाद और विश्वास: जनता का अडिग साथ
उनके राजनीतिक जीवन में कई विवाद आए:
-
1975 का बाहरी विरोध आंदोलन (जिसमें 11 लोगों की मौत हुई)
-
1993 का 'कैश फॉर वोट' मामला
-
1994 में सचिव शशिनाथ झा की हत्या (जिसमें वे सजा पाए, बाद में बरी हुए)
फिर भी जनता ने उनका साथ नहीं छोड़ा। जेल से निकलकर भी चुनाव जीतते रहे, मुख्यमंत्री बने, सांसद चुने गए। यही विश्वास उन्हें एक अलग दर्जा देता है।
गुरुजी के बाद: हेमंत की अग्निपरीक्षा
आज झारखंड में झामुमो सत्ता में है। शिबू सोरेन के पुत्र हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री हैं और उसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। हेमंत ने केंद्र से ₹1.40 लाख करोड़ की खनन रॉयल्टी की मांग रखी है, टैक्स शेयर बढ़ाने की बात की है और दोहराया है: विकास जरूरी है, पर अपनी पहचान की कीमत पर नहीं।
लेकिन असली लड़ाई अभी बाकी है — आर्थिक आत्मनिर्भरता की। क्या हेमंत वह कर पाएंगे जो गुरुजी नहीं कर पाए? यह आने वाला समय बताएगा।
झारखंड से आगे: आदिवासी राजनीति की नई लहर?
झारखंड में झामुमो की सफलता अब अन्य राज्यों के आदिवासी समुदायों को भी प्रेरित कर रही है। सवाल यह है: क्या झारखंड मुक्ति मोर्चा अब आदिवासी मुक्ति मोर्चा की तरह राष्ट्रीय पहचान बनाएगा? यदि हेमंत सोरेन गुरुजी की राह पर ठोस कदमों से आगे बढ़ते हैं, तो संभव है कि झामुमो आदिवासी अस्मिता का राष्ट्रीय चेहरा बन जाए।
