शिबू सोरेन: सिर्फ एक नेता नहीं, झारखंडी जन चेतना का प्रतीक
लेखक: सुधीर पाल | स्रोत: विनायक फीचर्स
आदिवासी चेतना की अनवरत यात्रा
1855 में जब सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, और फुलो-झानो ने 'दामिन-ए-कोह' की धरती पर ब्रिटिश शासन, साहूकारों और ज़मींदारों के खिलाफ विद्रोह छेड़ा, वह केवल हथियारबंद संघर्ष नहीं था — वह स्वायत्तता की एक सशक्त माँग थी। यह आंदोलन आदिवासी जीवनशैली, परंपरा, संस्कृति और संसाधनों को बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त रखने का प्रयास था। इसी चेतना की आधुनिक कड़ी बनकर उभरे शिबू सोरेन। उनका शुरुआती संघर्ष भी उसी आत्मा से प्रेरित था — ज़मींदारी शोषण, महाजनी जकड़न और प्रशासनिक अत्याचार के खिलाफ।
धान काटो से संसद तक की यात्रा
शिबू सोरेन ने आदिवासी समाज के उत्थान के लिए कई सामाजिक आंदोलनों की अगुवाई की, जैसे:
-
धान काटो आंदोलन
-
शराबबंदी अभियान
-
बाल विवाह विरोध
-
जंगल सुधार सभाएँ
प्रारंभिक दौर में उनका आंदोलन उग्र था, टकराव हुए, लेकिन के.बी. सक्सेना जैसे प्रशासनिक अधिकारियों और उनके स्वयं के आत्मनिरीक्षण ने इस आंदोलन को लोकतांत्रिक मोड़ दिया।
हूल बनाम हुंकार: दो युग, एक आत्मा
-
1855 का संथाल हूल और
-
1970-2000 के दशक का झारखंड आंदोलन
ये दोनों संघर्ष काल और पद्धति में भले भिन्न रहे हों, परंतु उद्देश्य एक था — आदिवासी अस्मिता और अधिकारों की रक्षा।
संथाल हूल ने जहां अंग्रेज़ी शासन को चुनौती दी, वहीं शिबू सोरेन का आंदोलन आधुनिक भारत में ग्राम स्वशासन, वन अधिकार और सांस्कृतिक पहचान की मांग को लेकर सामने आया।
खनिज, ज़मीन और संघर्ष की एकता
1855 में ज़मीन से बेदखली और 1970 के बाद खनिज लूट — दोनों ही समय में ज़मीन ही संघर्ष का केंद्र थी।
शिबू सोरेन ने कहा:"झारखंड का खनिज झारखंडी का होना चाहिए।"
उन्होंने संविधान के भीतर रहकर पेसा कानून, ग्राम सभा की सर्वोच्चता और आदिवासी भाषाओं की मान्यता की वकालत की।
विद्रोह की जड़ें: एक बालक से नेता बनने तक
-
जन्म: 11 जनवरी 1944, नेमरा गाँव (अब रामगढ़, झारखंड)
-
पिता सोबन सोरेन की हत्या महाजनों ने की थी — यही घटना शिबू के भीतर जनाक्रोश की नींव बनी।
एक किसान बालक से लेकर जन नेता तक का उनका सफर संघर्षों से भरा रहा। अपने इलाके में अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले इस युवा को "गुरुजी" के नाम से पहचान मिली।
जन आंदोलन से संसद तक
-
1980 में पहली बार लोकसभा में प्रवेश
-
दुमका से कई बार सांसद बने
-
कोयला और जनजातीय मामलों के मंत्री भी रहे
-
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना (1972) — एके राय और बिनोद बिहारी महतो के साथ
उनके नेतृत्व में:
-
भूमि सुधार पर जोर
-
खनिज संपदा पर स्थानीय हक़ की मांग
-
आदिवासी संस्कृति को सरकारी पहचान दिलाने का प्रयास
विवाद और फिर भी विश्वास
राजनीतिक सफर में शिबू सोरेन विवादों से अछूते नहीं रहे:
-
शशिनाथ झा हत्या प्रकरण
-
कोयला घोटाला
-
कैश फॉर वोट मामला
कई बार उन्हें इस्तीफा भी देना पड़ा, लेकिन आदिवासी समाज में उनकी लोकप्रियता कायम रही।
गुरुजी: झारखंड की आत्मा
शिबू सोरेन आज भी केवल एक राजनेता नहीं माने जाते, वे झारखंडी आत्मा, संस्कृति, और आदिवासी अधिकारों के प्रतिनिधि हैं। वे जंगलों के बेटे हैं, जिन्होंने संसद तक जंगल की आवाज़ पहुँचाई।
उनका जीवन संदेश देता है:
-
संघर्ष करो, पर संवैधानिक मार्ग से
-
सत्ता में आकर भी मूल सवालों को न भूलो — जमीन, भाषा, स्वशासन, और आत्मसम्मान
अब भी ज़रूरी हैं उनके सवाल
• क्या झारखंड का आदिवासी अब भी अपनी ज़मीन का मालिक है?
• क्या ग्राम सभाएं अब भी स्वतंत्र निर्णय ले सकती हैं?
• क्या खनिज संपदा से आदिवासी लाभान्वित हो रहे हैं?
अगर इन सवालों के जवाब ‘नहीं’ हैं, तो हमें फिर से 1855 की हूल और शिबू सोरेन की हुंकार को याद करने की ज़रूरत है।

