शिव और शक्ति अभिन्न हैं: शंकराचार्य नरेंद्रानन्द सरस्वती ने बताया यज्ञ का महत्व
यज्ञ ही महायज्ञ का रूप है
शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानन्द सरस्वती ने अपने आशीर्वचनों में यज्ञ की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि:रुद्र ही महायज्ञ के रूप में हैं।" उन्होंने समझाया कि प्रकृति को नियंत्रित करने और उसके असंतुलन को संतुलित करने के लिए यज्ञ का अहम योगदान है। उन्होंने कहा कि रुद्रतोभद्र के माध्यम से यज्ञ मंडप में भगवान शिव की 64 कलाओं का पूजन, अर्चन और वंदन जीव की समस्त इच्छाओं और अभिलाषाओं की पूर्ति का आधार है।
पर्यावरण शुद्धि और श्रेष्ठ कर्म
शंकराचार्य ने आगे कहा कि यज्ञ में दी गई आहुतियों से पर्यावरण को शुद्ध करने में मदद मिलती है और दीर्घ काल तक प्रदूषण से छुटकारा पाया जा सकता है। उन्होंने बल देते हुए कहा कि धार्मिक ग्रंथों में यज्ञ की गणना श्रेष्ठ कर्मों में की जाती है। इस अवसर पर उपस्थित रहने वालों में सतीश उपाध्याय, अशोक गुप्ता, सौरभ कुमार, कैलाशी बेचू राम, भोला प्रसाद आग्नेय, प्रदीप सिंह, लल्लन यादव, तेज बहादुर सहित तमाम श्रद्धालुजन शामिल रहे।
