श्रीकृष्ण: निराकार से साकार तक, ब्रह्मानंद से वात्सल्य आनंद तक
(डॉ. दीपक गोस्वामी — विभूति फीचर्स)
श्रीकृष्ण की जन्म-कथा कैसे लिखूं? लेखनी ठिठक जाती है। यह ऐसी लीला है, जो शब्दों की सीमा से परे है। जो अजन्मा है, अनादि है, अनंत है, निर्गुण और निराकार है; जिसे वेदों ने ‘नेति-नेति’ कहकर पुकारा और उपनिषदों ने सच्चिदानंद स्वरूप के रूप में गाया, वही परम सत्ता जब भक्त के प्रेम में बंधती है तो साकार, सगुण और सुकुमार बालक बन जाती है। यही वैदिक परंपरा का अद्भुत रहस्य है।
जो परब्रह्म काल का भी काल है, वही अष्टमी की अर्धरात्रि में समय की सीमा में बंधकर प्रकट होता है। यही श्रीकृष्ण की लीला है—विराट का विनम्र हो जाना और निराकार का वात्सल्य में साकार हो जाना।
अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का वह अलौकिक क्षण। आकाश में मेघ गर्जना कर रहे हैं, बिजली चमक रही है और यमुना उफान पर है। मथुरा का कारागार पाषाण की दीवारों, लोहे की बेड़ियों और कंस के कड़े पहरे से घिरा हुआ है। उसी कारागार के गर्भगृह में परात्पर ब्रह्म प्रकट होता है।
वसुदेव की आंखों में अश्रु हैं और देवकी के हृदय में वात्सल्य तथा भय का अद्भुत संगम। भगवान चतुर्भुज रूप में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए प्रकट होते हैं और क्षणभर बाद स्वयं को एक साधारण शिशु के रूप में परिवर्तित कर लेते हैं। यही रूपांतरण वेदांत का सार है—जो विराट है, वही भक्त के प्रेम में विनम्र भी है।
इसके बाद शुरू होती है वह अलौकिक यात्रा, जिसे भारतीय आध्यात्मिक परंपरा सदियों से श्रद्धा के साथ स्मरण करती आई है। पिता वसुदेव के सिर पर रखे सूप में सोया हुआ है स्वयं ब्रह्मांड का स्वामी। शेषनाग छत्र बनकर साथ चल रहे हैं। यमुना उनके चरणों का स्पर्श पाने को व्याकुल है। कारागार के कपाट स्वयं खुल जाते हैं और पहरेदार योगनिद्रा में चले जाते हैं।
गोकुल में यशोदा की गोद में योगमाया के स्थान पर योगेश्वर पहुंचते हैं और फिर गूंज उठता है—‘नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की।’
यह आनंद केवल उत्सव का आनंद नहीं है। यह उस ब्रह्मानंद से भी अधिक आत्मीय अनुभव है, क्योंकि यहां परमात्मा भक्त के लिए पुत्र बन गया है। यह वात्सल्य का आनंद है।
यशोदा को अपना लाल मिल गया। धन्य हो गई वह ग्वालिन मां, जिसने न चारों वेद पढ़े, न कोई कठिन यज्ञ किया और न घोर तपस्या। फिर भी उसे वह प्राप्त हुआ, जिसे पाने के लिए सनकादि ऋषि युगों तक ध्यान में लीन रहे।
यशोदा कृष्ण को उलूखल से बांधती हैं और वह बंध जाते हैं। इसीलिए वह ‘दामोदर’ कहलाते हैं—दाम अर्थात रस्सी और उदर अर्थात पेट। जो संपूर्ण जगत को बंधनों से मुक्त करता है, वही मां की प्रेम-रस्सी से बंध जाता है।
यशोदा छड़ी दिखाती हैं और कृष्ण भय का अभिनय करते हुए रोने लगते हैं। मां के हाथ का माखन खाते हैं, माखन चुराते हैं और पकड़े जाने पर बालसुलभ मासूमियत से सफाई देते हैं। कृष्ण की यही लीला तो है—जहां प्रेम के सामने परम सत्य भी बाल सुलभ हो जाता है।
कर्मयोग की जीवंत प्रयोगशाला
कृष्ण केवल बाललीला के नायक नहीं हैं। उनका संपूर्ण जीवन कर्मयोग की जीवंत प्रयोगशाला है। गोचारण किया तो गोपाल कहलाए। गोवर्धन उठाया तो अकेले नहीं, गोप-गोपियों के सहयोग के साथ। यह सहकारिता का संदेश है।
कंस का वध किया तो धर्म की स्थापना के लिए। द्वारका बसाई तो शरणागतों के लिए। महाभारत में सारथी बने, लेकिन स्वयं शस्त्र न उठाने का संकल्प लिया। उन्होंने सिखाया कि कर्म से पलायन नहीं, बल्कि कर्म में ही जीवन का सार है।
आवश्यकता पड़ने पर वे रणछोड़ भी बनते हैं। जरासंध के सामने रणनीतिक रूप से पीछे हटना कायरता नहीं, बल्कि दूरदर्शिता थी। कब संघर्ष करना है और कब रणनीतिक रूप से पीछे हटना है—इसका विवेक भी कर्मयोग का ही हिस्सा है।
सोलह कलाओं से पूर्ण कृष्ण
कृष्ण को सर्वकला-संपन्न और षोडश कलाओं से पूर्ण माना गया है। उनकी बांसुरी बजती है तो यमुना का प्रवाह तक ठहर जाने की कल्पना की जाती है, गायें चरना भूल जाती हैं और गोपियां सुध-बुध खो बैठती हैं।
रासलीला में एक कृष्ण अनेक गोपियों के साथ नृत्य करते हैं। भक्ति परंपरा में इसे जीव और परमात्मा के एकत्व के अद्वैत भाव से जोड़ा गया है। वह युद्ध करते हैं तो सुदर्शन चक्र धारण करते हैं और प्रेम करते हैं तो केवल एक तिरछी चितवन ही पर्याप्त होती है।
कृष्ण वेद भी हैं और वेदांत भी। वे संगीत हैं, साहित्य हैं, शास्त्र हैं और शस्त्र भी। उनके व्यक्तित्व में जीवन के अनेक आयाम एक साथ दिखाई देते हैं।
जीवन की नैया के केवट
जब जीवन की नाव भवसागर में डगमगाती है, मोह के भंवर घेरते हैं और काम-क्रोध के तूफान उठते हैं, तब कृष्ण का नाम पतवार बन जाता है।
भगवद्गीता में उनका संदेश—‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’—भक्त के लिए अंतिम आश्रय का भाव जगाता है। यह संदेश मानो कहता है कि जब जीवन के सभी सहारे छूट जाएं, तब भी विश्वास मत खोना।
कृष्ण का आश्वासन ही इस भाव का केंद्र है—चिंता मत करो, मैं तुम्हारे साथ हूं।
लोकनायक और प्रकृति के उपासक
कृष्ण लोकनायक हैं। उनका जन्म राजपरिवार में हुआ, लेकिन पालन-पोषण गोकुल की धूल में हुआ। उन्होंने राजसी वैभव से अधिक ग्वाल-बालों की संगति को महत्व दिया।
मोर पंख उनका मुकुट है, गौधूलि उनका श्रृंगार, कदंब की छाया उनका आसन और यमुना का तट उनकी लीलाभूमि। कृष्ण का यह स्वरूप मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरे संबंध का संदेश देता है।
कालिय नाग के आतंक से यमुना को मुक्त करना हो या गोवर्धन पर्वत उठाकर इंद्र के अहंकार को चुनौती देना—इन प्रसंगों में प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलन का संदेश देखा जा सकता है। आज जब पर्यावरण संकट गंभीर रूप ले चुका है, कृष्ण की लीलाएं हमें प्रकृति के दोहन के बजाय उसके संरक्षण और सम्मान की प्रेरणा देती हैं।
धर्म की रक्षा के लिए नीति और रणनीति
कृष्ण केवल सरल बालक या प्रेम के प्रतीक नहीं हैं। वे महान कूटनीतिज्ञ और रणनीतिकार भी हैं। महाभारत में उनकी भूमिका हमें बताती है कि धर्म हमेशा सरल और एकरेखीय नहीं होता। कई बार अधर्म को रोकने के लिए परिस्थितियों की जटिलता को समझना पड़ता है।
उनकी रणनीति को केवल छल के रूप में देखना उनके चरित्र को सीमित करना होगा। कृष्ण के लिए धर्म का मूल उद्देश्य लोककल्याण और न्याय की स्थापना है। इसलिए वे परिस्थितियों के अनुरूप नीति अपनाते हैं और अधर्म के विरुद्ध खड़े होते हैं।
मित्रता की पराकाष्ठा
कृष्ण सहकारिता और मित्रता के भी महान प्रतीक हैं। वे सुदामा के मित्र हैं, द्रौपदी के सखा हैं, अर्जुन के सारथी हैं और उद्धव के गुरु।
वे स्वयं श्रेष्ठ योद्धा होते हुए भी महाभारत में शस्त्र उठाने के बजाय अर्जुन को योद्धा बनाते हैं। यही उनकी महानता है—वे स्वयं शक्ति का प्रदर्शन करने से अधिक दूसरों की शक्ति को जागृत करते हैं।
चितचोर कृष्ण
कृष्ण को माखन चोर कहा जाता है, लेकिन भक्तिभाव में यह चोरी भी प्रतीक बन जाती है। माखन चोरी मानो भक्त के हृदय की कोमलता को चुरा लेने की लीला है। वह चितचोर हैं—एक बार जिसकी चेतना उनकी प्रेममयी छवि में बंध गई, उसके लिए संसार का आकर्षण फीका पड़ जाता है।
उनकी बाललीलाओं में शरारत है, प्रेम है और आध्यात्मिक संकेत भी हैं। यशोदा को उनके मुख में संपूर्ण ब्रह्मांड का दर्शन होना इसी रहस्य की ओर संकेत करता है कि बालक के भीतर वही विराट सत्ता विद्यमान है।
त्रिभंगी कृष्ण और प्रेम का रहस्य
बांसुरी बजाते हुए त्रिभंगी मुद्रा में खड़े कृष्ण भारतीय कला और भक्ति के सबसे सुंदर प्रतीकों में से एक हैं। उनकी तीन जगह से झुकी हुई देह मानो यह संदेश देती है कि जीवन को केवल बाहरी दृष्टि से सीधा समझना पर्याप्त नहीं।
राधा-कृष्ण का प्रेम भक्ति परंपरा में आत्मा और परमात्मा के प्रेम का प्रतीक माना गया है। यहां प्रेम केवल आकर्षण नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण है। इसी कारण कृष्ण की लीलाओं में राधा का स्थान सर्वोच्च दिखाई देता है।
जहां जगत का स्वामी अपनी आराध्या के चरणों में झुकता है, वहां प्रेम की शक्ति भक्ति की सीमाओं को भी विस्तार देती दिखाई देती है।
आखिर कौन हैं कृष्ण?
तो आखिर कृष्ण कौन हैं?
वे कोई एक उत्तर नहीं, बल्कि ऐसा प्रश्न हैं जो हर युग में मनुष्य से नया उत्तर मांगता है।
वे ब्रजवासियों के लाला हैं।
वे द्वारका के नाथ हैं।
वे गीता के गायक हैं।
वे राधा के प्राण हैं।
वे मीरा के मनमोहन हैं।
वे सूरदास के चितचोर हैं।
वे अर्जुन के सारथी हैं।
वे भक्त के हृदय में बसने वाले परमात्मा हैं।
कृष्ण में बालक की निश्छलता है, मित्र का अपनापन है, प्रेमी की कोमलता है, योद्धा की वीरता है, राजनेता की दूरदर्शिता है, दार्शनिक की गहराई है और योगेश्वर की विराट चेतना है।
इसलिए कृष्ण को केवल समझा नहीं जा सकता। उन्हें जीना पड़ता है, महसूस करना पड़ता है और उनके संदेश को अपने जीवन में उतारना पड़ता है।
आइए, हम सब मिलकर उस अजन्मे के जन्मोत्सव को मनाएं, जो हर युग में जन्म लेकर मनुष्य को उसके भीतर छिपे सत्य का बोध कराता है।
नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की।
हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की।
यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवात्मा के परमात्मा से मिलन का उत्सव है।
(विभूति फीचर्स)
