भाभी का प्यारा राज़
(विनायक फीचर्स)
रक्षाबंधन में कुछ ही दिन बाकी थे। शिवानी ने स्नेह से भाभी प्रिया को फोन किया –
"भाभी, वो राखी जो भैया के लिए भेजी थी… मिल गई क्या?"
प्रिया ने सहज स्वर में जवाब दिया –
"नहीं दीदी, अभी तक तो नहीं आई।"
शिवानी थोड़ी चिंतित हुई –
"कल तक देख लेना भाभी, अगर नहीं आई तो मैं खुद आ जाऊंगी। मेरे भैया की कलाई खाली नहीं रहनी चाहिए।"
फोन कटने के बाद प्रिया मुस्कराईं। असल में राखी दो दिन पहले ही आ चुकी थी, पर उन्होंने किसी को बताया नहीं। मन में एक प्यारी-सी योजना पल रही थी।
अगले दिन फिर उन्होंने फोन किया –
"दीदी, अब तक राखी नहीं आई… क्या करें?"
इस बार शिवानी ने तुरंत पति से कहा –
"गाड़ी निकालो, आज मायके जाना है… राखी बांधने।"
करीब 180 किलोमीटर की यात्रा के बाद शिवानी मायके, कोटा पहुंची। भैया विक्रम, माँ, पापा और नन्ही आयुषी ने उसे देखकर खुशी से घर भर दिया। राखी बंधी, मिठाइयाँ बंटी और दिन भर हंसी-ठिठोली चलती रही।
विदा के समय माँ ने प्यार से कहा –
"अब तो तू आती ही नहीं… ससुराल ही सब कुछ हो गया क्या?"
शिवानी मुस्कराई –
"माँ, उधर भी तो एक माँ जैसी सासू माँ हैं… और यहाँ आपकी प्यारी बहू, जो मेरा हिस्सा भी निभा लेती है।"
माँ ने धीरे से बताया –
"तेरी राखी तो दो दिन पहले ही आ गई थी, लेकिन प्रिया ने किसी को बताया नहीं। कहती थी – इस बार दीदी को मायके बुलाना है, चार साल हो गए उन्होंने हमारे साथ राखी नहीं मनाई।"
शिवानी की आँखें नम हो गईं। वो प्रिया से लिपट गई –
"भाभी, आप इतना भी ख्याल मत रखा करो कि मुझे अपनी माँ के आँसू भी न दिखें।"
प्रिया की आँखों में भी नमी थी, पर चेहरे पर तसल्ली।
उस दिन ननद-भाभी के बीच राखी का ऐसा बंधन जुड़ा, जिसमें धागा तो पुराना था, लेकिन प्रेम की गाँठें और भी गहरी हो गईं।
