छोटा नवाचार, बड़ा बदलाव
नए सत्र में विज्ञान शिक्षक हरिश्चन्द्र सिंह ने इस स्थिति को बदलने का संकल्प लिया। उन्होंने महसूस किया कि बच्चों को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय पढ़ाई को उनके लिए रोचक और प्रयोगात्मक बनाना जरूरी है।
उन्होंने छोटे-छोटे नवाचारों से शुरुआत की। शब्दों को समझाने के लिए चित्रकार्ड तैयार किए गए। विज्ञान के कठिन विषयों को सरल बनाने के लिए बच्चों से कबाड़ और अनुपयोगी सामग्री से मॉडल बनवाए गए। कक्षा में ‘खेल-खेल में सीखो’ नाम से एक विशेष कोना बनाया गया, जहां बच्चे गतिविधियों और प्रयोगों के माध्यम से नई चीजें सीखने लगे।
इन छोटे प्रयासों का असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। जिन बच्चों की आंखों में पहले पढ़ाई के दौरान ऊब नजर आती थी, उनमें अब उत्सुकता और उत्साह दिखाई देने लगा। बच्चे सवाल पूछने लगे, उनके जवाब खुद तलाशने लगे और समूह में मिलकर काम करने लगे।
सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ कि विद्यालय से अनुपस्थित रहने वाले बच्चे भी नियमित रूप से स्कूल आने लगे। अभिभावकों और आसपास के लोगों ने भी महसूस किया कि विद्यालय का माहौल बदल रहा है। उनकी जुबान पर यह बात आने लगी—“अब तो हमारा विद्यालय बदल गया है।
इन प्रयासों का सकारात्मक प्रभाव परीक्षा परिणामों पर भी पड़ा और बच्चों के शैक्षिक प्रदर्शन में सुधार हुआ। लेकिन हरिश्चन्द्र सिंह के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि परीक्षा के बेहतर अंक नहीं, बल्कि यह थी कि बच्चों ने सीखने को बोझ नहीं, आनंद समझना शुरू कर दिया।
सीख
नवाचार के लिए हमेशा बड़े बजट की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है बड़ी सोच और कुछ नया करने के संकल्प की। छोटे-छोटे प्रयास जब निरंतरता के साथ किए जाते हैं, तो वे बच्चों के सीखने के तरीके और पूरे विद्यालय के वातावरण में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
— हरिश्चन्द्र सिंह
