सोशल मीडिया का भ्रम बनाम जमीनी हकीकत: जंतर-मंतर पर विपक्ष के प्रदर्शन के 'फ्लॉप शो' के बहाने आभासी दुनिया का विश्लेषण
नई दिल्ली, 07 जून 2026 । वरिष्ठ लेखक डॉ. सुधाकर आशावादी : भले ही आज वैश्विक स्तर पर संचार क्रांति और सोशल मीडिया का डंका बज रहा हो, लेकिन आभासी (Virtual) दुनिया और वास्तविक धरातल की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर होता है। यदि इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब चैनल्स के व्यूज और लाइक्स में ही सत्ता बदलने की वास्तविक शक्ति होती, तो मनमाने प्रचार से दुनिया के कई देशों में रोज सरकारें बदल रही होतीं। सस्ती लोकप्रियता के लिए कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स भले ही नित्य नए विमर्श (Narratives) गढ़कर व्यवस्था के सामने चुनौतियां खड़ी करने का प्रयास करते हैं, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर जनता का विवेक कुछ और ही कहानी बयां करता है
फॉलोवर्स की चकाचौंध और खाली मैदान का सच
आभासी जगत एल्गोरिदम और चंद लोगों के विचारों को 'लाइक' करवाकर स्क्रीन पर तो करोड़ों की संख्या में फॉलोवर्स या दर्शक पैदा कर सकता है, लेकिन जब परीक्षा की घड़ी आती है, तो ये आंकड़े धरातल पर गायब नजर आते हैं।
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जंतर-मंतर का हालिया प्रदर्शन: इसका सबसे ताजा उदाहरण विगत 6 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर देखने को मिला। सोशल मीडिया पर हफ्तों तक चले सघन और आक्रामक प्रचार के बावजूद, इस जमीनी प्रदर्शन में उम्मीद के मुताबिक भीड़ नहीं जुट सकी।
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मुद्दों को हवा देने की कोशिश नाकाम: नीट (NEET) पेपर लीक मामले को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को आधार बनाकर जो बड़ा आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की गई थी, वह जनता के व्यापक समर्थन के अभाव में गति नहीं पकड़ सकी। भीड़ का न जुटना यह साफ करता है कि सरकार को किसी भी बड़े या जल्दबाजी भरे निर्णय के लिए विवश करने वाला जनदबाव यहाँ पूरी तरह नदारद था।
लोकतांत्रिक अधिकार बनाम भ्रम फैलाने की राजनीति
इस प्रदर्शन के स्वरूप और उसमें शामिल चेहरों का बारीकी से विश्लेषण करने पर इसकी राजनीतिक मंशा पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है। यह आयोजन कुछ चुनिंदा राजनीतिक दलों के मिले-जुले विमर्श और केवल सत्ताधारी दल व एक विशिष्ट राष्ट्रवादी संगठन के विरोध तक ही सिमट कर रह गया।
लेखक की दृष्टि: किसी भी जीवंत लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण आंदोलन और असहमति जताना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल अधिकार है, लेकिन इस अधिकार की आड़ में जनसाधारण को भ्रमित करने या व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह फ्लॉप प्रदर्शन वास्तव में उन राजनीतिक दलों की हताशा और कुंठा का प्रकटीकरण है, जिन्हें देश का जनमानस लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से बार-बार अस्वीकार कर चुका है।
विदेशी धरती से रची जाने वाली चालों को जनता ने नकारा
वस्तुस्थिति यह है कि इस धरने-प्रदर्शन की विफलता देश के राजनीतिक परिदृश्य को लेकर एक बड़ा संकेत देती है। आज का भारतीय नागरिक सोशल मीडिया पर चलने वाले कुत्सित और प्रायोजित दुष्प्रचार की परतों को बखूबी समझने लगा है।
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अराजक तत्वों के मंसूबे विफल: विदेशी ताकतों या बाहरी मंचों से भारत की लोकतांत्रिक और प्रशासनिक व्यवस्था को बदनाम या ध्वस्त करने के जो प्रयास किए जा रहे हैं, देश की बहुसंख्यक जनता उन्हें सिरे से खारिज करती है। अराजक शक्तियां चाहे कितने ही नए मुखौटे या नए मुद्दे बदल कर आएं, जमीन पर उनकी स्वीकार्यता शून्य साबित हो रही है।
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भ्रम से परे भारतीय नागरिक: इस राजनीतिक विमर्श की असफलता यह प्रमाणित करती है कि भारत का आम नागरिक अब केवल सनसनीखेज हेडलाइंस या स्क्रीन पर दिखने वाले प्रोपेगैंडा से प्रभावित होकर गुमराह होने वाला नहीं है।
निष्कर्ष: खुद को टटोलने का वक्त
इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ है कि जो राजनीतिक दल और संगठन केवल डिजिटल स्पेस के भरोसे अपनी जमीन तलाश रहे हैं, उनके मंसूबे बार-बार असफल हो रहे हैं। लोकतंत्र अंततः जनता के विश्वास और उनके बीच रहकर किए गए वास्तविक कार्यों से चलता है, न कि सोशल मीडिया के कृत्रिम विमर्श से। जब तक विपक्ष इस कड़वी हकीकत को स्वीकार नहीं करेगा, तब तक उसके ऐसे प्रयास जनता के बीच केवल 'फ्लॉप शो' बनकर ही रह जाएंगे।

