समाजसेवा या मुनाफे का गणित? चंदा उगाही के 'कौशल' पर एक तीखा कटाक्ष
(सुधाकर आशावादी की विशेष प्रस्तुति) हमारे समाज में परोपकार की परंपरा सदियों पुरानी है। कुछ लोग अपनी गाढ़ी कमाई समाज की बेहतरी के लिए निस्वार्थ भाव से समर्पित कर देते हैं। लेकिन समय के साथ समाजसेवा की परिभाषा बदली है और अब चंदा उगाही एक विशिष्ट 'कला' और 'व्यवसाय' का रूप ले चुकी है। व्यंग्यात्मक लहजे में कहें तो, आज समाजसेवियों की तीन प्रमुख श्रेणियां देखने को मिलती हैं:
1. वास्तविक समर्पित सेवाभावी
ये वे लोग हैं जो 'चैरिटी बिगिंस एट होम' (दान की शुरुआत घर से होती है) के मंत्र को सार्थक करते हैं। ये अपनी जेब से पैसा खर्च करते हैं और मानवता की सेवा को ही अपना धर्म मानते हैं। इनके लिए समाज सेवा कोई दिखावा नहीं, बल्कि एक आंतरिक जिम्मेदारी है।
2. 'नेटवर्किंग' वाले समाजसेवी
इस श्रेणी के प्राणी समाज सेवा को अपनी जीवनचर्या का हिस्सा तो बनाते हैं, लेकिन अपनी जेब से एक पैसा भी खर्च नहीं करते। ये अपने मित्रों, परिचितों और संपर्कों का इस्तेमाल कर चंदा इकट्ठा करते हैं और उसी से सामाजिक कार्यों को अंजाम देते हैं। इनके घर के खर्चे इनके खुद के उपार्जित धन से चलते हैं, लेकिन समाज सेवा दूसरों के भरोसे होती है।
3. 'प्रोफेशनल' चंदा एक्सपर्ट
ये वे लोग हैं जो चंदा उगाही में 'परास्नातक' यानी मास्टर होते हैं। इनके लिए हर दिन एक नया आयोजन और हर आयोजन चंदा उगाही का एक नया अवसर होता है। इनका हिसाब-किताब बेहद 'पारदर्शी' नजर आता है, लेकिन असल खेल बिलों के भीतर छिपा होता है।
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चंदा उगाहने के लिए इस्तेमाल हुए वाहन का किराया, टीम का नाश्ता और अन्य खर्च भी आयोजन के बजट में ही जुड़ते हैं।
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इनका मुनाफा अक्सर आयोजन के लिए खरीदी गई वस्तुओं के बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए बिलों में समाहित रहता है।
चंदा उगाही: एक परमानेंट व्यवसाय
आजकल समाज में ऐसे 'विशेषज्ञ' मौजूद हैं जिन्होंने चंदा उगाही को एक स्थायी व्यवसाय बना लिया है। आपको बस एक कार्यक्रम की घोषणा करनी है, बाकी का जिम्मा इनका। ये तुरंत दानदाताओं की सूची तैयार करते हैं और रसीद कट्टा लेकर निकल पड़ते हैं। इनकी रणनीति भी बड़ी दिलचस्प होती है—निमंत्रण पत्र पर प्रभावशाली अतिथियों के नाम छपवाकर उन्हीं के रसूख का इस्तेमाल चंदा वसूलने में करते हैं। नतीजा यह होता है कि 'हींग लगे न फिटकरी, और रंग भी चोखा आ जाए'।

