पुत्रदा एकादशी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और मेरी जन्मतिथि से जुड़ी कुछ स्मृतियां
आज सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। शायद इसका एक सुंदर संयोग यह भी है कि यह पावन तिथि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के ठीक पहले आती है। भगवान श्रीकृष्ण सोलहों कलाओं से पूर्ण अवतार हैं—“कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।”
इसी भाव को एक कवि ने कितनी सुंदरता से अभिव्यक्त किया है—
पूत सपूत जयो जसुदा, इतना सुनतै बसुधा सब दौरी।
देवन को आनंद भयो, ब्रज नाचत गावत मंगल गौरी।।
नंद ने दान दियो कुछ ऐसी, कि देखि कुबेरहुं की मति बौरी।
ब्रज देखत ही में लुटाइ दियो, न बची बछिया, छछिया न पिछौरी।।
जब कभी मन में यह विचार आया कि आखिर कृष्ण कौन हैं, तो मेरे कवि-मन से ये पंक्तियां निकल पड़ीं—
एक छंद
कारी अंधियारी आधी रात, नहीं सूझे हाथ,
तब कारागार में भी जन्म ले न रोता है।
आतताई पापी क्रूर कंस से जो भयभीत,
प्रहरी का दल जागता है, तो भी सोता है।
जिसकी सुरक्षा हेतु नागफण बनें छत्र,
नीर यमुना के भी उछल, पग धोता है।
बाप के जो शिर सूप में सनाल लेटकर,
पले जाके नंद घर—वह कृष्ण होता है।।
और मैं भी अपने आपको कितना भाग्यशाली मानता हूं, दोस्तों कि मेरा जन्मदिवस श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से एक दिन पहले और हलषष्ठी (बलराम जयंती) के बिहान में आया। यानी लोकभावना में कहूं तो बलदाऊ से एक दिन छोटा और श्रीकृष्ण भगवान से एक दिन बड़ा!
मेरे जन्मदिवस की यह तिथि मुझे इसलिए भी मालूम है क्योंकि मेरे माता-पिता अपने जीवनकाल में इसी दिन मेरा जन्मदिवस मनाया करते थे। उस दिन घर में रोजमर्रा से हटकर कुछ विशेष पकवान बनते थे और श्री सत्यनारायण भगवान की कथा भी होती थी। मुझे भी वे दोनों ब्रह्मलीन विभूतियां जबरदस्ती बैठाकर कथा सुनवाया करती थीं।
आज वे दोनों इस संसार में नहीं हैं, लेकिन जन्मदिवस से जुड़ी उनकी वह स्मृति आज भी मेरे मन में जीवित है। त्योहारों और तिथियों का महत्व केवल पंचांग में दर्ज तारीखों से नहीं होता, बल्कि उनसे जुड़ी परिवार की स्मृतियां, संस्कार और भावनाएं उन्हें जीवनभर विशेष बनाए रखती हैं।
श्री हरि ॐ।
नमः शिवाय। 🙏
