सोमनाथ स्वाभिमान पर्व और भोजपुर का शिव मंदिर
(अंजनी सक्सेना – विनायक फीचर्स) सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अवसर पर यदि भोजपुर के शिव मंदिर का स्मरण किया जाए, तो यह पूर्णतः स्वाभाविक है। यह मंदिर परमार वंश के महान शासक राजा भोज की उस पीड़ा और आस्था का मूर्त रूप है, जो उन्होंने सोमनाथ मंदिर के विध्वंस के समाचार से अनुभव की थी। यही कारण है कि भोजपुर का यह भव्य शिव मंदिर ‘उत्तर भारत का सोमनाथ’ भी कहा जाता है।
राजा भोज का व्यक्तित्व बहुआयामी था—वे कुशल प्रशासक, युद्धकला में पारंगत योद्धा, विद्वान साहित्यकार और अद्वितीय वास्तुशास्त्री थे। वास्तुकला के प्रति उनके अनुराग का प्रमाण उनका प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सरस्वती कंठाभरण’ है। कश्मीर से तमिलनाडु तक उनके द्वारा निर्मित अनेक मंदिर और भवन इतिहास में दर्ज हैं। कालचक्र की मार से भले ही उनमें से कई नष्ट हो गए हों, किंतु भोपाल से लगभग 29 किलोमीटर दक्षिण स्थित भोजपुर का शिव मंदिर आज भी अपनी भव्यता के साथ अडिग खड़ा है।
उत्तर भारत का सोमनाथ
इस मंदिर में प्रतिष्ठित शिवलिंग को भारत का सबसे विशाल शिवलिंग माना जाता है। यह केवल एक स्थापत्य चमत्कार नहीं, बल्कि राजा भोज के हृदय की संवेदना और शिवभक्ति का सजीव प्रमाण भी है। महाशिवरात्रि और मकर संक्रांति जैसे पर्वों पर यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। भोजपुर ग्राम की स्थापना स्वयं राजा भोज ने की थी। यहां स्थित एक जैन मंदिर में उत्कीर्ण अभिलेख इस तथ्य की पुष्टि करते हैं।
मंदिर निर्माण से जुड़ी मान्यताएं
भोजपुर शिव मंदिर की स्थापना को लेकर दो प्रमुख जनश्रुतियां प्रचलित हैं पहली मान्यता के अनुसार, राजा भोज एक असाध्य रोग (कुष्ठ) से पीड़ित हो गए थे। वैद्यों ने उन्हें ऐसे तालाब में स्नान कर शिव पूजा करने की सलाह दी, जहां सौ जलधाराएं मिलती हों। इसके फलस्वरूप राजा भोज ने एक विशाल तालाब का निर्माण कराया, जिसके अवशेष आज भी भोजपुर में मौजूद हैं। भोपाल का प्रसिद्ध बड़ा ताल इसी का अवशेष माना जाता है। इसी ताल के तट पर भोजपुर शिव मंदिर का निर्माण हुआ।
दूसरी मान्यता यह है कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग परमार वंश के आराध्य देव थे। महमूद ग़ज़नवी द्वारा सोमनाथ मंदिर के विध्वंस से व्यथित होकर राजा भोज ने इस पीड़ा की स्मृति में भोजपुर में शिव मंदिर का निर्माण कराया। इतिहास में यह भी दर्ज है कि राजा भोज ने ग़ज़नवी के विरुद्ध राजा आनंदपाल और त्रिलोचनपाल को सैन्य सहायता दी थी।
परमार वंश और शिवभक्ति
परमार शासक आरंभ से ही शिवभक्त रहे हैं। मालवा, गुजरात और विदिशा क्षेत्र में उनके द्वारा निर्मित अनेक शिव मंदिर आज भी विद्यमान हैं। विदिशा का नीलकंठेश्वर मंदिर, परमार शासक उदयादित्य द्वारा निर्मित, इसका प्रमाण है।राजा भोज को परमार वंश में सबसे अधिक ख्याति, जनप्रियता और यश प्राप्त हुआ। वे विक्रमादित्य की भांति लोककथाओं और जनश्रुतियों के नायक बने। इतिहास उन्हें विद्वान, वीर, कवि, खगोलशास्त्र, आयुर्वेद, भूगर्भशास्त्र और वास्तुकला के प्रकांड ज्ञाता के रूप में स्मरण करता है।
भोजशाला और विद्या का केंद्र
धार में स्थित भोजशाला, जिसे राजा भोज ने विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित किया था, उनके विद्या प्रेम का प्रतीक है। वहां से प्राप्त सरस्वती (वाग्देवी) की प्रतिमा आज लंदन के संग्रहालय में संरक्षित है।
अधूरा रह गया भव्य स्वप्न
इतना विशाल और कलात्मक होने के बावजूद भोजपुर का शिव मंदिर अधूरा रह गया। इसके निर्माण के पूर्ण न हो पाने के कारणों का कोई ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं है। मंदिर के विशाल स्तंभ, अपूर्ण मूर्तियां, चट्टानों पर उकेरे गए मानचित्र और ढलानयुक्त रास्ते इस अपूर्णता की गवाही देते हैं।मंदिर के गर्भगृह में स्थित शिवलिंग की पालिश इतनी उत्कृष्ट है कि वह कांच की भांति चमकता है। इसकी जलहरी तीन खंडों में बनी है, जो कमल पुष्प का आभास देती है—यह परमार स्थापत्य की अद्वितीय विशेषता है।
विशाल ताल और जल प्रबंधन
भोजपुर के पश्चिम में स्थित विशाल ताल, जिसे आज भोपाल का बड़ा ताल कहा जाता है, अपने समय में भारत का सबसे बड़ा सरोवर माना जाता था। लगभग 650 वर्गमील में फैले इस ताल का निर्माण दो विशाल बांधों द्वारा किया गया था। बाद में मालवा शासक होशंगशाह द्वारा एक बांध तोड़ दिए जाने से यह सरोवर समाप्त हो गया।
आस्था और विकास
‘उत्तर भारत के सोमनाथ’ की मान्यता के चलते मध्यप्रदेश सरकार द्वारा यहां निरंतर विकास कार्य किए जा रहे हैं। सड़क, सुरक्षा और सुविधाओं के विस्तार से श्रद्धालुओं को सुगम दर्शन की व्यवस्था उपलब्ध कराई जा रही है। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अवसर पर उज्जैन में महाकाल, विदिशा के नीलकंठेश्वर और भोजपुर शिव मंदिर में प्रदेश भाजपा नेतृत्व द्वारा दर्शन-पूजन किया गया, जिससे इस पर्व की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गरिमा और अधिक बढ़ गई।

