जन्मजयंती (29जुलाई) पर विशेष- संस्कार, इतिहास और सत्य के पत्रकार: दादा दिनेश चंद्र वर्मा
कुछ लोग चले जाते हैं तो पीछे सिर्फ खालीपन नहीं छोड़ते, एक पूरा युग छोड़ जाते हैं। दादा दिनेश चंद्र वर्मा ऐसे ही थे। 29 जुलाई 1944 को विदिशा के शमशाबाद में जन्मे और कलम का आखिरी सांस तक साथ निभाने वाले इस फकीर पत्रकार को देखकर लगता था जैसे समय यहीं थम गया है। लंबे सफेद बाल, गरिमामय सफेद दाढ़ी, सादा कुर्ता और कंधे पर हमेशा लटका रहने वाला झोला। इस वेश में वे भोपाल की सड़कों पर ऐसे चलते थे जैसे कोई साधु तीर्थयात्रा पर निकला हो। पर इस साधु की ताकत उसकी कलम थी। और वो कलम कभी नहीं थकी, कभी नहीं रुकी।
चिंगारी से शुरू हुआ सफर
16 साल की उम्र। आठवीं में पढ़ते हुए ग्वालियर के दैनिक नवप्रभात में पहली रचना छपी। बस यहीं से बीज पड़ गया। पिता जगन्नाथ प्रसाद मिडिल स्कूल में हेडमास्टर थे। घर में अनुशासन था, पर दादा के भीतर एक जिद थी - भीड़ से अलग चलना है।
विदिशा में "चिंगारी" से शुरुआत की। फिर दैनिक भास्कर में 65 रुपए महीने पर श्यामसुंदर ब्यौहार और राजेन्द्र नूतन के साथ पत्रकारिता के गुर सीखे। नवभारत, दैनिक मध्यप्रदेश, जागरण इंदौर, इंदौर समाचार... हर जगह कुछ दिन। नौकरी उनसे नहीं निभी। शायद नौकरी उनके लिए बनी ही नहीं थी। उन्हें आजादी चाहिए थी। अपनी शर्तों पर, अपने सच के साथ लिखने की आजादी।
1975 में पिता के बीमार होने पर विदिशा लौट आए। यहीं से असली दिनेश वर्मा निकला। भू-भारती, सरिता, अवकाश, माया, मुक्ता, कादंबिनी, नवनीत, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, श्रीवर्षा। देश की हर बड़ी पत्रिका में उनके लेख। 1986 में "साप्ताहिक वचनबद्ध" निकाला और 1993 में "विनायक फीचर्स"। ये फीचर सेवा हिंदी पत्रकारिता की रीढ़ बन गई। 25 साल तक इसी के जरिये उन्होंने सैकड़ों गुमनाम लेखकों को नाम दिया, मंच दिया, पहचान दी।
खबर नहीं, तूफान लाते थे
दादा इंस्टेंट लेखन के उस्ताद थे। एक बैठक में 20-30 पेज। और वो भी तथ्यों, तारीखों और संदर्भों के साथ। वे चलते-फिरते सूचना भंडार थे। मध्यप्रदेश की राजनीति का कोई कोना ऐसा नहीं था जिससे वे वाकिफ न हों। "विस्पर्स कॉरिडोर" शब्द तब प्रचलन में नहीं था, पर दादा ने उसे जिंदा कर दिया। जहां बैठते, एक नई सुर्खी छोड़ जाते।
1965 में विदिशा में बाढ़ आई। दादा तब नवभारत में थे। उन्होंने पड़ताल की और पहले पन्ने पर लीड लगाई कि भोपाल से पानी छोड़ने की सूचना प्रशासन को थी, पर रात भर कोई नहीं जागा। खबर छपते ही विदिशा में हड़कंप। ये थी दादा की पत्रकारिता - सत्ता को आईना दिखाने वाली, जनता की आवाज बनने वाली।
सबसे बड़ा धमाका किया सांची में। बौद्ध भिक्षुओं की अस्थियों की तस्करी पर भू-भारती में छपा उनका लेख। भारत ही नहीं, श्रीलंका सरकार तक हिल गई। श्रीलंका के राजदूत को दिल्ली बुलाया गया। संसद में मुद्दा उठा। दादा ने साबित कर दिया कि एक पत्रकार की कलम सरकारें गिरा भी सकती है और इतिहास भी लिख सकती है।
रावण दुपारिया में रावण की पूजा। विजय मंदिर के गणेश, उदयगिरि की गुफाएं, भोजपुर का "एक और सोमनाथ", सांची के तोरणद्वार, सतधारा। इन विषयों पर उनके लेख धर्मयुग, नवनीत और कादंबिनी की शोभा बने। उनके लेखों का अनुवाद चीन, जापान, नेपाल और श्रीलंका तक पहुंचा। महज 30 साल की उम्र में "एक और अवतार इंदिरा गांधी" किताब लिख डाली। भूमिका लिखी तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चंद सेठी ने।
फकीरी और अपनापन
दादा का सबसे बड़ा गुण था - दुश्मनी न पालना। आज जो दुश्मन, कल वो दोस्त। शायद इसलिए उन्हें "अजातशत्रु" कहा जाता था। विद्याचरण शुक्ल हों, अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह या शिवराज सिंह। सबके दरवाजे उनके लिए खुले थे पर दादा ने कभी इस पहुंच का फायदा नहीं उठाया। इसीलिए जीवन भर फकीर रहे। जेब खाली, पर मन अमीर।
श्रमजीवी पत्रकार संघ बनाया, पर नेतागिरी से मोहभंग हो गया। उन्हें मंच नहीं, मैदान चाहिए था। मैदान यानी कागज और कलम।
वे अच्छे यायावर थे। अच्छे खाने के शौकीन थे, पर वक्त के पाबंद। कुछ सालों से कार लेकर खुद चल देते थे। जहां बुलाओ, हाजिर। कभी शिकन नहीं। कभी शिकायत नहीं। जीवन से नाराज नहीं थे। शायद इसलिए जीवन भी उनसे नाराज नहीं था।
पढऩे का जुनून गजब का था। जीवन में 16 पुराण पढ़ गए। रोज 4-5 घंटे किताबें। कहते थे "पत्रकारिता में अपडेट रहना सबसे बड़ी चुनौती है।" जासूसी उपन्यासों के भी जबर्दस्त शौकीन थे। हर एक जासूसी उपन्यासकार की किताबें उन्होंने पढ़ रखी थीं।
गुरु और शिष्य का रिश्ता
दादा मानते थे कि वे जो कुछ भी हैं, उसमें कई लोगों का हाथ है। श्यामसुंदर ब्यौहार ने रिपोर्टिंग सिखाई। गोवर्धन मेहता ने लेखन की महारत दी। धर्मवीर भारती, अज्ञेय, गुलशेर अहमद शानी और परेशनाथ से प्रेरणा मिली। पूर्व सांसद केएन प्रधान ने अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की बारीकियां बताईं।
पर दादा खुद भी गुरु थे। विनायक फीचर्स के जरिये उन्होंने कितने ही नौजवानों को कलम दी। मेरा भी उनसे संपर्क विनायक फीचर्स के द्वारा ही हुआ। जिनके पास नाम नहीं था, पता नहीं था, उन्हें दादा ने देश के अखबारों तक पहुंचाया। वे कहते थे "पत्रकारिता व्यापार नहीं, साधना है।" इसी साधना में उन्हें कई बार आर्थिक तंगी भी झेलनी पड़ी, पर समझौता नहीं किया। सिद्धांत नहीं बेचे।
दादा एक फोन पर स्मृति से तथ्य निकालकर दे देते। "अरे ये 72 में हुआ था, फलां मंत्री तब ये बोला था।" उम्र में कई साल बड़े थे, पर कभी नाम से नहीं बुलाया। हमेशा "रंजन जी" कहकर पुकारा। सम्मान देना और लेना उन्हें बखूबी आता था।
नदियों और मिट्टी से प्रेम
दादा की कलम सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं थी। उन्हें नदियों से अथाह प्रेम था। बेतवा के प्रदूषण पर उन्होंने कई बार कलम चलाई और अफसरों से बैर मोल लिया। वे चाहते थे कि नेता, अफसर और आम आदमी सब अपनी जिम्मेदारी समझें। नदी बचेगी तो संस्कृति बचेगी।
इतिहास और पुरातत्व पर उनकी पकड़ लाजवाब थी। सांची के एक-एक तोरण पर उनकी वार्ता आकाशवाणी से प्रसारित हुई। मंगलनाथ, ग्यारसपुर का मालादेवी मंदिर, उदयपुर का नीलकंठेश्वर - इन सब पर उन्होंने लिखा। भारत में नाग पूजा की परंपरा पर भी उनका लेख आज भी संदर्भ ग्रंथ की तरह पढ़ा जाता है।
आखिरी दिन तक कलम
शरीर आखिरी एक साल साथ नहीं दे रहा था। पर हौसला वही था। कार से आते, बैठते और घंटों बात करते। इकलौते बेटे पवन ने उनके सामने ही पत्रकारिता संभाल ली थी। इसे देखकर दादा को तसल्ली थी कि उनकी विरासत सुरक्षित हाथों में है।
दादा विवादों से दूर रहते थे। पर जब बात सच की आती, तो किसी से नहीं डरते थे। कई बार अफसर नाराज हुए, नेता नाराज हुए। पर अगले दिन वही लोग दादा की कलम की तारीफ भी करते थे। क्योंकि उन्हें पता था कि दादा के लिए सत्य सबसे ऊपर है।
आज भोपाल की उस मंडली में कोई दूसरा "दादा" नहीं है। वो आवाज नहीं है जो फोन पर आधी रात को भी सुनने को तैयार हो। वो झोला नहीं है जिसमें हमेशा कतरनों का बंडल रहता था। वो हंसी नहीं है जो किसी की गलती पर भी बिना चोट पहुंचाए समझा देती थी।
एक युग का अंत
दिनेश चंद्र वर्मा सिर्फ पत्रकार नहीं थे। वे एक संस्था थे। एक स्कूल थे। एक परंपरा थे। उन्होंने सिखाया कि पत्रकारिता का मतलब सिर्फ खबर देना नहीं, समाज को दिशा देना है। संस्कार देना है। इतिहास से जोड़ना है। जड़ों से जोड़े रखना है।
आज वे नहीं हैं पर उनकी कलम यहीं है। विनायक फीचर्स के हर अंक में है। धर्मयुग और सरिता की पुरानी फाइलों में है और उन सैकड़ों लेखकों के लेख में है जिन्हें दादा ने पहली बार मौका दिया था। दादा, आप चले गए। पर आपकी फकीरी, आपकी बेबाकी और आपकी कलम हमारे साथ रहेगी। आप शेष जीवन में हमेशा एक मधुर स्मृति बनकर हमारे बीच रहेंगे।जन्मजयंती पर आपको कोटि-कोटि नमन।* (विनायक फीचर्स)
