मध्यप्रदेश की राजनीति में महिलाओं की स्थिति

Status of women in Madhya Pradesh politics
 
मध्यप्रदेश की राजनीति में महिलाओं की स्थिति

(अंजनी सक्सेना – विभूति फीचर्स)

मध्यप्रदेश का राजनीतिक इतिहास अनेक प्रभावशाली पुरुष नेताओं के नाम से भरा हुआ है, लेकिन जब इसी इतिहास को महिला नेतृत्व के दृष्टिकोण से देखा जाता है तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। राज्य के गठन (1956) से लेकर आज तक महिला नेताओं की मौजूदगी तो रही है, परंतु संख्या और प्रभाव के लिहाज से यह उपस्थिति सीमित ही रही है। कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने अपने समय में मजबूत पहचान बनाई, लेकिन उनके बाद उसी स्तर का व्यापक और दीर्घकालिक महिला नेतृत्व उभरता दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि आज भी मध्यप्रदेश की राजनीति में प्रभावी महिला नेतृत्व की कमी अक्सर चर्चा का विषय बनती है।

राज्य के राजनीतिक इतिहास में महिला नेतृत्व की शुरुआत जिस गरिमा और प्रभाव के साथ हुई थी, वह आगे चलकर निरंतरता नहीं पकड़ सकी। शुरुआती दशकों में कुछ ऐसी महिलाएं सामने आईं जिन्होंने न केवल प्रदेश की राजनीति को दिशा दी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान स्थापित की। लेकिन समय के साथ यह परंपरा कमजोर होती चली गई।

गरिमामयी राजनीति की आधारशिला: राजमाता सिंधिया

मध्यप्रदेश की राजनीति में महिला नेतृत्व की सबसे प्रभावशाली शुरुआत श्रीमती विजयाराजे सिंधिया से मानी जाती है। ग्वालियर राजघराने की राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने केवल चुनावी राजनीति ही नहीं की, बल्कि वैचारिक राजनीति को भी मजबूत आधार दिया। अपने गरिमापूर्ण और ममतामयी व्यवहार से उन्होंने जनसंघ और बाद में भाजपा के संगठन को खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वे केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थीं, बल्कि एक ऐसा व्यक्तित्व थीं जिन्होंने वैचारिक प्रतिबद्धता और जनसंपर्क दोनों को साथ लेकर राजनीति की। 1960 और 1970 के दशक में मध्यप्रदेश में जनसंघ की जड़ें मजबूत करने में उनका योगदान निर्णायक माना जाता है।

इमरजेंसी के दौरान उनका संघर्ष भी राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। उन्होंने सत्ता के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाई और जेल जाने से भी पीछे नहीं हटीं। इस प्रकार वे केवल ग्वालियर या चंबल क्षेत्र की नेता नहीं रहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी उनकी मजबूत पहचान बनी।

आदिवासी नेतृत्व की सशक्त आवाज: जमुना देवी

कांग्रेस की राजनीति में यदि किसी महिला नेता ने गहरा प्रभाव छोड़ा, तो वह थीं जमुना देवी। उन्हें मध्यप्रदेश की सबसे प्रभावशाली आदिवासी महिला नेता माना जाता है। वे कई बार विधायक चुनी गईं और राज्य सरकार में मंत्री भी रहीं। 2003 से 2008 तक वे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहीं, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

उनकी राजनीति केवल पदों तक सीमित नहीं थी। वे आदिवासी समाज की समस्याओं को मजबूती से उठाने वाली नेता थीं। ग्रामीण क्षेत्रों में उनका जनाधार बहुत मजबूत था और वे आम लोगों से सीधे संवाद करने वाली नेता के रूप में जानी जाती थीं। उनके निधन के बाद कांग्रेस में वैसा ही मजबूत आदिवासी महिला नेतृत्व कम दिखाई देता है।

अग्निमुखी साध्वी: उमा भारती

मध्यप्रदेश की राजनीति में महिला नेतृत्व का सबसे बड़ा प्रतीक उमा भारती के रूप में सामने आया। 2003 में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद उमा भारती प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। यह प्रदेश की राजनीति में एक ऐतिहासिक क्षण था, क्योंकि पहली बार किसी महिला नेता ने राज्य की सत्ता संभाली।

ओजस्वी वक्तृत्व और आक्रामक राजनीतिक शैली के कारण उन्हें “फायरब्रांड” नेता कहा जाता था। राम मंदिर आंदोलन से लेकर प्रदेश की राजनीति तक उनका प्रभाव व्यापक रहा। हालांकि उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा, लेकिन उन्होंने यह साबित किया कि महिला नेतृत्व भी प्रदेश की राजनीति में शीर्ष तक पहुंच सकता है।

सशक्त और संतुलित नेतृत्व: सुमित्रा महाजन

मध्यप्रदेश से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाली सुमित्रा महाजन इंदौर से लगातार आठ बार लोकसभा सांसद चुनी गईं। यह उपलब्धि अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनकी राजनीतिक शैली संयमित, सादगीपूर्ण और संगठनात्मक रही। 2014 से 2019 तक वे लोकसभा की स्पीकर रहीं, जो भारतीय लोकतंत्र का अत्यंत प्रतिष्ठित पद है।

सरल, सहज और लोकप्रिय: सुषमा स्वराज

सुषमा स्वराज भारतीय राजनीति की सबसे लोकप्रिय महिला नेताओं में गिनी जाती हैं। विदेश मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने वैश्विक स्तर पर भारत की सशक्त आवाज प्रस्तुत की। सोशल मीडिया के माध्यम से आम नागरिकों की सहायता करने की उनकी शैली ने उन्हें जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय बना दिया। विदिशा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर उन्होंने मध्यप्रदेश का राष्ट्रीय राजनीति में मान बढ़ाया।

इसके अतिरिक्त विद्यावती चतुर्वेदी, विमला वर्मा, मैमूना सुल्तान, जयश्री बैनर्जी, डॉ. नजमा हेपतुल्ला, कुसुम मेंहदले, उर्मिला सिंह, डॉ. कल्पना परुलेकर, यशोधरा राजे, डॉ. विजयलक्ष्मी साधौ, अनुसुईया उइके, मीनाक्षी नटराजन और कल्याणी पाण्डेय जैसी नेता भी प्रदेश की राजनीति में सक्रिय और चर्चित रही हैं।

वर्तमान राष्ट्रीय परिदृश्य में रिक्तता

सुषमा स्वराज और सुमित्रा महाजन के बाद राष्ट्रीय स्तर पर मध्यप्रदेश की महिला नेतृत्व की वैसी मजबूत पहचान फिलहाल दिखाई नहीं देती। वर्तमान में प्रदेश से कई महिला नेता सक्रिय जरूर हैं—जैसे केंद्रीय मंत्री सावित्री ठाकुर, राज्य सरकार में मंत्री कृष्णा गौर, संपतिया उइके, निर्मला भूरिया, राधा सिंह, प्रतिमा बागरी, सांसद लता वानखेड़े, विधायक अर्चना चिटनीस और पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर—लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रभाव और स्वीकार्यता अभी सीमित दिखाई देती है। यह स्थिति केवल किसी एक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग सभी राजनीतिक दलों में दिखाई देती है।

कांग्रेस में महिला नेतृत्व

कांग्रेस में जमुना देवी और उर्मिला सिंह के बाद राज्य में वैसा प्रभावशाली महिला नेतृत्व उभरता कम दिखाई देता है। हालांकि संगठन में कुछ महिलाएं सक्रिय रही हैं। उदाहरण के लिए शोभा ओझा को महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का अवसर मिला, जो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। लेकिन चुनावी राजनीति में अपेक्षित सफलता न मिल पाने के कारण उनका प्रभाव व्यापक नहीं हो सका। यही स्थिति मीनाक्षी नटराजन की भी रही।राजनीति में संगठन और जनाधार दोनों का संतुलन आवश्यक होता है। यदि कोई नेता चुनावी मैदान में मजबूत प्रदर्शन नहीं कर पाता, तो उसकी राजनीतिक पहचान सीमित रह जाती है।

भाजपा में भी सीमित अवसर

भाजपा में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। राजमाता सिंधिया और उमा भारती जैसी प्रभावशाली महिला नेताओं के बाद उसी स्तर का व्यापक महिला नेतृत्व कम दिखाई देता है। राज्य सरकारों में महिला मंत्री जरूर रही हैं और कई महिलाएं विधायक भी बनी हैं, लेकिन प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक जनाधार और वैचारिक प्रभाव रखने वाली महिला नेताओं की संख्या सीमित ही है।

पंचायत और स्थानीय राजनीति से बदलाव के संकेत

हालांकि एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि पंचायत और नगरीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। आरक्षण व्यवस्था के कारण हजारों महिलाएं सरपंच, जनपद सदस्य, जिला पंचायत सदस्य और पार्षद के रूप में राजनीति में आई हैं। इससे महिलाओं की भागीदारी का आधार जरूर मजबूत हुआ है, लेकिन स्थानीय स्तर से प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचने की यात्रा अभी भी आसान नहीं है। इसके लिए संगठनात्मक समर्थन, संसाधन और दीर्घकालिक राजनीतिक प्रशिक्षण आवश्यक है।

सामाजिक और राजनीतिक कारण

महिला नेतृत्व की कमी के पीछे कई सामाजिक और राजनीतिक कारण भी हैं। राजनीति अभी भी काफी हद तक पुरुष प्रधान मानी जाती है। चुनावी राजनीति में संसाधनों की आवश्यकता, लंबे समय तक क्षेत्र में सक्रिय रहने की चुनौती और पारिवारिक जिम्मेदारियां भी कई बार महिलाओं के लिए बाधा बनती हैं। इसके अलावा राजनीतिक दल भी कई बार महिलाओं को सीमित अवसर देते हैं। चुनावी टिकट वितरण में महिलाओं की संख्या अभी भी कम रहती है।

क्या हैं संभावनाएँ

प्रदेश में उन महिलाओं के सामने जो राजनीति में आगे बढ़ने की क्षमता, योग्यता और सपना रखती हैं, स्थिति निराशाजनक तो नहीं है, लेकिन चुनौतियां अवश्य हैं। नई पीढ़ी की कई महिलाएं राजनीति में सक्रिय हो रही हैं। शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और राजनीतिक भागीदारी के बढ़ते अवसरों के कारण आने वाले समय में मजबूत महिला नेतृत्व उभरने की संभावना भी है।

जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल महिलाओं को केवल प्रतीकात्मक भूमिका तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें निर्णय प्रक्रिया में भी बराबरी का स्थान दें। यदि आने वाले समय में महिला नेतृत्व को गंभीरता से आगे बढ़ाया गया, तो संभव है कि मध्यप्रदेश की राजनीति में फिर से ऐसी प्रभावशाली महिला नेता उभरें जो प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति में भी नई पहचान स्थापित करें।

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