दुबई से सुरक्षित भारत वापसी की दास्तां

अनिश्चितता के साए से वतन के गुलाल तक का सफर
 
दुबई से सुरक्षित भारत वापसी की दास्तां
(प्रवीण कक्कड़ — विनायक फीचर्स)
दुनिया कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, लेकिन जब आसमान से बारूद बरसने की आहट सुनाई देती है, तो इंसान को सिर्फ अपना घर और अपनी मिट्टी याद आती है। हाल ही में दुबई यात्रा के दौरान ऐसा ही अनुभव हुआ, जिसने जीवन और विश्वास के नए अर्थ समझा दिए। यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि अनिश्चितता के साये से निकलकर होली पर अपनों के बीच पहुंचने की भावनात्मक दास्तां है।

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उत्सव की रोशनी पर युद्ध की छाया

हम दुबई में एक पारिवारिक समारोह में शामिल थे। शहर अपनी पूरी भव्यता के साथ जगमगा रहा था। लेकिन अचानक ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते संघर्ष की खबरों ने माहौल बदल दिया।
पाम क्षेत्र के जिस होटल में हम ठहरे थे, उसके पास जब ड्रोन हमले की गूंज सुनाई दी, तो क्षण भर को समय जैसे ठहर गया। यद्यपि संयुक्त अरब अमीरात की रक्षा प्रणाली बेहद मजबूत है, लेकिन बारूद की आहट ने उत्सव के वातावरण को अनिश्चितता में बदल दिया। स्थिति को देखते हुए हमने एक सुरक्षित विला में शिफ्ट होने का निर्णय लिया। एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में यह समय घबराने का नहीं, बल्कि रणनीति के साथ निर्णय लेने का था।

बुराई के अंत का जीवंत अहसास

उन अनिश्चित रातों में मुझे भारत में होने वाले होलिका दहन की याद आती रही। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि यह विश्वास है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग आस्था सुरक्षित रहती है।
दुबई के आसमान में जब एक ड्रोन को नष्ट होते देखा, तो लगा जैसे आधुनिक दौर की ‘होलिका’ — युद्ध और नफरत — स्वयं भस्म हो रही हो। मन में बस यही प्रार्थना थी कि यह नकारात्मकता समाप्त हो और हम सकुशल अपने देश लौट सकें। वतन की मिट्टी ही सुरक्षा का अहसास परदेस में जब उड़ानें रुक जाती हैं और घर वापसी अनिश्चित हो जाती है, तब अपने देश की शांति और सुरक्षा का वास्तविक महत्व समझ आता है। एयरपोर्ट पर भारतीय समुदाय संयम और उम्मीद के साथ अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा था।

भारत सरकार और प्रशासनिक तंत्र की

सक्रियता ने यह भरोसा दिलाया कि देश अपने नागरिकों को कभी अकेला नहीं छोड़ता। संकट के समय विचारधाराएं पीछे छूट जाती हैं और केवल मानवता शेष रह जाती है।
मेरे साथ संजय शुक्ला, विशाल पटेल, पिंटू छाबड़ा, गोलू पाटनी, संजय अग्रवाल और मनीष सहारा भी सुरक्षित इंदौर लौट आए। कुछ परिजन अभी दुबई में हैं और उनके शीघ्र लौटने की संभावना है।

जीवन की जीत

जब वतन लौटकर घर के आंगन में गुलाल उड़ा, तो लगा वह केवल रंग नहीं, बल्कि भय और अनिश्चितता पर जीवन की जीत का प्रतीक है।
वही लाल रंग, जो वहां खतरे का संकेत था, यहां प्रेम और सौभाग्य का प्रतीक बन गया। वही केसरिया, जो वहां आग की लपटों जैसा दिख रहा था, यहां त्याग और भक्ति का भाव लिए था। सचमुच, रंग वही होते हैं — बस परिवेश और दृष्टिकोण बदल जाता है।

घर वापसी ही असली उपहार

घर से हजारों किलोमीटर दूर संकट में फंसे होने पर न होटल की विलासिता याद आती है, न शहर की चमक। याद आता है तो केवल अपना घर, अपना परिवार और अपनी मिट्टी।
इस अनुभव ने सिखाया कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि सुरक्षित घर लौटना है। इस कठिन समय में मित्रों, शुभचिंतकों और मीडिया साथियों के निरंतर संवाद और प्रार्थनाओं ने मनोबल बनाए रखा।
आज जब अपने घर की मिट्टी को छूता हूं, तो उसकी सोंधी खुशबू में उन सभी दुआओं का असर महसूस होता है। यह अनुभव सिखा गया कि संकट चाहे कितना भी बड़ा हो, अपनों का साथ और विश्वास हर चुनौती को छोटा कर देता है। अंततः जीत केवल अटूट विश्वास, सामूहिक शक्ति और प्रेम के रंगों की ही होती है।

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