बहन-बेटियों पर अपमानजनक टिप्पणी पर कड़ी कार्रवाई आवश्यक

Strict action is necessary against derogatory remarks on sisters and daughters.
 
बहन-बेटियों पर अपमानजनक टिप्पणी पर कड़ी कार्रवाई आवश्यक

(डॉ. सुधाकर आशावादी – विभूति फीचर्स)  समाज में जातीय तनाव और मानसिक कुंठा जिस रूप में सामने आ रही है, वह बेहद चिंताजनक है। शिक्षा और रोजगार में वर्षों से लागू आरक्षण व्यवस्था की समय-समय पर समीक्षा न होने के कारण इससे लाभान्वित होने वाला एक वर्ग इसे अपना स्थायी अधिकार मान बैठा है। यही कारण है कि कई लोग सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले बयान देकर समाज में वैमनस्य फैलाने का प्रयास कर रहे हैं।

इसी सोच का हालिया उदाहरण मध्य प्रदेश में सामने आया, जहाँ आरक्षण से जुड़े अधिकारियों-कर्मचारियों के संगठन के एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने ब्राह्मण समाज की बहन-बेटियों के प्रति अभद्र और अपमानजनक टिप्पणी की। संचार क्रांति के दौर में इस तरह का आचरण न केवल अक्षम्य है, बल्कि यह उस मानसिक विकृति को भी उजागर करता है जो समाज में शांति और सौहार्द के लिए बाधक बनती जा रही है।

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जनता और संगठनों ने की कठोर कार्रवाई की मांग

अधिकारी के इस बयान के सामने आते ही समाज के विभिन्न वर्गों, संगठनों, अधिवक्ताओं और शिक्षित नागरिकों ने कड़ी नाराज़गी जताते हुए दंडात्मक कार्रवाई की मांग उठाई। यह अपेक्षित भी था, क्योंकि जो व्यक्ति आरक्षण के आधार पर उच्च पद तक पहुँचा हो, उससे गरिमा, संयम और जिम्मेदारी की उम्मीद की जाती है।

बदलते समाज के संदर्भ में ऐसे बयान अस्वीकार्य

आज का समाज तेजी से बदल रहा है। युवा अपनी पसंद से विवाह का निर्णय ले रहे हैं और अंतरजातीय विवाह सामान्य होते जा रहे हैं। ऐसे समय में किसी एक जाति की बेटियों के विवाह को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करना न केवल बौद्धिक दिवालियापन दर्शाता है बल्कि सामाजिक समरसता को ठेस पहुँचाने वाला कृत्य भी है। कन्याएं अब दान की वस्तु नहीं, बल्कि समान अधिकारों के साथ आत्मनिर्भर नागरिक हैं। उनके बारे में तुच्छ और अपमानजनक टिप्पणी करना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

अमर्यादित टिप्पणियों को अपराध की श्रेणी में लाने की आवश्यकता

किसी भी समुदाय, धर्म या वर्ग के खिलाफ अभद्र टिप्पणी समाज में विष फैलाती है। ऐसी टिप्पणियों को केवल माफी मांगकर समाप्त नहीं किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे वक्तव्यों को दंडनीय अपराध माना जाए और दोषियों को कड़ी सजा दी जाए, ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति समाज में घृणा और द्वेष फैलाने का दुस्साहस न कर सके।

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