चीनी के भाव हाई, चाय-पानी पर आफत आई
(मुकेश “कबीर” — विभूति फीचर्स)
चीनी आखिर महंगी हो ही गई। वैसे चीनी का नाम सुनते ही सस्ती और मीठी चीज का ख्याल आता है। इसी वजह से यह खूब बिकती भी है और घर में ज्यादा दिन टिकती भी नहीं। लेकिन इन दिनों अपनी यही चीनी पता नहीं क्यों भाव खाने लगी है। भाव भी ऐसे बढ़ा रही है कि चाय-पानी कराने वालों को अब मेहमान से पहले चीनी के डिब्बे की चिंता होने लगी है।
भारत में चीनी के दाम बढ़ने का मतलब केवल महंगाई बढ़ना नहीं है, बल्कि कई लोगों के भाव घटना भी है। पहले कोई आता था तो सहज ही कह देते थे—“चाय पिएंगे?” अब यह सवाल पूछने से पहले दिमाग में कैलकुलेटर चलने लगता है। चीनी सस्ती थी तो हम चाय पीते भी थे और पिलाते भी थे। हमारे भोपाल में तो चाय केवल चाय नहीं थी, ‘पिलान’ बनाने का जरिया थी।

“कों खां, अगले जुमे को क्या पिलान है तुम्हारा?”“अरे यार, अभी तक तो कुछ सोचा नहीं। चलो, चाय पीकर पिलान बनाते हैं।” बस, ऐसे ही पीते-पिलाते पिलान बन जाता था। यानी चाय पीने से पहले प्लान नहीं, बल्कि चाय पीकर पिलान बनता था। अब इस महंगी चीनी ने तो पूरा पिलान ही चौपट कर दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि चीनी ऊपर जा रही है तो नीचे कब आएगी? आएगी भी या नहीं? हमारी दुनिया का नियम ही कुछ ऐसा है कि जो एक बार ऊपर चला जाए, वह नीचे आने का नाम नहीं लेता। चीनी भी सत्रह से सत्तर तक पहुंच गई, लेकिन कभी सत्तर से सोलह तो छोड़िए, सत्रह तक भी वापस नहीं आई।
सोलह पर जाना खतरे की निशानी माना जाता है, लेकिन सत्तर तक पहुंचने की भी आखिर इतनी जल्दी क्या है? थोड़ा धीरे-धीरे ऊपर जाओ, अदाओं के साथ, मोरनी की चाल से। मगर चीनी तो इन दिनों टाइगरनी की चाल चल रही है—एक बार में दस कदम! बावन से सीधे बासठ।
हमने सोचा भी नहीं था कि चीनी इतनी जल्दी सठिया जाएगी। उसे समझना चाहिए कि हिन्दुस्तान में सठियाने का मतलब पगला जाना होता है और पगलाने वाले को कोई ज्यादा भाव नहीं देता। इसलिए चीनी को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
हालांकि विचार करने के लिए चाय की जरूरत हो तो हम पिला देंगे। हमारे बेधड़क भोपाली भी पिला देंगे। लेकिन उनका चाय पिलाने का अंदाज भी पूरा भोपाली है। पहले बड़े प्यार से कहेंगे—“चलो मियां, आपको चाय पिलाते हैं।” चाय पीकर जब बिल देने की बारी आएगी तो ऐसे फैल जाएंगे जैसे रायता। फिर मजबूरी में अपनी ही जेब ढीली करनी पड़ेगी।
खैर, हम तो चीनी से केवल इतना कहना चाहते हैं कि चीनी, तुम चीनी ही बनी रहो, जापानी मत बनो। सस्ती रहोगी तो भारत में इज्जत बनी रहेगी। भाव बढ़ाओगी तो लोग भाव देना बंद कर देंगे।
सुना है जापान में एक बार टमाटर बहुत महंगे हो गए थे। जापानियों ने टमाटर खाना ही छोड़ दिया। आखिरकार टमाटर को झक मारकर सस्ता होना पड़ा। अब अगर यही जापानी तरीका हमने चीनी पर आजमा लिया तो क्या होगा?
हालांकि चीनी को हमारी मजबूरी अच्छी तरह मालूम है। उसे पता है कि हम उसके बिना ज्यादा दिन नहीं रह सकते। साल में पचासों त्योहार आते हैं और भारत में कोई भी त्योहार मिठास के बिना पूरा नहीं होता। मिठाई बनानी हो, हलवा बनाना हो या मेहमान को चाय पिलानी हो—हर जगह चीनी की जरूरत पड़ती है।
लेकिन चीनी जी, हमारी मजबूरी का इतना फायदा मत उठाइए कि हमें मजबूर होकर आपका बहिष्कार करना पड़े। आपको तो मालूम ही है कि हम जब बहिष्कार पर उतरते हैं तो अच्छे-अच्छों को लाइन पर ला देते हैं।
अब यही ताकत चीनी को दिखाने की जरूरत है। मगर मुश्किल यह है कि चीनी के बहिष्कार की बात करना आसान है और चाय के बिना रहना मुश्किल। हमारी आधी ताकत तो चाय से ही आती है। चाय नहीं होगी तो सुबह कैसे होगी, बैठक कैसे होगी और सबसे बड़ी बात—पिलान कैसे बनेगा?
यही हमारी कमजोरी है और शायद चीनी इसी कमजोरी का फायदा उठा रही है। अब देखना यह है कि इस जोर-जोरी में जीत किसकी होती है और चने के खेत का क्या हाल होता है।वैसे चने से याद आया—गुड़-चना भी तो हमारा बहुत पुराना स्वागत-सत्कार है। कहीं ऐसा न हो कि महंगी चीनी हमें फिर उसी पुराने दौर में वापस भेज दे। स्वागत में मिठाई की जगह गुड़-चना, और चाय में चीनी की जगह...?बस, यहीं आकर सारी पिलानिंग अटक जाती है। पिलानिंग के लिए चाय चाहिए और चाय के लिए चीनी।
तो फिलहाल बीच का रास्ता एक ही दिखाई देता है—
