बर्फ में धूप
(विवेक रंजन श्रीवास्तव – विभूति फीचर्स) डॉक्टर राजिंदर कुमार अपने टोरंटो स्थित अपार्टमेंट की खिड़की से बाहर देख रहे थे। कनाडा की सफेद, चुभती ठंड शीशे के पार पूरी दुनिया को जमा देना चाहती थी। सब कुछ बर्फ़ से ढका था—गाड़ियाँ, पेड़, सड़कें। दिखाई देते थे तो बस बर्फ पर पड़े कदमों के निशान। यह एकांगी, निस्तब्ध सफेद सुंदरता थी, जिसमें उनकी आत्मा की गूँज कहीं खो जाती थी। अंदर हीटर की समान गरमाहट थी, सरकारी पेंशन की नियमितता थी, स्वास्थ्य सेवाओं का भरोसा भी—एक आत्मनिर्भर, पूर्ण दुनिया, जो अचानक उन्हें बहुत खोखली लगने लगी थी।
उनकी नज़र सोफे के पास टंगे एक फोटो फ्रेम पर टिक गई—पंजाब के अपने गाँव चमकपुर की एक पुरानी तस्वीर। गर्मी की दोपहर, नहर का चमकता पानी, खेतों में लहराती हरियाली और दूर गुरुद्वारे का निशान साहब दमकता हुआ। यह वही गाँव था, जिसे उन्होंने पचास साल पहले डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ आने के बाद छोड़ा था। फिर संघर्ष आया, फिर सपना—बेहतर जीवन, बेहतर कमाई।
राकेश कौर उनके साथ थीं—उनका प्यार, उनका सहारा। कनाडा आने का फैसला दोनों ने साथ किया था, नए सिरे से शुरुआत के जोश के साथ। राकेश ने ही इस अपार्टमेंट को घर बनाया था—पंजाबी मसालों की खुशबू से, गुरबाणी के शब्दों से, और अपनी आत्मीयता से।

लेकिन पाँच साल पहले राकेश चली गईं—एकाएक, दिल के दौरे से। उनके साथ वह धूप भी चली गई, जो कनाडा की सबसे कठोर ठंड में भी प्यार की गर्माहट दे जाती थी। राजिंदर अकेले रह गए। इसी अकेलेपन ने, रिटायरमेंट के बाद, उन्हें फिर से जड़ों की तलाश में चमकपुर बुला लिया।
पर गाँव बदल चुका था। नहर अब कंक्रीट की नाली बन गई थी। पुराने पेड़ कट चुके थे। चौपाल की जगह एक ‘यूथ क्लब’ ने ले ली थी, जहाँ लड़के मोबाइल में डूबे रहते थे। रिश्तेदार मिले, पर बातचीत का केंद्र अक्सर वही सवाल होते—
“कनाडा में तो बहुत पैसा है न?”“हमारे बेटे के लिए वीज़ा स्पॉन्सर कर दीजिए।” जिस अपनेपन की तलाश उनकी यादों में थी, वह अब हवा हो चुका था।
एक दिन स्थानीय शब्द साधना साहित्य परिषद के सचिव, श्री ओमप्रकाश शर्मा, उनसे मिले। बड़े आदर से फूलमाला पहनाई गई। ओमप्रकाश बोले, “डॉक्टर साहब! आप तो विदेश से आए हुए साहित्य के महान पारखी हैं। हम आपके नाम पर ‘राजिंदर कुमार साहित्य रत्न सम्मान’ शुरू करना चाहते हैं। यह देश-सेवा का पुनीत अवसर है।”
राजिंदर ने प्रसन्न होकर कहा,
“ज़रूर, यह तो बहुत अच्छी बात है। मैं कैसे मदद कर सकता हूँ?”
ओमप्रकाश मुस्कुराते हुए बोले,
“बस एक छोटी-सी संस्थागत फीस है… तीन लाख रुपये। हमारे पास चेक स्वीकार करने की सुविधा भी है।”
राजिंदर का दिल बिना कहे बहुत कुछ समझ गया। यह पहला झटका नहीं था। कई ‘संस्थाओं’ के फोन पहले ही आ चुके थे। उनका ‘विदेशी’ होना, उनकी साहित्यिक रुचि को लेन-देन में बदल चुका था। उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया, लेकिन फोन आते रहे—कभी सुबह, कभी रात। एक ओर पंजाब की स्मृतियाँ थीं, दूसरी ओर इन मांगों से उपजी विरक्ति।
और फिर वह दिन आया।
भारत में सुबह के दस बजे थे—धूप फैलने का समय। टोरंटो में अँधेरी, बर्फ़ीली रात के दो बजे थे। फोन की कर्कश घंटी ने उनकी नींद तोड़ दी।
अनजान आवाज़ बोली,
“नमस्ते डॉक्टर साहब, मैं ‘काव्य भारती’ से बोल रहा हूँ। आपको ‘वैश्विक पंजाबी रत्न’ से सम्मानित किया जाएगा। बस कुछ प्रबंध खर्च…”
राजिंदर ने फोन काट दिया। नींद उचट चुकी थी। वह खिड़की के पास गए। बाहर निर्मम, खामोश बर्फ़बारी जारी थी। उन्हें लगा जैसे वे खुद दो टुकड़ों में बँट गए हों—एक टुकड़ा इस बर्फीली नियमितता में फँसा हुआ, दूसरा उस चमकपुर में भटकता हुआ, जो अब है, पर बचा नहीं है।
वे न यहाँ के थे, न वहाँ के। एक गहरी विभक्ति उनके भीतर घर कर गई थी।
कई रातों की मानसिक जद्दोजहद के बाद, एक सुबह जब पहली किरण बर्फ पर पड़ी और सब कुछ हीरे-सा जगमगा उठा, तो उनके भीतर एक शांति उतर आई। उन्होंने बाहर देखा। यह दृश्य उनका था। यह ठंड उन्होंने झेली थी। यहीं उन्होंने दाँत दर्द से तड़पते मरीजों को राहत दी थी। यहीं राकेश उनके साथ थीं।
“प्रारब्ध,” उन्होंने धीमे से कहा,
“यही हमारी कर्मभूमि बना दी गई। यहीं हमारा दाना-पानी रहा। अब यही घर है।”
उसी दिन उन्होंने अपनी वसीयत लिखी—बिना किसी भव्यता के, पूरी सादगी से।
इलेक्ट्रिक भट्टी में शवदाह हो और उनकी चुटकी-भर राख नियाग्रा प्रपात के उफनते, गरजते जल में प्रवाहित कर दी जाए—उस अनंत प्रवाह में, जो सब कुछ अपने भीतर समा लेता है। उनका जीवन, उनकी स्मृतियाँ, उनका पंजाब और उनका कनाडा—सब एक हो जाए।
और एक अंतिम निर्देश—
टोरंटो के ही एक गुरुद्वारे में ‘डॉ. राजिंदर कुमार एवं राकेश कौर साहित्य संवाद’ के नाम से एक वार्षिक कोष स्थापित किया जाए। बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी फीस के—सिर्फ़ शब्दों के लिए, विश्व हिंदी साहित्य के लिए।
डॉक्टर राजिंदर कुमार ने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखा। बर्फ अब भी गिर रही थी, लेकिन अब उसकी खामोशी में उन्हें एक संगीत सुनाई दे रहा था। यह उनकी खामोशी थी। यह उनका घर था।
और इस बार, देर रात फोन बजने से उनकी नींद उचटने वाली नहीं थी—वे वसीयत कर चुके थे।
