विश्व योग आंदोलन के अग्रदूत थे स्वामी सत्यानंद सरस्वती, मुंगेर से दुनिया तक पहुंचाया योग का संदेश
(कुमार कृष्णन-विभूति फीचर्स) विश्व योग आंदोलन को नई दिशा देने वाले महान संत Swami Satyananda Saraswati का मुंगेर आगमन 6 मई 1957 को एक परिव्राजक संन्यासी के रूप में हुआ था। बिहार यात्रा के दौरान छपरा से आगे बढ़ते हुए वे पहली बार मुंगेर पहुंचे। गंगा तट और यहां की आध्यात्मिक वातावरण ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने यहां चातुर्मास भी किया और इसी भूमि पर उन्हें यह अनुभूति हुई कि आने वाले समय में मुंगेर विश्व योग का प्रमुख केंद्र बनेगा।
उनकी इसी आध्यात्मिक दृष्टि का परिणाम था कि आगे चलकर मुंगेर में विश्वप्रसिद्ध Bihar School of Yoga की स्थापना हुई, जिसने योग को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पदार्पण महोत्सव का आयोजन
स्वामी सत्यानंद सरस्वती के मुंगेर आगमन के 69 वर्ष पूरे होने के अवसर पर 5 और 6 मई 2026 को भव्य “पदार्पण महोत्सव” एवं “श्रीनिवास कल्याणोत्सवम्” का आयोजन किया जा रहा है। इस विशेष अवसर पर आंध्र प्रदेश से भगवान Lord Venkateswara की उत्सव मूर्ति सड़क मार्ग से मुंगेर लाई जा रही है।
Swami Niranjanananda Saraswati ने बताया कि वर्ष 2023 में स्वामी सत्यानंद की जन्मशती व्यापक स्तर पर मनाई गई थी। सन्यास परंपरा में 108 संख्या के विशेष महत्व को देखते हुए 2023 से 2031 तक उनकी जयंती “पद्म जयंती” के रूप में मनाई जा रही है। इसी क्रम में इस वर्ष मुंगेर में विशेष आध्यात्मिक आयोजन हो रहे हैं।
6 मई को उत्तरवाहिनी गंगा तट पर पादुका दर्शन और विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होंगे। इसके बाद पोलो ग्राउंड में श्रद्धालुओं के लिए दर्शन कार्यक्रम रखा गया है। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम से आए विद्वान आचार्य वैदिक अनुष्ठानों का संचालन करेंगे।
योग को साधुओं से निकालकर आमजन तक पहुंचाया
स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने उस दौर में योग को नई पहचान दी, जब इसे केवल साधु-संतों तक सीमित माना जाता था। उन्होंने यह स्थापित किया कि योग केवल संन्यासियों के लिए नहीं, बल्कि गृहस्थों, महिलाओं और आम नागरिकों के लिए भी उपयोगी है।
उनके अनुसार योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन की एक वैज्ञानिक प्रणाली है। उन्होंने योग को जीवनशैली और सामाजिक परिवर्तन के माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया। उनका मानना था कि मानव के भीतर प्राण, चित्त और आत्मा का संतुलन ही वास्तविक विकास का आधार है।
कर्णचौरा से विश्व योग केंद्र तक का सफर
आज जहां बिहार योग विद्यालय स्थित है, वह स्थान कभी कर्णचौरा के नाम से प्रसिद्ध था। मान्यता है कि महाभारत काल में राजा कर्ण यहां बैठकर प्रतिदिन स्वर्ण दान करते थे। स्वामी सत्यानंद ने इसी स्थान पर संकल्प लिया कि जिस भूमि से कभी सोना दान हुआ करता था, वहां से अब पूरी दुनिया को शांति और योग का संदेश दिया जाएगा।
उनकी साधना और प्रयासों का ही परिणाम है कि आज योग पूरी दुनिया में स्वीकार किया जा चुका है और United Nations द्वारा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मान्यता दी गई है।
दुनिया के 48 देशों तक पहुंचाया योग
Swami Satyananda Saraswati ने 1964 में बिहार योग विद्यालय की स्थापना की और इसके बाद पूरी दुनिया में योग के प्रचार-प्रसार के लिए यात्राएं शुरू कीं। उन्होंने यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, अमेरिका, ग्रीस, कुवैत, ईरान, इराक, केन्या और घाना सहित 48 देशों में योग की आधारशिला रखी। उनकी लिखी पुस्तकें — योग निद्रा, प्राणायाम विज्ञान, सूर्य नमस्कार, योगासन मुद्रा बंध और अन्य ग्रंथ — आज भी योग साधकों के लिए मार्गदर्शक मानी जाती हैं।
रिखियापीठ से सेवा और मानवता का संदेश
1988 में मुंगेर छोड़ने के बाद स्वामी सत्यानंद झारखंड के देवघर स्थित रिखिया पहुंचे, जहां उन्होंने Rikhiapeeth की स्थापना की। यहां उन्होंने सेवा, प्रेम और दान को साधना का हिस्सा बनाया। रिखिया के गरीब और पिछड़े गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक उत्थान के लिए उन्होंने व्यापक कार्य किए। बालिकाओं की शिक्षा, गरीब परिवारों की सहायता, विधवाओं के लिए पेंशन, जरूरतमंदों को रोजगार के साधन और युवाओं को कंप्यूटर शिक्षा जैसी अनेक योजनाओं के जरिए उन्होंने सेवा को योग का विस्तार बनाया।
योग और मानवता की अमर विरासत
25 दिसंबर 1923 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा में जन्मे स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने पूरी दुनिया को योग की ऐसी धरोहर दी, जिसने करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। उनकी योग-निद्रा पद्धति और वैज्ञानिक योग दृष्टिकोण आज भी विश्वभर में लोकप्रिय हैं।5 दिसंबर 2009 को उन्होंने महासमाधि ली, लेकिन उनका योग आंदोलन आज भी निरंतर आगे बढ़ रहा है। उनके शिष्य Swami Niranjanananda Saraswati ने इस परंपरा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। आज जब पूरी दुनिया योग को अपनाकर मानसिक और शारीरिक संतुलन की ओर बढ़ रही है, तब स्वामी सत्यानंद सरस्वती का योगदान और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

