स्वामी विवेकानंद जयंती : उत्सव और आत्ममंथन के बीच आज भी प्रासंगिक हैं स्वामी विवेकानंद

Swami Vivekananda Jayanti Amidst celebration and introspection, Swami Vivekananda remains relevant today.
 
Swami Vivekananda Jayanti Amidst celebration and introspection, Swami Vivekananda remains relevant today.

(प्रवीण कक्कड़ – विनायक फीचर्स) पूरा देश 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाता है। इस अवसर पर स्वामीजी को स्मरण करते हुए वर्तमान पीढ़ी और विशेषकर युवाओं को लेकर अनेक प्रश्न मन में उठते हैं। 1893 के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में जिस तरुण संन्यासी ने भारत की आध्यात्मिक गरिमा को विश्व के हृदय तक पहुँचाया, उनकी स्मृति आज भी हमारी राष्ट्रीय चेतना को गौरवान्वित करती है।

परंतु उत्सव और जयघोष की इस रोशनी के बीच एक गंभीर और आवश्यक प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—क्या हम स्वामी विवेकानंद के विचारों को वास्तव में जी रहे हैं, या केवल उनकी स्मृति का औपचारिक अनुष्ठान कर रहे हैं?
स्वामी विवेकानंद जिन युवाओं को “राष्ट्र का निर्माता” कहते थे, क्या आज का युवा सचमुच निर्माण की दिशा में अग्रसर है, या आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी ऊर्जा का अपव्यय कर रहा है? यह समय केवल नारों का नहीं, बल्कि गहन आत्ममंथन का है—कि क्या हम आने वाली पीढ़ी को सिर्फ ऊँचे सपने दे रहे हैं, या उन सपनों तक पहुँचने का सशक्त मार्ग भी दिखा पा रहे हैं।

क्षमता का नहीं, दिशा का संकट

आज युवा शक्ति का संकट क्षमता का नहीं, बल्कि दिशा का है। आधुनिक युवा के पास शिक्षा, तकनीक और अवसरों की कोई कमी नहीं है, किंतु दृष्टि का अभाव सबसे कमजोर कड़ी बन गया है। स्वामी विवेकानंद ने भीतर निहित शक्तियों को जगाने का आह्वान किया था, लेकिन आज वही शक्ति सोशल मीडिया की आभासी चमक, क्षणिक आकर्षण और उपभोक्तावादी दौड़ में कहीं खोती जा रही है।
विडंबना यह है कि जिस पीढ़ी के पास उँगलियों पर पूरी दुनिया का ज्ञान उपलब्ध है, वही पीढ़ी अपने भीतर के खालीपन को नशे, देर रात की पार्टियों और अनुशासनहीन जीवनशैली से भरने का प्रयास कर रही है। जिसे वह आधुनिकता समझ रही है, वह वस्तुतः प्रगति नहीं, बल्कि संस्कारों से कटकर लक्ष्यहीन भीड़ का हिस्सा बन जाना है। यही वह मानसिक दरिद्रता है, जिसे स्वामी विवेकानंद ने सांस्कृतिक पतन की संज्ञा दी थी।

हमारी सामूहिक विफलता

यह दोष केवल युवाओं का नहीं है। हमारी शिक्षा व्यवस्था, परिवार और समाज—तीनों की यह सामूहिक विफलता है। हमने युवाओं को ‘सफल’ होने की कला तो सिखाई, पर ‘सार्थक’ होने का विज्ञान नहीं सिखाया। हमने उन्हें प्रतिस्पर्धा की दौड़ में धकेला, लेकिन गिरकर फिर उठने का आत्मबल नहीं दिया।

स्वामी विवेकानंद ने युवाओं के लिए तीन

आधारभूत स्तंभ बताए थे—शक्ति, आत्मविश्वास और चरित्र। आज हमारे पास भौतिक संसाधन हैं, लेकिन मानसिक दुर्बलता बढ़ रही है। हाथों में डिग्रियाँ हैं, पर चरित्र निर्माण की पाठशालाएँ सूनी पड़ी हैं। प्रश्न यह भी है कि क्या हम केवल उपदेश दे रहे हैं, या अपने आचरण से युवाओं को प्रेरित भी कर रहे हैं? समाज को यह समझना होगा कि युवा केवल सलाह से नहीं, बल्कि सशक्त आदर्शों को देखकर बदलते हैं।
‘उठो, जागो’ आज और अधिक प्रासंगिक
स्वामी विवेकानंद का मंत्र ‘उठो, जागो’ आज इसलिए और अधिक प्रासंगिक है क्योंकि आज की नींद आँखों की नहीं, चेतना की है। उन्होंने भारतीय संस्कृति को ‘पुरातन’ नहीं, बल्कि ‘अनंत और आधुनिक’ बताया—एक ऐसी संस्कृति जो समय के साथ स्वयं को परिष्कृत करती है, पर अपने मूल मूल्यों से विचलित नहीं होती।
आज जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीकी क्रांति के युग में प्रवेश कर चुके हैं, तब यह समझना आवश्यक है कि तकनीक केवल एक साधन है, समाधान नहीं। समाधान तो मानवीय मूल्यों और सुदृढ़ चरित्र में निहित है। यदि युवा अपनी ऊर्जा रचनात्मकता के बजाय व्यर्थ विवादों, गलत आदतों और दिखावटी आधुनिकता में नष्ट करेंगे, तो हमारा ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ शीघ्र ही ‘जनसांख्यिकीय संकट’ में बदल सकता है।

संवाद की आवश्यकता

राष्ट्रीय युवा दिवस केवल उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्र के पुनरुद्धार का दायित्व है। युवाओं को आज कठोर आदेशों की नहीं, बल्कि संवाद की आवश्यकता है। उन्हें नियमों की बेड़ियों की नहीं, बल्कि सही दिशा चाहिए। उन्हें यह समझाना होगा कि अनुशासन कोई बंधन नहीं, बल्कि स्वयं पर विजय प्राप्त कर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने का साधन है। भारत तभी ‘विश्वगुरु’ बन सकेगा, जब उसका युवा डिजिटल स्क्रीन के मोहपाश से बाहर निकलकर धरातल की चुनौतियों से टकराएगा और अपने चरित्र की शुचिता से समाज को आलोकित करेगा।
अंततः यह प्रश्न हम सभी के लिए है—क्या हम अपने युवाओं को केवल एक बाज़ार दे रहे हैं, या एक संस्कारित राष्ट्र? क्या हम उन्हें सिर्फ सपनों के पंख दे रहे हैं, या उन तूफानों से जूझने का साहस भी, जिनसे टकराकर महापुरुष जन्म लेते हैं? युवा केवल भविष्य नहीं, वर्तमान की जीवंत शक्ति हैं। और जब यह शक्ति संयम, चरित्र और कर्तव्य से जुड़ती है, तभी इतिहास के नए अध्याय लिखे जाते हैं।

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