चाय का जाति प्रमाणपत्र
(सुधाकर आशावादी — विनायक फीचर्स)
चाय मेरी सबसे बड़ी कमजोरी रही है। मुझे कितनी भी जल्दी क्यों न हो, अगर कोई कह दे—“भाई साहब, चाय पीकर जाइए”, तो समझिए वहीं बैठना मेरी मजबूरी नहीं, बल्कि खुशी बन जाता है। स्कूल के दिनों से लेकर कॉलेज तक चाय की कुछ दुकानें मेरी पसंदीदा जगह हुआ करती थीं। घर से बाहर निकला नहीं कि किसी चाय की टपरी पर बैठकर कड़क चाय की एक प्याली लेना जैसे जरूरी रस्म थी।
चाय वाले भी अपने नियमित ग्राहकों की पसंद पहचानते थे। कचहरी के पास चाय की दुकान चलाने वाला दुकानदार अपने लड़के से अक्सर कहता था—“इनकी चाय में उबाल थोड़ा ज्यादा लगाना।” उस समय कागज के कपों का जमाना नहीं आया था। चीनी मिट्टी के कप या कांच के गिलास ही चाय के आम बर्तन हुआ करते थे।
लेकिन मजे की बात यह थी कि तब चाय के गिलास में ग्राहक की जाति नहीं लिखी होती थी। न दुकानदार ग्राहक का चेहरा देखकर उसकी जाति पढ़ने की कोशिश करता था और न ग्राहक दुकानदार के चेहरे पर उसकी जाति तलाशता था। चाय पीने वाला कौन है, किस धर्म का है, किस जाति का है, महिला है या पुरुष—चाय की प्याली के सामने ये सारे सवाल बेमानी थे।
कुल्हड़ वाली चाय भी कभी-कभार ही नसीब होती थी। रेलवे में यात्रा करते समय कभी कुल्हड़ में चाय मिल जाती थी, लेकिन चाय बेचने वाले की इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि वह यात्री से पहले जाति पूछे और फिर चाय का गिलास तय करे। चाय का एक ही धर्म था—गरम होना और पीने वाले को पसंद आना।
समय बदला और हम आधुनिक हो गए।
अब सार्वजनिक साहित्यिक और सामाजिक आयोजनों से लेकर विवाह समारोहों और यहां तक कि शोकसभाओं में भी कांच के गिलास और कुल्हड़ कम ही नजर आते हैं। भीड़ का अनुमान लगाकर एक बड़े जार में चाय भरकर रख दी जाती है और लोग कागज के कप लेकर अपनी सुविधा के हिसाब से चाय निकालते हैं।
चाय की गुणवत्ता के हिसाब से कीमत जरूर अलग-अलग हुआ करती थी। कहीं जनता चाय, कहीं स्पेशल चाय, कहीं मलाई मारका चाय। कहीं दूध ज्यादा, कहीं पानी ज्यादा और कहीं चीनी इतनी कि चाय कम, शरबत ज्यादा लगे। लेकिन चाय परोसने में कोई जातिगत भेदभाव नहीं था।
मुझे तो कभी यह महसूस नहीं हुआ कि कांच के गिलास में मिलने वाली चाय और कागज के कप में मिलने वाली चाय का स्वाद अलग होता है। हां, कुल्हड़ की चाय जरूर कुछ अलग होती है। मिट्टी की सौंधी खुशबू उसमें ऐसा स्वाद घोल देती है कि साधारण चाय भी खास लगने लगती है। हालांकि कुल्हड़ चाय को ज्यादा देर तक गर्म रखने में कांच के गिलास जितना सक्षम नहीं होता।
वैसे चाय पर भी लोगों की अपनी-अपनी कल्पनाएं हैं। एक कवि महोदय तो कुल्हड़ वाली चाय को पतिव्रता बता चुके हैं और कांच के गिलास वाली चाय को बेहया—क्योंकि वह किसी के भी होंठों को छूती रहती है। अब कविता है, सो कवि की कल्पना पर कौन पहरा लगाए!
लेकिन आजकल चाय को लेकर एक नया शोध सामने आया है। एक सज्जन, जो स्वयं को राष्ट्र का मुखिया बनने का प्रबल दावेदार मानते हैं, इन दिनों चाय के बारे में नए-नए निष्कर्ष सामने रख रहे हैं।
कुल्हड़ की चाय पर उन्होंने अभी कोई जातिगत शोध नहीं किया है, लेकिन कांच के गिलास वाली चाय को “सवर्ण चाय” और कागज के कप वाली चाय को “दलित चाय” की संज्ञा देने का विचार जरूर सामने आया है।
अब मैं सोच में हूं।
बरसों से जिस चाय वाले की जाति तक मैंने नहीं पूछी, वह मुझे और मेरे साथियों को एक ही तरह के कांच के गिलास में चाय पिलाता रहा। रेलवे में यात्रा करते हुए मैंने न जाने कितनी बार कांच के गिलास में चाय पी। आज बड़े रेस्तरां में कागज के कप में चाय पीता हूं।
तो आखिर मेरी जाति चाय के गिलास से कैसे तय होगी?
क्या गिलास बदलते ही चाय पीने वाले की जाति भी बदल जाती है? क्या कांच का गिलास हाथ में आते ही कोई सवर्ण हो जाता है और कागज का कप पकड़ते ही दलित?
अगर ऐसा है तो चाय पीने से पहले जाति प्रमाणपत्र साथ रखना पड़ेगा। दुकानदार को पहले प्रमाणपत्र दिखाइए, फिर वह तय करेगा कि आपको कौन-सा कप देना है!
यह सोचकर डर लगता है कि कहीं कल को चाय की दुकानों पर बोर्ड न लग जाएं—
“सवर्ण चाय इधर, दलित चाय उधर।”
फिर चाय की दुकान चाय की दुकान नहीं रहेगी, समाजशास्त्र की प्रयोगशाला बन जाएगी।
चाय तो वह पेय है जिसने बरसों से लोगों को एक मेज पर बैठाया है। चाय की प्याली के सामने अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, महिला-पुरुष और अलग-अलग जाति-धर्म के लोग एक साथ बैठते रहे हैं। चाय ने कभी किसी से उसका परिचय पत्र नहीं मांगा।
अब अगर चाय के गिलास में भी जाति तलाशने लगे तो समझना चाहिए कि समस्या चाय में नहीं, हमारी सोच में है।
चाय का स्वाद कांच, कागज या मिट्टी से थोड़ा बदल सकता है, लेकिन इंसान की जाति किसी गिलास से तय नहीं हो सकती।
डर बस इतना है कि कहीं आने वाले दिनों में चाय की चुस्की लेने से पहले हमें यह न पूछना पड़े—
“भाई साहब, चाय तो पी लूं, लेकिन यह किस जाति की है?”
और अगर जवाब मिला—“पहले अपना जाति प्रमाणपत्र दिखाइए”, तो समझ लीजिए कि हमने चाय को भी राजनीति की प्याली में डालकर उसका स्वाद बिगाड़ दिया है।
