विभाजन की पीड़ा और संसद की मर्यादा पर सवाल

तार-तार मर्यादा बोली—क्या टंच है,
आंख मारने तक भी शर्म नहीं रंच है।
सांसदों के हाथों में टेडीबियर, बंदर के,
संसद है या कोई नौटंकी-मंच है।
संसद-गरिमा से गद्दारी,
सत्ता-लोलुपता बलिहारी।
टेडीबियर थामे बंदर का,
बाल-बुद्धि लग रहा मदारी।
इसके आगे कहना शायद मेरे कवि की मर्यादा के भी विरुद्ध होगा।विभाजन की त्रासदी भारत के इतिहास का वह अध्याय है, जिसकी पीड़ा आज भी करोड़ों लोगों की स्मृतियों में जीवित है। 14 अगस्त 1947 की रात स्वतंत्रता के साथ देश के विभाजन ने ऐसी मानवीय त्रासदी को जन्म दिया, जिसे इतिहास कभी भुला नहीं सकता। इसी कारण 14 अगस्त को भारत में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में याद किया जाता है।
इसी पीड़ा और राजनीतिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश को शब्द देते हुए— ओ संसद के मरभुक्खों, तुमने ही भारत को तोड़ा है,
आजादी क्या—भूगोल राष्ट्र का अंधकार में छोड़ा है।
दायें-बायें कंधों पर खींच लकीर, हाथ दोनों काटे,
दुश्मन के तलवे चाट-चाट मां के भाल को झिंझोड़ा है।
इतिहास तुम्हारे नाम थूके—लानत ऐसी खादी पर,
लावारिस बीस लाख लाशें भारती भुला कब पाएगी?
जब तक मतदाता से कटकर तुम सुख-सुविधाओं के पीछे,
तब तक विद्रोही वाणी केवल गीत क्रांति के गाएगी।
गांधी के बंदर, राजघाट के पंडों, कान खोल सुन लो,
दिन दूर नहीं—वह जब जनता संसद तक चढ़कर आएगी।
यौवन के उर में आक्रोश का ज्वार कभी यदि उमड़ा तो,
कुर्सी की लालच—‘राम नाम है सत्य’ यही दोहराएगी।
फिर कोठी, एसी, कार और लालसा तुम्हारी सत्ता की,
संसद से खींच-खींच तुमको फिर सड़कों पर दौड़ाएगी।
जब तक मतदाता से कटकर तुम सुख-सुविधाओं के पीछे,
तब तक विद्रोही वाणी केवल गीत क्रांति के गाएगी।
यह कविता सत्ता में बैठे लोगों के साथ-साथ लोकतंत्र की उस मूल भावना की भी याद दिलाती है कि संसद की गरिमा, जनता का विश्वास और राष्ट्र की एकता किसी भी राजनीतिक दल या व्यक्ति से ऊपर हैं।
