नए दौर की पाठशालाओं में सियासत की वर्णमाला

The alphabet of politics in the schools of the new era
 
कभी किसी ने अपने राजनीतिक दल के नेताओं को पाठ्यक्रम में शामिल कर दि

(सुधाकर आशावादी – विभूति फीचर्स)

"पी फॉर पॉलिटिक्स" – जब यह बच्चों की किताब में जगह बना ले, तो समझिए शिक्षा का मैदान भी सियासत से अछूता नहीं रहा। कभी किसी ने अपने राजनीतिक दल के नेताओं को पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया, तो किसी ने मजहबी रंग भरने की कोशिश की। तर्क दिया गया—यह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। नतीजा यह कि सियासी आकाओं की चापलूसी और समर्थकों की खुशी दोनों एक ही साथ पूरी हो गईं।

पहले तक प्राथमिक शिक्षा की किताबों में बच्चों को "अ से अनार, आ से आम, इ से इमली" जैसे सरल उदाहरणों से अक्षरों की पहचान कराई जाती थी। अंग्रेजी में भी "A for Apple, B for Boy, C for Cat" जैसी परंपरा वर्षों तक कायम रही। लेकिन आधुनिक राजनीति ने तो बच्चों की वर्णमाला को भी अपनी चपेट में ले लिया। अब "अ" से अनार की जगह किसी राजनीतिक दल के मुखिया का नाम बताया जाता है और "डी" से डॉग की जगह दल की बहू का परिचय।

महंगाई के इस दौर में भले ही अनार बच्चों की थाली से गायब हो गया हो, लेकिन यह सवाल भी उठता है कि क्या बच्चे नेताओं के नाम से ज्यादा समझदार हो जाएंगे? शायद इस पर सिखाने वालों को कोई चिंता नहीं।

आज स्थिति यह है कि अंग्रेजी की किताबों में भी नए प्रयोग हो रहे हैं—"A for Apple" के साथ "A for अमुक नेता", "R for Regional Party" और "Y for Yogi"। इसका तर्क यह दिया जा रहा है कि बच्चों की राजनीतिक समझ बढ़ेगी और उन्हें बचपन से ही दलों की पहचान हो जाएगी।

कुछ लोग मानते हैं कि शिक्षा में प्रयोग जरूरी हैं, पुराने संदर्भों को ढोते रहना भी उचित नहीं। लेकिन यह प्रयोग किस दिशा में ले जाएंगे? यह बड़ा सवाल है। आगे चलकर शायद हमें ऐसी "सियासी पाठशालाएं" देखने को मिलें, जहां बच्चों को पढ़ाया जाए—

  • A for अल्पसंख्यक, B for बौद्ध, C for क्रिश्चियन, J for जैन, M for मुस्लिम, P for पारसी

  • B for भारतीय जनता पार्टी, C for कांग्रेस, T for तृणमूल कांग्रेस, S for शिवसेना

यह भी मुमकिन है कि आगे चलकर राजनीतिक दल अपनी-अपनी "विशेष पाठशालाएं" खोलें और अपने-अपने पाठ्यक्रम तय करें। आखिर प्रचार के इस दौर में अपनी विचारधारा थोपने का आसान तरीका और क्या हो सकता है?

संक्षेप में कहें तो शिक्षा का मूल उद्देश्य—बच्चों को सरलता से ज्ञान देना—अब धीरे-धीरे राजनीति के रंग में रंगता जा रहा है। आने वाले समय में यह शिक्षा को समृद्ध करेगा या भ्रमित, इसका जवाब भविष्य ही देगा।

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