विदिशा का अद्भुत राधारानी मंदिर

जहां वर्ष में केवल एक दिन खुलते हैं द्वार
 
शहर के नंदवाना मोहल्ले की संकरी गलियों में स्थित यह मंदिर हर वर्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को ही दर्शनार्थियों के लिए खुलता है। इस विशेष अवसर पर यहां वैष्णव परंपरा के अनुसार भव्य पूजा-अर्चना और सेवा संपन्न होती है। रात्रि में शयन आरती के बाद मंदिर पुनः बंद हो जाता है और अगले वर्ष तक केवल पुजारी परिवार ही बगल के एक छोटे द्वार से प्रवेश कर गुप्त रूप से सेवा करता है।   ---  राधारानी के विदिशा आने की कथा  इतिहास बताता है कि औरंगजेब ने 9 अप्रैल 1669 को मंदिर तोड़ने का फरमान जारी किया था। उसी आदेश के बाद मथुरा और गोकुल के कई मंदिरों पर आक्रमण हुए। गोकुल स्थित राधा रंगी राय मंदिर पर सात बार हमला हुआ। तब वहां के पुजारी राधारानी के विग्रह को टोकरी में रखकर सुरक्षित स्थान की तलाश में निकल पड़े। उनके साथ अन्य प्रतिमाएं भी थीं। वर्षों तक वे जंगलों और अनजान स्थलों में भटकते रहे और लगभग 20 साल बाद विदिशा पहुंचे।  उस समय यहां किले और लोहांगी की पहाड़ियों के बीच घना जंगल था। चूंकि किले के भीतर मुस्लिम बस्तियां बसी थीं, इसलिए पुजारियों ने राधारानी की सेवा-पूजा गुप्त रूप से आरंभ की। धीरे-धीरे जब परिस्थिति अनुकूल हुई तो यह परंपरा शुरू हुई कि हर वर्ष केवल राधाष्टमी पर ही मंदिर के पट भक्तों के लिए खोले जाएं।  यही कारण है कि आज भी इस क्षेत्र को नंदवाना कहा जाता है।   ---  विशेषताएं  अष्टधातु की प्रतिमा: मंदिर में राधारानी की नौ इंच ऊंची प्राचीन प्रतिमा विराजमान है। उनके साथ राधावल्लभ जी तथा सखियां – ललिता, विशाखा, चित्रा, चंपक और लता भी स्थापित हैं।  चांदी का झूला: वर्तमान समय में राधारानी 28 किलो वजनी चांदी के झूले पर विराजित होती हैं। कुल 65 किलो चांदी से उनका पालना, झूला और विमान निर्मित किया गया है।  देश-विदेश से श्रद्धालु: जो प्रतिमा कभी गुप्त रूप से पूजी जाती थी, आज उसी के दर्शन हेतु न केवल भारत बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु विदिशा पहुंचते हैं।    ---  मेरी स्मृति और वर्तमान  लेखक का व्यक्तिगत अनुभव भी इस मंदिर से जुड़ा है। बचपन में स्व. श्री दिनेश चंद्र वर्मा (पिता) के साथ यहां राधारानी सरकार की दंडवत की थी। आज मंदिर में दर्शनार्थियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। देश के अनेक वरिष्ठ नेता, जिनमें केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती भी शामिल हैं, यहां दर्शन कर चुके हैं।
(पवन वर्मा – विनायक फीचर्स)
विदिशा भारत की उन प्राचीन नगरियों में से है जिसका उल्लेख अनेक धार्मिक और ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलता है। कभी यह नगर रघुकुल नायक शत्रुघ्न के पुत्र शत्रुघाती की राजधानी रहा। गौतम बुद्ध के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा का भी इस भूमि से गहरा जुड़ाव रहा है। सम्राट अशोक की ससुराल होने के कारण भी विदिशा ने विश्व इतिहास में विशेष पहचान बनाई। इस नगरी के हर कोने में इतिहास की कोई न कोई अनकही दास्तान छिपी है। इन्हीं कहानियों का एक भावुक अध्याय है विदिशा के बीचोंबीच स्थित राधारानी मंदिर, जिसके कपाट वर्षभर में केवल राधाष्टमी के दिन ही आम भक्तों के लिए खुलते हैं।

शहर के नंदवाना मोहल्ले की संकरी गलियों में स्थित यह मंदिर हर वर्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को ही दर्शनार्थियों के लिए खुलता है। इस विशेष अवसर पर यहां वैष्णव परंपरा के अनुसार भव्य पूजा-अर्चना और सेवा संपन्न होती है। रात्रि में शयन आरती के बाद मंदिर पुनः बंद हो जाता है और अगले वर्ष तक केवल पुजारी परिवार ही बगल के एक छोटे द्वार से प्रवेश कर गुप्त रूप से सेवा करता है।

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राधारानी के विदिशा आने की कथा

इतिहास बताता है कि औरंगजेब ने 9 अप्रैल 1669 को मंदिर तोड़ने का फरमान जारी किया था। उसी आदेश के बाद मथुरा और गोकुल के कई मंदिरों पर आक्रमण हुए। गोकुल स्थित राधा रंगी राय मंदिर पर सात बार हमला हुआ। तब वहां के पुजारी राधारानी के विग्रह को टोकरी में रखकर सुरक्षित स्थान की तलाश में निकल पड़े। उनके साथ अन्य प्रतिमाएं भी थीं। वर्षों तक वे जंगलों और अनजान स्थलों में भटकते रहे और लगभग 20 साल बाद विदिशा पहुंचे।
उस समय यहां किले और लोहांगी की पहाड़ियों के बीच घना जंगल था। चूंकि किले के भीतर मुस्लिम बस्तियां बसी थीं, इसलिए पुजारियों ने राधारानी की सेवा-पूजा गुप्त रूप से आरंभ की। धीरे-धीरे जब परिस्थिति अनुकूल हुई तो यह परंपरा शुरू हुई कि हर वर्ष केवल राधाष्टमी पर ही मंदिर के पट भक्तों के लिए खोले जाएं।

यही कारण है कि आज भी इस क्षेत्र को नंदवाना कहा जाता है।

विशेषताएं

अष्टधातु की प्रतिमा: मंदिर में राधारानी की नौ इंच ऊंची प्राचीन प्रतिमा विराजमान है। उनके साथ राधावल्लभ जी तथा सखियां – ललिता, विशाखा, चित्रा, चंपक और लता भी स्थापित हैं।
चांदी का झूला: वर्तमान समय में राधारानी 28 किलो वजनी चांदी के झूले पर विराजित होती हैं। कुल 65 किलो चांदी से उनका पालना, झूला और विमान निर्मित किया गया है।
देश-विदेश से श्रद्धालु: जो प्रतिमा कभी गुप्त रूप से पूजी जाती थी, आज उसी के दर्शन हेतु न केवल भारत बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु विदिशा पहुंचते हैं।

मेरी स्मृति और वर्तमान

लेखक का व्यक्तिगत अनुभव भी इस मंदिर से जुड़ा है। बचपन में स्व. श्री दिनेश चंद्र वर्मा (पिता) के साथ यहां राधारानी सरकार की दंडवत की थी। आज मंदिर में दर्शनार्थियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। देश के अनेक वरिष्ठ नेता, जिनमें केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती भी शामिल हैं, यहां दर्शन कर चुके हैं।

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