महर्षि अगस्त्य और दिव्य आभूषण की अद्भुत कथा

The amazing story of Maharishi Agastya and the divine ornament.
 
महर्षि अगस्त्य और दिव्य आभूषण की अद्भुत कथा

श्रीरघुनंदन राम एक बार महर्षि अगस्त्य के आश्रम में पधारे। शम्बूक वध का समाचार सुनकर महर्षि अत्यंत प्रसन्न हुए। अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्होंने विश्वकर्मा द्वारा प्रदत्त एक दिव्य आभूषण भगवान श्रीराम को अर्पित किया। वह आभूषण सूर्य के समान तेजस्वी, अलौकिक, विचित्र और अद्भुत था।

उस आभूषण को देखकर श्रीराम के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने विनम्रतापूर्वक पूछा— “मुनिवर! यह दिव्य आभूषण आपके पास कैसे आया? जब यह इतना विलक्षण है, तो निश्चय ही इसकी कथा भी अत्यंत रोचक होगी। इसे जानने की मेरे मन में प्रबल इच्छा है।”

भगवान श्रीराम की जिज्ञासा शांत करने के लिए महर्षि अगस्त्य ने कथा प्रारंभ की—

प्राचीन काल में एक अत्यंत विस्तृत वन था, जो चारों ओर सौ योजन तक फैला हुआ था। उस वन में कोई जीव-जंतु, पशु या पक्षी नहीं रहता था। वहीं एक मनोहर सरोवर स्थित था। उस स्थान की पूर्ण एकांतता देखकर मैं वहाँ तपस्या के उद्देश्य से गया। सरोवर के चारों ओर भ्रमण करते समय मुझे एक अत्यंत प्राचीन और विचित्र आश्रम दिखाई दिया, जो पूर्णतः सूना था। मैंने उसी आश्रम में रात्रि विश्राम किया।

प्रातःकाल जब मैं स्नान के लिए सरोवर की ओर गया, तो सरोवर के तट पर एक हृष्ट-पुष्ट, निर्मल शव पड़ा हुआ दिखाई दिया। यह दृश्य अत्यंत आश्चर्यजनक था। मैं वहीं बैठकर उसके विषय में विचार करने लगा।

कुछ समय पश्चात आकाश से एक दिव्य विमान उतरा। उस पर एक तेजस्वी देवपुरुष विराजमान था, जिसके चारों ओर सुंदर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित अनेक अप्सराएँ थीं। उनमें से कुछ चंवर डुला रही थीं। तभी वह देवपुरुष विमान से उतरकर उस शव के समीप आया और मेरी आँखों के सामने उस शव को भक्षण कर लिया। इसके बाद वह सरोवर में जाकर हाथ-मुख धोने लगा।

जब वह पुनः विमान पर चढ़ने लगा, तो मैंने उसे रोककर कहा—
“हे तेजस्वी पुरुष! आपका यह देवोमय स्वरूप और ऐसा घृणित आहार—यह रहस्य क्या है? मेरे विचार से आपको ऐसा कर्म नहीं करना चाहिए था।”

मेरी बात सुनकर वह देवपुरुष बोला—
“मुनिवर! मेरे पिता विदर्भ देश के पराक्रमी राजा थे, जिनका नाम सुदेव था। उनकी दो पत्नियाँ थीं, जिनसे दो पुत्र उत्पन्न हुए—श्वेत और सुरथ। मैं श्वेत हूँ। पिता की मृत्यु के पश्चात मैंने धर्मपूर्वक राज्य किया। एक दिन मुझे अपनी मृत्यु का ज्ञान हो गया। मैंने राज्य अपने भाई सुरथ को सौंप दिया और इस वन में तपस्या करने आ गया।

दीर्घकालीन तपस्या के फलस्वरूप मुझे ब्रह्मलोक की प्राप्ति हुई, किंतु मैं अपनी भूख-प्यास पर विजय नहीं पा सका। जब मैंने ब्रह्माजी से इसका कारण पूछा, तो उन्होंने कहा—
‘तुम मृत्युलोक में जाकर अपने ही शरीर का भोजन किया करो। यही तुम्हारा प्रायश्चित है, क्योंकि जीवन में तुमने कभी किसी को दान नहीं दिया, केवल अपने शरीर का ही पोषण किया। तुम्हें ब्रह्मलोक केवल तपस्या के बल पर प्राप्त हुआ है। जब महर्षि अगस्त्य इस वन में पधारेंगे, तभी तुम्हें इस पीड़ा से मुक्ति मिलेगी।’”

देवपुरुष ने आगे कहा—
“अब आप स्वयं यहाँ आ गए हैं। कृपया मेरा उद्धार करें। इसके प्रतिदान स्वरूप यह दिव्य आभूषण स्वीकार करें। यह आभूषण दिव्य वस्त्र, स्वर्ण, धन और समृद्धि प्रदान करने वाला है। इसके साथ मैं अपनी समस्त कामनाएँ भी आपको समर्पित करता हूँ।”

महर्षि अगस्त्य के आभूषण स्वीकार करते ही राजर्षि श्वेत पूर्णतः तृप्त होकर स्वर्गलोक को प्राप्त हुए, और वह शव वहीं लुप्त हो गया।

महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम से कहा—
“हे रघुनंदन! यह वही दिव्य आभूषण है, जिसे आज मैं आपको समर्पित कर रहा हूँ।”

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