सोशल मीडिया का कड़वा सच: घूँघट की आड़ में पनपता नफरत का 'डिजिटल' षड्यंत्र
लेखक: सुधाकर आशावादी (विभूति फीचर्स)
आज के दौर में तकनीक ने हर हाथ में कैमरा (मोबाइल) थमा दिया है। जहाँ कभी फोटो खिंचवाने के लिए स्टूडियो जाना एक विशेष अनुभव होता था, वहीं आज लाइट, कैमरा और एक्शन की औपचारिकताएं खत्म हो चुकी हैं। लेकिन इस तकनीकी सुगमता के साथ एक खतरनाक प्रवृत्ति ने जन्म लिया है—सोशल मीडिया पर 'पहचान छिपाकर' नफरत फैलाने का खेल।
1. गुमनामी का फायदा और सामाजिक वैमनस्य
लेखक के अनुसार, सोशल मीडिया पर ऐसे अनेक 'घूँघट वाले' चेहरे सक्रिय हैं, जो अपनी पहचान उजागर किए बिना नफरत भरे प्रसंग पोस्ट करते हैं। इन पोस्ट्स का उद्देश्य समाज में सामंजस्य बिगाड़ना होता है। विडंबना यह है कि इन नफरती वीडियो और पोस्ट्स पर समाज के अन्य लोग बिना सोचे-समझे पक्ष-विपक्ष में भिड़ जाते हैं, जिससे नफरत फैलाने वाले का मंसूबा सफल हो जाता है।
2. रातों-रात 'सेलिब्रिटी' बनने की अंधी दौड़
लेखक उन घटनाओं का भी जिक्र करते हैं जो मोबाइल कैमरों की 'कृपा' से वायरल होकर किसी को भी सेलिब्रिटी बना देती हैं:
-
सकारात्मक उदाहरण: 'बाबा का ढाबा' की बिक्री बढ़ना या रानू मंडल का रेलवे प्लेटफॉर्म से मशहूर होना।
-
नकारात्मक पक्ष: ट्रेन की बोगी में सीट के लिए 'वीरांगना' बनकर चप्पल चलाना, जातिगत टिप्पणी करना, या बिना टिकट यात्रा के बावजूद 'हेंकड़ी' दिखाना।
ऐसी हरकतों से लोग पॉपुलर तो हो जाते हैं, लेकिन समाज पर पड़ने वाले इसके नकारात्मक प्रभाव की चिंता किसी को नहीं है।
3. नफरत के लिए समय कहाँ से आता है?
लेख के अंत में लेखक एक बड़ा यक्ष प्रश्न छोड़ते हैं। वे कहते हैं कि जहाँ आम इंसान रोजी-रोटी के गणित में उलझा हुआ है, वहां लोगों के पास नफरत भरे वीडियो देखने, उन पर प्रतिक्रिया देने और नफरत का समर्थन करने का समय कहाँ से आता है?
लेखक की मार्मिक टिप्पणी: "अपुन को तो किसी से प्यार करने की फुर्सत नहीं है, फिर लोग नफरत के लिए समय कैसे निकाल लेते हैं?"

