आस्था की आड़ में 'हवस' का कारोबार, फर्जी बाबाओं और ज्योतिषियों के व्यभिचारी मकड़जाल का काला सच

The business of 'lust' under the guise of faith, the dark truth of the adulterous web of fake babas and astrologers
 
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(लेखक: डॉ. सुधाकर आशावादी - विभूति फीचर्स)

धर्म मूल रूप से एक अनुशासनात्मक जीवन शैली का मार्ग है, जो मनुष्य को नैतिकता और मर्यादा सिखाता है। लेकिन वर्तमान समय में कुछ तथाकथित धर्मगुरुओं और पाखंडी ज्योतिषियों ने धार्मिक अनुष्ठानों को अपनी कुत्सित वासनाओं की पूर्ति का जरिया बना लिया है। मर्यादा के विपरीत उनका आचरण न केवल समाज के पतन का मार्ग प्रशस्त कर रहा है, बल्कि प्राचीन विद्याओं की पवित्रता को भी धूमिल कर रहा है।

पाखंड और ज्योतिष का बदनाम चेहरा

आधुनिक युग में टोने-टोटके और ज्योतिष के नाम पर पाखंडियों का बोलबाला बढ़ा है। महाराष्ट्र के फर्जी ज्योतिषी अशोक कुमार खरात उर्फ 'कैप्टन बाबा' का मामला इसका जीता-जागता उदाहरण है, जिसके 150 से अधिक महिलाओं के साथ देह संबंधों का खुलासा हुआ। यह तो महज एक उदाहरण है; यदि गहराई से जांच की जाए, तो ऐसे ढोंगियों की एक लंबी श्रृंखला सामने आ सकती है जो नारी की मानसिक या पारिवारिक दुर्बलता का लाभ उठाकर उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं।

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से बुना जाता है शोषण का जाल?

ये फर्जी बाबा और ज्योतिषी तंत्र-मंत्र, सम्मोहन और भय का सहारा लेते हैं। अंधविश्वास से ग्रस्त महिलाओं को ग्रहों के दोष या किसी अनहोनी का डर दिखाकर ये अपराधी उनका आर्थिक और दैहिक शोषण करते हैं। ताज्जुब तो तब होता है जब समाज की संभ्रांत, शिक्षित और प्रतिष्ठित महिलाएं भी इन ढोंगियों के चंगुल में फंस जाती हैं। जब तक इन ज्योतिषियों के असली मंसूबों की कलई खुलती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

सियासत और रसूख का संरक्षण

इन पाखंडियों का साम्राज्य केवल अंधविश्वास पर नहीं, बल्कि रसूखदार लोगों के संरक्षण पर भी टिका होता है। अक्सर देखा गया है कि सियासत से जुड़े प्रभावशाली लोग इन तत्वों को बढ़ावा देते हैं, जिससे आम जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता बढ़ जाती है। नारी सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावों के बीच, समाज के ऊपरी तबके की महिलाओं द्वारा ऐसे व्यभिचारियों का अनुसरण करना यह सिद्ध करता है कि अंधविश्वास किसी की भी बुद्धि हर सकता है।

धर्म की सीमा से परे है यह 'गोरखधंधा'

इस प्रकार के व्यभिचारी आचरण को किसी एक धर्म विशेष तक सीमित रखना गलत होगा। लगभग सभी धर्मों में ऐसे मामले यदा-कदा सामने आते रहते हैं, जहाँ धर्म की आड़ में तंत्र विद्या या आध्यात्मिक गुरु होने का ढोंग कर वासना का गंदा खेल खेला जाता है।

कब तक मिलेगी खुली छूट?

आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि धर्म और ज्योतिष की आड़ में चल रहे इस 'गोरखधंधे' को आखिर कब तक खुली छूट मिलती रहेगी? क्या हमारा समाज और प्रशासन इन फर्जी बाबाओं के तिलिस्म को तोड़ने के लिए गंभीर है? जब तक जन-जागरूकता और कड़े कानून का मेल नहीं होगा, तब तक आस्था के नाम पर मासूमों और मजबूरों की आबरू से खिलवाड़ होता रहेगा।

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