आज भी जीवंत है सदियों पुरानी बिहुला-विषहरी की लोकगाथा
शिवशंकर सिंह ‘पारिजात’ | विभूति फीचर्स
भारत की समृद्ध वाचिक परंपरा में लोकगाथाओं का विशेष स्थान है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोककंठ के माध्यम से आगे बढ़ने वाली लोककथाएं, मिथक, कहावतें और लोकविश्वास केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनमें समाज की स्मृतियां, आस्थाएं, संघर्ष और जीवनानुभव भी सुरक्षित रहते हैं। भले ही इन्हें औपचारिक इतिहास का दर्जा न मिला हो, लेकिन इनके भीतर अतीत के अनेक महत्वपूर्ण संकेत छिपे होते हैं।
अंगभूमि की ऐसी ही जीवंत और लोकप्रिय लोकगाथा है बिहुला-विषहरी। भागलपुर, मुंगेर, नवगछिया, सुलतानगंज, बांका तथा झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों में यह परंपरा सदियों से लोकजीवन का हिस्सा बनी हुई है। प्रत्येक वर्ष विषहरी पूजा के अवसर पर इस कथा का पुनर्स्मरण ऐसा वातावरण रचता है, मानो लोकस्मृति में सुरक्षित कोई पुराना संसार फिर से जीवंत हो उठा हो।
चांदो सौदागर और मनसा विषहरी की कथा
लोकगाथा के अनुसार बिहुला-विषहरी की कथा अंग की प्राचीन राजधानी चंपा के शिवभक्त व्यापारी चांदो सौदागर और सर्पों की देवी मनसा विषहरी से जुड़ी है। मनसा को मनसा, विषहर, नित्य और पद्मा जैसे नामों से भी संबोधित किया जाता है।
किंवदंती के अनुसार मनसा भगवान शिव की मानस-पुत्री थीं और पृथ्वी पर अपनी पूजा स्थापित करना चाहती थीं। शिव ने उन्हें अपने परम भक्त चांदो सौदागर से पूजा प्राप्त करने की बात कही। चांदो ने मनसा की पूजा करने से इनकार कर दिया और केवल भगवान शिव को अपना आराध्य माना। इससे देवी क्रोधित हो गईं और उन्होंने चांदो की संपत्ति, व्यापारिक नौकाओं तथा पुत्रों को नष्ट कर दिया।
कथा के अनुसार अंततः चांदो के सबसे छोटे पुत्र बाला लखंदर को भी सर्पदंश से मृत्यु का शाप मिला। पुत्र को बचाने के लिए चांदो ने उजानी गांव की बिहुला से उसका विवाह कराया और विश्वकर्मा से ऐसा सुरक्षित घर बनवाया, जिसमें किसी सर्प के प्रवेश की संभावना न हो। किंतु लोकगाथा में बताया गया है कि मनसा ने उसमें एक सूक्ष्म छेद करवा दिया। इसी रास्ते से मनियार नामक सर्प भीतर पहुंचा और उसने बाला लखंदर को डस लिया।
बिहुला के संघर्ष की अमर गाथा
बाला की मृत्यु के बाद चंपानगरी में शोक छा गया, लेकिन बिहुला ने हार नहीं मानी। वह पति के मृत शरीर को मंजूषानुमा नौका में रखकर गंगा के रास्ते स्वर्गलोक की ओर निकल पड़ी। कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए वह इंद्र के दरबार तक पहुंची।
लोकविश्वास के अनुसार बिहुला के साहस, दृढ़ता और पतिव्रत धर्म से प्रभावित होकर इंद्र ने बाला लखंदर को जीवनदान दिया और चांदो सौदागर की खोई संपत्ति भी वापस कर दी। बिहुला के चंपा लौटने के बाद खुशियां लौट आईं। अंततः उसके आग्रह पर चांदो सौदागर ने मनसा विषहरी की पूजा स्वीकार कर ली। लोकपरंपरा इसी प्रसंग को अंगभूमि में विषहरी पूजा की शुरुआत से जोड़ती है।
पूजा में आज भी दोहराई जाती है लोकगाथा
बिहुला-विषहरी की खासियत यह है कि यह कथा केवल सुनाई नहीं जाती, बल्कि प्रत्येक वर्ष धार्मिक अनुष्ठानों और लोककलाओं के माध्यम से दोहराई जाती है। आषाढ़ के अंतिम दिनों से लेकर श्रावण के शुरुआती पखवाड़े तक विषहरी पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।
मंदिरों में कलश स्थापित कर देवी का आह्वान किया जाता है। इसके बाद भागलपुर और आसपास के विषहरी मंदिरों में झाल-मंजीरों की धुन के बीच बिहुला-विषहरी की पारंपरिक गाथा का गायन शुरू होता है।
भाद्र शुक्ल दशमी के आसपास देवी मनसा विषहरी की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। महिलाएं परिवार की सुख-शांति और आरोग्य की कामना से मंदिरों में डलिया और मंजूषा की प्रतिकृतियां अर्पित करती हैं। रंगीन कागज, शोला, सनाठी और बांस की कमानियों से तैयार मंजूषा इस परंपरा की विशिष्ट पहचान है।
मंजूषा महज पूजा सामग्री नहीं, बल्कि बिहुला की संघर्षपूर्ण यात्रा का प्रतीक भी है। लोकविश्वास में इसे संकट और व्याधियों से मुक्ति की कामना से जोड़ा जाता है।
लोकअनुष्ठानों में जीवंत होती है पूरी कथा
विषहरी पूजा के दौरान बिहुला और बाला के विवाह से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का भी मंचन और पुनरावर्तन किया जाता है। मंडप पूजन, कन्यादान, मंगलगीत और सुहागरात के प्रसंगों से लेकर बाला के सर्पदंश तक की कथा लोकगीतों के माध्यम से जीवंत होती है।
भागलपुर के चंपानगर स्थित प्रमुख मनसा मंदिर परिसर में कथा के पात्रों की मूर्तियों के माध्यम से भी इस लोकगाथा को प्रदर्शित किया जाता है। पूजा के बाद मंजूषाओं और नाग-घटों को जुलूस के रूप में गंगा घाट तक ले जाया जाता है। इसके बाद विसर्जन शोभायात्रा निकलती है, जिसमें बड़ी संख्या में प्रतिमाएं शामिल होती हैं।
इस प्रकार धार्मिक अनुष्ठान के साथ लोकगाथा का वार्षिक पुनरावर्तन भी पूरा होता है।
इतिहास, पुरातत्व और पर्यावरण से जुड़ी परंपरा
बिहुला-विषहरी को केवल धार्मिक मिथक मानकर छोड़ देना इसके व्यापक स्वरूप को सीमित कर देना होगा। विभिन्न विद्वानों ने इसके साहित्यिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, पुरातात्विक और पर्यावरणीय पक्षों पर अध्ययन किया है।
भागलपुर के विक्रमशिला बौद्ध महाविहार की खुदाई से प्राप्त सर्प आकृतियों वाली प्राचीन देवी-मूर्तियां तथा चंपानगरी की पुरातात्विक खुदाई में मिले नाग-नागिन, मातृदेवी और सर्प आकृति वाले अवशेष इस क्षेत्र में सर्प एवं मातृदेवी उपासना की प्राचीन परंपरा की ओर संकेत करते हैं।
इस लोकपरंपरा का पर्यावरण से संबंध भी उल्लेखनीय है। मध्य गंगा घाटी का यह क्षेत्र मानसून के दौरान जल-जमाव, दलदली भूमि और घनी वनस्पति के कारण सर्पों के लिए अनुकूल रहा है। ऐसे वातावरण में सर्पों से सुरक्षा और उनके प्रकोप से मुक्ति की लोककामना से सर्प-देवी की उपासना का विकसित होना स्वाभाविक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया भी हो सकती है।
धार्मिक समन्वय का संदेश
कुछ विद्वान बिहुला-विषहरी की कथा को शैव और शाक्त परंपराओं के बीच संघर्ष तथा अंततः समन्वय के प्रतीक के रूप में भी देखते हैं। चांदो सौदागर शिवभक्त हैं, जबकि मनसा शाक्त परंपरा से जुड़ी देवी हैं। कथा का आरंभ दोनों के विरोध से होता है, लेकिन इसका अंत पूजा की स्वीकृति और समन्वय में होता है।
इस दृष्टि से बिहुला-विषहरी केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक समन्वय का संदेश देने वाली लोकगाथा भी है।
बिहुला—साहस और संकल्प की प्रतीक
इस लोकगाथा का सबसे प्रभावशाली पक्ष बिहुला का चरित्र है। वह केवल पतिव्रता स्त्री के रूप में सामने नहीं आती, बल्कि साहस, संकल्प और संघर्ष की प्रतीक बनकर उभरती है। पति की मृत्यु के बाद वह निराश होकर बैठने के बजाय स्वयं कठिन यात्रा पर निकलती है और देवताओं के समक्ष अपने अधिकार के लिए संघर्ष करती है।
यही कारण है कि लोकस्मृति ने बिहुला को ऐसी नारी के रूप में सुरक्षित रखा है, जो विपरीत परिस्थितियों के सामने झुकती नहीं।
बिहुला-विषहरी इसलिए केवल अतीत की कहानी नहीं है। यह अंगभूमि की सामूहिक स्मृति है, जिसमें धर्म के साथ लोककला, इतिहास के साथ भूगोल, आस्था के साथ पर्यावरण और मिथक के साथ सामाजिक अनुभव जुड़े हुए हैं।
सदियां गुजर गईं, समाज और जीवनशैली बदल गई, लेकिन यह लोकगाथा आज भी जीवित है। जब झाल-मंजीरों की धुन गूंजती है, मंजूषाएं सजती हैं, बिहुला की कथा गाई जाती है और गंगा में विसर्जन होता है, तब अंगभूमि अपने अतीत से संवाद करती है।
बिहुला-विषहरी की यही निरंतरता उसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शक्ति है।
लेखक: बिहार जनसंपर्क विभाग के पूर्व उपनिदेशक एवं इतिहासकार
