आँख मिलाने का चैलेंज: जब बदतमीजी को 'दबंगई' समझ बैठते हैं लोग
(सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)
एक समय था जब नज़रों की नज़रों से बात हो जाती थी और वही बात रिश्तों की बुनियाद बन जाती थी। आँखें सिर्फ देखने का माध्यम नहीं थीं, बल्कि भावनाओं की भाषा हुआ करती थीं। किशोरावस्था से युवावस्था तक प्रेम का पहला संकेत अक्सर आँखों के रास्ते ही पहुंचता था।
लेकिन वक्त बदला, भाव बदले और आँखों का अर्थ भी बदल गया। अब आँखें समझाने के लिए नहीं, डराने के लिए दिखाई जाती हैं। लोग बात-बात पर आँखें तरेरते हैं। उनकी निगाहों में ऐसा आतंक होता है कि सामने वाला आँख मिलाने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता। नतीजा—डरकर किनारा कर लेता है। इस तरह आँखें अब संवाद नहीं, दहशत का प्रतीक बनती जा रही हैं।
लेख का सबसे सशक्त पक्ष यह है कि संवादों के ज़रिये चरित्र की खोखली आत्ममुग्धता, विषय से भटकती बातों और “चैलेंज” संस्कृति को उजागर किया गया है। आँख मिलाने का दावा दरअसल तर्क की कमी, अहंकार और असुरक्षा का प्रतीक बन जाता है।
आजकल तो कुछ लोग बाकायदा “आँख मिलाने का चैलेंज” देने लगे हैं। उनका दावा होता है कि कोई उनकी आँखों में आँख डालकर बात नहीं कर सकता। सच यह है कि सीधी नज़र से, सधे हुए ढंग से बात करने का साहस हर किसी में नहीं होता।

मेरे एक परिचित ऐसे ही हैं। उन्हें अपनी आँखों की दबंगई पर उतना ही भरोसा है, जितना अपनी समझदारी पर नहीं। उनसे पूरब का सवाल पूछो तो जवाब पश्चिम का मिलेगा। अर्थव्यवस्था पर चर्चा छेड़ो तो जूडो-कराटे की ट्रेनिंग का किस्सा शुरू हो जाएगा।
उन्हें हर हाल में चर्चा में रहना पसंद है। कभी प्रचार के लिए तालाब की कीचड़ में छलांग लगा देते हैं, तो कभी सभ्य लोगों की बैठक में आँख दबाकर ‘संदेश’ दे जाते हैं। उनकी आँखें भी बोलती हैं और ज़ुबान भी, मगर न विषय से मेल खाती हैं, न मर्यादा से।
एक दिन बड़े गर्व से बोले—
“कोई मेरी आँखों में आँख डालकर बात नहीं कर सकता।”
मैंने सहजता से पूछा—
“ऐसा क्यों?”
बोले—
“क्योंकि मैं इतना सच्चा हूँ कि झूठ मेरे सामने टिक ही नहीं सकता।”
मैंने मुस्कराते हुए कहा—
“हो सकता है आपकी आँख में कोई संक्रमण हो, इसलिए लोग आँख मिलाने से बचते हों।”
यह सुनते ही वे तिलमिला गए—
“नहीं! लोग मुझसे डरते हैं, इसलिए आँख नहीं मिला पाते।”
मैंने कहा—
“अगर संक्रमण का डर नहीं, तो शायद कोई और वजह हो।”
वे बोले—
“मुझे पता है, लोग मुझसे भी डरते हैं और मेरी बातों से भी।”
मैंने बात आगे बढ़ाई—
“ऐसा भी हो सकता है कि लोग आपसे नहीं, आपकी हरकतों से डरते हों।”
उन्होंने चौंककर पूछा—
“मतलब?”
मैंने साफ कहा—
“संभव है लोग यह सोचकर आपसे बहस न करते हों कि आपके मुँह लगकर अपना समय क्यों बर्बाद करें।”
यह सुनते ही वे और उखड़ गए—
“मैं किसी से नहीं डरता। मैंने जूडो-कराटे सीखा है, मुझे ग्रिप बनानी आती है।”
मैंने कहा—
“यही तो समस्या है। आपसे कुछ पूछा जाता है, आप जवाब कुछ और ही देते हैं।”
वह बोले—
“यही मेरी खासियत है।”
मैंने शांत स्वर में कहा—
“यह खासियत नहीं है। आपकी ऐसी हरकतों से कोई आपको नासमझ समझता है, तो कोई सनकी।”
अब वे पूरी तरह आवेश में आ गए—
“कोई कुछ भी समझे, मैं किसी से नहीं डरता। मुखिया से भी नहीं। मैं उसे चैलेंज करता हूँ—हिम्मत हो तो मुझसे आँख में आँख डालकर बहस करे।”
मैंने निष्कर्ष देते हुए कहा—
“तुम्हारा सचमुच कुछ नहीं हो सकता, क्योंकि तुम्हारे सामने कोई टिक ही नहीं सकता।”
वह मुस्कराए—
“मैं भी तो यही कह रहा हूँ। अच्छा… टाटा… बाय-बाय… फिनिश।”
