एथेनॉल की जल्दबाजी और शक्कर की बढ़ती कीमत का संबंध
(भूपेंद्र गुप्ता – विभूति फीचर्स)
पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति के पीछे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाना, विदेशी मुद्रा की बचत करना और किसानों के लिए गन्ने का अतिरिक्त बाजार तैयार करना जैसे महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं। इन उद्देश्यों की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन किसी भी सार्वजनिक नीति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसका निर्धारित लक्ष्य कितनी जल्दी हासिल हुआ। असली कसौटी यह है कि उस लक्ष्य को प्राप्त करने के दौरान उपभोक्ता हित, किसान, खाद्य सुरक्षा और तकनीकी तैयारी के बीच कितना संतुलन कायम रहा।
2018 की राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति में पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य वर्ष 2030 रखा गया था। हालांकि, सरकार ने 2022 में इस लक्ष्य को पांच साल पहले, यानी 2025-26 तक हासिल करने का फैसला किया। सरकार के अनुसार भारत ने 2025 में ही 20 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल कर लिया। यहीं से एक महत्वपूर्ण नीतिगत सवाल उठता है—क्या किसी लक्ष्य को तय समय से पहले हासिल कर लेना हर परिस्थिति में सफलता का प्रमाण माना जा सकता है?
धीरे-धीरे बढ़ी थी एथेनॉल ब्लेंडिंग
2013-14 में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण करीब 1.53 प्रतिशत था। 2019-20 तक यह लगभग 5 प्रतिशत और 2020-21 में 8.17 प्रतिशत तक पहुंचा। उस समय 20 प्रतिशत ब्लेंडिंग का लक्ष्य 2030 के लिए निर्धारित था।
यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि उस समय की सरकार ने इंजन की सुरक्षा के कारण 1.5 प्रतिशत ब्लेंडिंग को कोई स्थायी सीमा बना दिया था। उस दौर में एथेनॉल ब्लेंडिंग को उपलब्धता और उत्पादन क्षमता के अनुरूप धीरे-धीरे बढ़ाने का रास्ता अपनाया गया था। यही क्रमिकता आज की नीति के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करती है।
आज सवाल यह है कि ब्लेंडिंग को जिस तेजी से बढ़ाया गया, क्या उसके साथ इससे जुड़ी खाद्य, तकनीकी और उपभोक्ता संबंधी चुनौतियों पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार हुआ?
पहली चुनौती : चीनी की उपलब्धता और महंगाई
गन्ना एक सीमित कृषि संसाधन है। इसी गन्ने से चीनी भी बनती है और एथेनॉल भी। सरकार ने 2024-25 में एथेनॉल उत्पादन के लिए 40 लाख टन तक चीनी के डायवर्जन की अनुमति दी थी। इसके अतिरिक्त एथेनॉल उत्पादन के लिए अतिरिक्त एफसीआई चावल भी उपलब्ध कराया गया।
सामान्य परिस्थितियों में अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल में बदलना चीनी मिलों और किसानों दोनों के लिए फायदेमंद हो सकता है। इससे मिलों को अतिरिक्त आय मिलती है और गन्ना किसानों के भुगतान में भी मदद मिल सकती है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब गन्ने का उत्पादन अपेक्षा से कम हो, चीनी उत्पादन घट जाए और घरेलू मांग बढ़ जाए। ऐसी स्थिति में खाद्य चीनी और ईंधन के लिए एथेनॉल के बीच संसाधनों को लेकर प्रतिस्पर्धा पैदा हो सकती है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि एथेनॉल के लिए चीनी का उपयोग करना हमेशा गलत है। असली सवाल यह है कि घरेलू खाद्य जरूरतों के लिए न्यूनतम चीनी उपलब्धता सुनिश्चित करने के बाद एथेनॉल के लिए कितना डायवर्जन उचित है?
चीनी की कीमत बढ़ने का असर केवल घरों में इस्तेमाल होने वाली चीनी तक सीमित नहीं रहता। मिठाई, बिस्कुट, पेय पदार्थ और कई प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की उत्पादन लागत पर भी इसका असर पड़ सकता है। इसलिए एथेनॉल नीति के संभावित अप्रत्यक्ष प्रभावों को महंगाई के व्यापक संदर्भ में देखना जरूरी है।
दूसरी चुनौती : वाहन का माइलेज
एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल की तुलना में कम होती है। इसलिए E20 ईंधन के इस्तेमाल से कुछ वाहनों में माइलेज प्रभावित हो सकता है। सरकार के हालिया बयानों में भी कुछ वाहनों में लगभग 3 से 5 प्रतिशत तक ईंधन दक्षता में कमी की संभावना स्वीकार की गई है।
सरकार का यह भी कहना है कि वास्तविक माइलेज पर वाहन का मॉडल, ड्राइविंग पैटर्न और अन्य परिस्थितियां प्रभाव डालती हैं तथा E20-अनुकूल वाहनों में इसका प्रभाव सीमित हो सकता है।
फिर भी उपभोक्ता के सामने एक व्यावहारिक सवाल बना रहता है—वह पेट्रोल की कीमत प्रति लीटर देखे या वाहन चलाने की वास्तविक लागत प्रति किलोमीटर?
यदि एक लीटर ईंधन से वाहन पहले की तुलना में थोड़ी कम दूरी तय करता है, तो पेट्रोल की कीमत समान रहने के बावजूद प्रति किलोमीटर परिवहन लागत बढ़ सकती है। इसलिए एथेनॉल नीति के मूल्यांकन में केवल पेट्रोल की प्रति लीटर कीमत देखना पर्याप्त नहीं है।
तीसरी चुनौती : तकनीकी अनुकूलता
E20 को अपनाने के लिए इंजन कैलिब्रेशन, फ्यूल सिस्टम, रबर कंपोनेंट और अन्य तकनीकी हिस्सों में आवश्यक अनुकूलता महत्वपूर्ण है। नई पीढ़ी के E20-अनुकूल वाहनों में इस दिशा में बदलाव किए गए हैं।
यह दावा करना उचित नहीं होगा कि E20 के कारण बड़े पैमाने पर इंजन खराब हो रहे हैं। सरकार का कहना है कि इंजन फेल होने का कोई व्यापक और सत्यापित पैटर्न सामने नहीं आया है।
लेकिन भारत की सड़कों पर बड़ी संख्या में पुराने वाहन भी चल रहे हैं। इसलिए नई E20-अनुकूल कारों की तकनीकी तैयारी को पूरे वाहन बेड़े की स्थिति मान लेना उचित नहीं होगा।
पुराने वाहनों की अनुकूलता, उनके रखरखाव और लंबे समय में उनकी तकनीकी टिकाऊपन का प्रश्न अलग है। यही वजह है कि E20 संक्रमण को केवल नई गाड़ियों के संदर्भ में नहीं, बल्कि देश में मौजूद पूरे वाहन बेड़े के संदर्भ में देखना आवश्यक है।
चौथी चुनौती : महंगाई का व्यापक दबाव
एथेनॉल ब्लेंडिंग का प्राथमिक उद्देश्य पेट्रोल को सस्ता करना नहीं है। इसका लक्ष्य आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता घटाना, विदेशी मुद्रा की बचत करना और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना है। सरकार के अनुसार एथेनॉल कार्यक्रम ने पिछले वर्षों में देश को बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा बचाने में मदद की है।
ये व्यापक आर्थिक लाभ महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इनका लाभ उपभोक्ता को सीधे पेट्रोल की कीमत में दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है।
यदि एक ओर एथेनॉल उत्पादन के लिए कृषि संसाधनों के उपयोग से खाद्य चीनी की कीमत पर दबाव पड़ता है और दूसरी ओर कुछ वाहनों में माइलेज घटता है, तो परिवारों के बजट पर दोहरा असर पड़ सकता है—खाद्य पदार्थ महंगे हों और परिवहन की वास्तविक लागत भी बढ़े।
इसलिए एथेनॉल नीति की सफलता को केवल इस सवाल से नहीं मापा जा सकता कि कितने प्रतिशत एथेनॉल पेट्रोल में मिलाया गया?
तेजी के साथ संक्रमण की तैयारी भी जरूरी
2013-14 में एथेनॉल ब्लेंडिंग 1.53 प्रतिशत थी और 20 प्रतिशत का लक्ष्य 2030 के लिए निर्धारित था। बाद के वर्षों में ब्लेंडिंग की गति काफी तेज हुई और सरकार ने लक्ष्य को 2025-26 तक हासिल करने का निर्णय लिया।
यह निश्चित रूप से एक बड़ी नीतिगत उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन इसके साथ यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या तकनीकी बदलाव, पुराने वाहनों के लिए संक्रमण व्यवस्था, चीनी की पर्याप्त उपलब्धता और उपभोक्ता की वास्तविक लागत का आकलन भी उसी गति से हुआ?
यदि किसी नीति का लक्ष्य पांच वर्ष पहले हासिल हो जाए, लेकिन उसके साथ खाद्य सुरक्षा, वाहन अनुकूलता और उपभोक्ता लागत से जुड़े नए सवाल खड़े हों, तो नीति की समीक्षा करना स्वाभाविक है।
एथेनॉल नीति छोड़ने की नहीं, संतुलित करने की जरूरत
भारत को एथेनॉल नीति छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। जरूरत इसे अधिक संतुलित और दीर्घकालिक बनाने की है।
इसके लिए एथेनॉल उत्पादन में गन्ने पर अत्यधिक निर्भरता कम करते हुए कृषि अपशिष्ट, सेलूलोसिक बायोमास और अन्य अखाद्य स्रोतों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा सकता है। घरेलू चीनी उपलब्धता के लिए स्पष्ट सुरक्षा-सीमा तय की जानी चाहिए। पुराने वाहनों के संक्रमण की लागत और तकनीकी प्रभाव का स्वतंत्र अध्ययन होना चाहिए। साथ ही उपभोक्ताओं को केवल प्रति लीटर कीमत ही नहीं, बल्कि ईंधन की वास्तविक प्रति किलोमीटर लागत को समझने की जानकारी भी दी जानी चाहिए।
20 प्रतिशत ब्लेंडिंग का लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लेना अपने आप में नीतिगत सफलता का अंतिम प्रमाण नहीं है। सच्ची सफलता तब होगी जब पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण के साथ चीनी की कीमतों पर अनावश्यक दबाव न पड़े, खाद्य सुरक्षा सुरक्षित रहे, पुराने और नए दोनों तरह के वाहनों के तकनीकी हितों का ध्यान रखा जाए और उपभोक्ता की वास्तविक परिवहन लागत अनावश्यक रूप से न बढ़े।
अन्यथा 2030 का लक्ष्य 2025 में हासिल करना उपलब्धि का आंकड़ा तो बन सकता है, लेकिन यदि तकनीकी और खाद्य-सुरक्षा तैयारी उसके अनुरूप न हो तो लक्ष्य हासिल करने की यही जल्दबाजी आगे चलकर नई आर्थिक चुनौतियों का कारण भी बन सकती है।

